6.7 सीता जी की खोज: जब हनुमान् जी पहुँचे रावण की शयन-शाला में.

6.7 सीता जी की खोज: जब हनुमान् जी पहुँचे रावण की शयन-शाला में.

किसी के शयन-कक्ष में ताक-झांक करना कोई अच्छी बात तो है नहीं। पता नहीं वहाँ क्या कुछ देखना पड़ जाए। किन्तु, कई बार परिस्थितिवश सज्जन पुरुषों को भी ऐसा करना पड़ जाता है। फिर भी अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित, संयमी और सदाचारी पुरुष के मन पर वहाँ की स्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। एक ऐसा ही एक प्रसंग बाल ब्रह्मचारी, जितेन्द्रीय हनुमान् जी के साथ घटित हो गया। जब वे माता सीता की खोज में लंका आए। जैसे-तैसे वे लंका में घुस तो गए। पर अब वे सोच में पड़ गए कि सीता जी को कहाँ खोजें । उन्होंने अनुमान लगाया कि जहाँ अन्य स्त्रियाँ होंगी, वहीं सीता जी भी हो सकती हैं। ऐसी जगह तो रावण का अन्त:पुर ही हो सकता है। इसलिए येन-केन-प्रकारेण वे रावण के महल में प्रवेश कर गए। वहाँ अनेक सुंदर स्त्रियाँ थीं। जिनमें देव,राक्षस, यक्ष, किन्नर, नाग आदि वंशों की सुंदर कन्याओं के अतिरिक्त अन्य कई राजकन्याएँ भी थीं। जिनमें से कईयों को रावण विवाह कर और कईयों को जबरन उठाकर ले आया था,जबकि कई स्वेच्छा से भी आ गई थीं।

‘राक्षसीभिश्च पत्नीभी रावणस्य निवेशनम्।

आहृताभिश्च विक्रम्य राजकन्याभिरावृतम्।।’

रावण के भवन की शोभा अद्भुत थी, जो कुबेर, इन्द्र, चन्द्रमा के भवनों से भी बढ़कर थी। उसमें राजा कुबेर, यम और वरुण के घर में जितना धन रहता है, उससे भी अधिक ही था। हनुमान् जी रावण के शयन-कक्ष में प्रवेश कर गए। वह शयनशाला साक्षात् देवलोक जैसी प्रतीत हो रही थी। वह शाला अत्यंत रमणीक, स्वच्छ मणियों की सीढ़ियों से सुशोभित और सोने की जालियों से युक्त थी। स्फटिक मणियाँ उसके फर्श पर जड़ी थीं।उसमें जहाँ-तहाँ चित्र सजाए गए थे जो मोती,हीरा, मूंगा, रूपा, सुवर्ण से युक्त थे। शयनशाला मणि के खम्बों से विभूषित थी। वहाँ सोने के दिए जल रहे थे। जिनके प्रकाश से वह स्थान दमक रहा था। सर्वत्र जड़े मणि-माणिक्यों और स्वर्ण के प्रचुर उपयोग से से वह स्थान और अधिक जगमग कर रहा था।

‘दीपानां च प्रकाशेन तेजसा रावणस्य च।

अर्चिर्भिर्भूषणानां च प्रदीप्तेत्यभ्य मन्यत।।’

हनुमान् जी ने देखा कि हजारों सुंदर स्त्रियाँ उत्तम बिछौनों पर पड़ी सो रही हैं, जो विविध प्रकार का श्रृँगार किए हुए थीं।। उन्होंने देखा कि उन स्त्रियों के मुख-मंडल कमल के फूलों की तरह प्रफुल्लित हो कर बड़े सुंदर जान पड़ते थे। रावण की शयन शाला, इन सब ललनाओं के समूह से शरद् काल के ताराओं से मंडित निर्मल आकाश की तरह शोभायमान हो रही थी। उसी प्रकार रावण भी उन स्त्रियों के बीच तारागण युक्त चंद्रमा की तरह सुशोभित हो रहा था।

‘स च ताभि: परिवृत: शुशुभे राक्षसाधिप:।

यथा ह्युडुपति: श्रीमांस्ताराभिरभिसंवृत:।।’

उन रमणियों के आभूषण, श्रृँगार, वस्त्र,केश अस्त-व्यस्त हो रहे थे। उनके किंकिणियों के समूह, सुवर्ण कमल की तरह जान पड़ते थे। उनकी विलास भावनाएँ ग्राह के तुल्य थीं। उनके विविध गुण तट के समान थे। वे सोती हुई स्त्रियाँ इस तरह नदी की तरह शोभायमान जान पड़ती थीं। रावण की स्त्रियों का वह समूह वन की तरह सुशोभित था। वे वनलताओं की तरह परस्पर लिपटी हुुई थीं। उनमें कोई तो राजर्षियों की, कोई-कोई ब्राह्मणों की, कुछ दैत्यों की तो कोई गन्धर्वों की और कुछ राक्षसों की स्त्रियाँ थीं।

‘राजर्षिविप्रदैत्यानां गन्धर्वाणां च योषित:।

रक्षसां चाभवन्कन्यास्तस्य कामवशं गता:।।’

रावण यद्यपि महापराक्रमी था, तथापि कहा गया है कि बरजोरी वह किसी स्त्री को हर कर नहीं लाया था। केवल सीता जी को छोड़, अन्य स्त्रियाँ रावण के सौंदर्यादि गुणों पर मुग्ध होकर स्वयं उसके साथ चली आईं थीं। उनमें ऐसी एक भी स्त्री ऐसी न थी जो रावण को पति न मानती हो। रावण न भी उन सभी चाहता था।

” न तत्र काश्चिचत्प्रमदा प्रसह्य वीर्योपपन्नेन गुणेन लब्धा।

न चान्य कामापि न चान्यपूर्वा विना वरार्हां जनकात्मजां ताम्।।”

हनुमान् जी ने रावण के शयनकक्ष में सीता जी की खोज तो शुरू कर दी थी पर उनके सामने एक और बड़ी समस्या थी कि इतनी स्त्रियों में वे जानकी को पहचाने तो कैसे, क्योंकि उन्होंने कभी प्रत्यक्ष तो क्या, उनका चित्र भी नहीं देखा था। फिर भी हनुमान् जी उस विशाल शयनशाला के चारों ओर देखते-देखते एक स्थान पर पहुँचे, जहाँ अनेक प्रकार के रत्नों से विभूषित स्फटिक का बना एक विशाल पलंग रखा था। इस पलंग के आस-पास सुन्दर पुतलियां हाथों में चंवर ले पंखा झल रही थीं, वहाँ विविध प्रकार के इत्र रखे हुए थे और उत्तम सुगंधी की धूप जल रही थी, जिससे वह स्थान सुवासित हो रहा था। पलंग पर कोमल गद्दे बिछे हुए थे,जिस पर रावण सो रहा था।अनेक दिव्य गहने पहने सुस्वरूप, कामरूपी रावण , उस पर ऐसा जान पड़ता था, मानों विविध प्रकार की लताओं से पूर्ण मन्दराचल पर्वत पड़ा सो रहा हो।

‘ वृतमाभरणैर्दिव्यै: सुरूप कामरूपिणम्।

सवृक्षवनगुल्माढ्यं प्रसुप्तमिव मन्दरम्।।’

इसके बाद हनुमान् जी ने देखा कि अलग सुंदर सेज पर, अपूर्व रूप यौवनशालिनी एक स्री सो रही है।मणियों और मोतियों के जड़ाऊ विविध प्रकार के आभूषणों को पहने वह स्त्री सौन्दर्य से मानों उस उत्तम भवन को अलंकृत कर रही हो। उसका वर्ण गौर था और सुवर्ण की तरह उसके शरीर की कांति थी। वह रावण की प्रिय भार्या मंदोदरी थीं तथापि हनुमान् जी ने उसे ही सीता समझ लिया, जिससे वेे आनन्द में डूब गए कि चलो सीता माता मिल गईं। पर फिर वे विचार करने लगे कि सीता पतिव्रता होकर, श्रीराम के वियोग में न सो सकती है, न खा-पी सकती हैं और न श्रृँगार कर सकती हैं। अन्य पुरुष तो क्या, वे देवताओं के राजा इन्द्र को अपना पति नहीं मान सकतीं। क्योंकि श्रीराम के समान देवताओं में भी कोई और नहीं है।

‘नान्यं नरमुपस्थातुं सुराणामपि चेश्वरम्।

न हि राम सम: कश्चिद्विद्यतेद्यते त्रिदशेष्वपि।।’

यह कोई अन्य स्त्री है, ऐसा अपने मन में निश्चय कर वे वैदेही की तलाश में रावण की पानशाला में विचरने लगे। जहाँ उन्होंने अनेक सोती हुई सुंदर स्त्रियाँ और विविध प्रकार के सामिष भोज्य पदार्थ, फल और सुगंधित आसव रखे देखे। इस तरह बजरंगबली में वो सब देखा जो वे देखना नहीं चाहते थे। पर वे उनको नहीं देख पाए, जिनकी खोज में वे यहाँ आए थे।

हनुमान् जी मन में परस्त्रियों को सोती हुई देखकर अपने धर्म के नष्ट होने की आशंका उत्पन्न हो गई। वे सोचने लगे मेरा यह कर्म अवश्य ही मेरे धर्म को नष्ट कर देगा। आज तक मैंने गलत दृष्टि से स्त्रियों को कभी नहीं देखा। स्त्रियों को माता स्वरूप समझने वाले हनुमान् जी के मन में स्थिरता और निश्चयपूर्वक यह बात आई कि, यद्यपि मैंने इन स्त्रियों के देखा, तथापि मेरे मन में तिल भर भी विकार उत्पन्न नहीं हुआ। मन ही तो पाप और पुण्य करने वाली इंद्रियों का प्रेरक है। सो यह मन मेरे वश में है। इसलिए मुझे सोती हुई स्त्रियों को देखने का पाप नहीं लग सकता। फिर अन्यत्र मैं सीता जी को कहीं ढूँढ़ भी तो नहीं सकता था। कोई स्त्री दूसरी स्त्रियों के बीच ही तो मिल सकती है।

‘न हि मे मनस: किंश्चिद्वैकृत्यमुपपद्यते।

मनो हि हेतु: सर्वैषामिन्द्रियाणां प्रवर्तने।।

शुभाशुभास्ववस्थासु तच्च में सुव्यवस्थितम्।

नान्यत्र हि मया शक्या वैदेही परिमार्गितुम्।।’

रावण के सदन में बहुत गहनता से ढूँढ़ने के बाद जब उन्हें जानकी नहीं मिलीं, तब उन्हें ध्यान आया कि यहाँ एक वाटिका भी है, जिसे मैंने देखा ही नहीं। उसे देखना भी जरूरी मान कर वे अशोक वाटिका की ओर चल दिए।” रामकाज कीन्हें बिना मोहिं कहाँ विश्राम।”

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