8.25 जनकसुता जगजननी जानकी

8.25 जनकसुता जगजननी जानकी

आज मिथिला में सीता-प्रकटोत्सव की धूमधाम है। वहाँ भी उनका प्रकटोत्सव उतने ही आनंद और आत्मीयता से मनाया जाता है जितना कि अयोध्या में रामजन्मोत्सव। वहाँ के लोग पूरी तरह आश्वस्त हैं कि जनक-नंदिनी मिथिला की बेटी ही थीं और सीतामढ़ी जनपद में ही धरती से प्रकट हुई थीं। इस वर्ष यह तिथी आज 5 मई को आ रही है। ऐसा माना जाता है कि सीता जी सीतामढ़ी में ही अवतरित हुई थी और यहीं वे भू-देवी की गोद में समा भी गई थीं। आज का दिन मिथिलांचल और नेपाल के लिए विशेष है। इसीलिए बिहार के मिथिलांचल और नेपाल में अवकाश रखा जाता है।

प्राचीन राम साहित्य में माता सीता की उत्पति के संबंध में इतनी सारी कथाएँ प्रचलित हैं कि शायद ही किसी और कथा में उसके प्रमुख पात्र को लेकर हुई होगी।अलग-अलग कथाओं में दशरथ,रावण और जनक तीनों सीता के पिता माने गए हैं।उन्हें भूमि से उत्पन्न भी माना गया है,जिसे राजा जनक ने अपनी औरस पुत्री मान कर पाला था। ऐसी और भी कथाएँ हैं,जिनमें उन्हें पद्माजा,रक्तजा,अग्निजा और यहाँ तक कि उन्हें वृक्ष से उत्पन्न भी बताया गया है। विवाह के बाद श्रीराम की जीवन संगिनी बनने के बाद उनकी कथा जन-जन को मालूम है। पर उनके जन्म की कथाओं में बहुत भिन्नता है। जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। ऐसा संभवत: सीता के कुल-परम्परा संबंधी तथ्यों के अभाव के कारण हुआ और एक दूसरे से सर्वथा भिन्न कथाएँ प्रचलित हो गईं। आईए,कुछ कथाओँ का विहंगावलोकन किया जाए।

जनकात्मजा सीता—

मान्यता है कि आदि रामायण (रामायण का मूल स्वरूप) में सीता मिथिला की राजकन्या और जनक की पुत्री के रूप में वर्णित थी। रामायण के अनेक स्थलों पर इसका उल्लेख किया गया है कि सीता जनक के कुल में उत्पन्न हुई थीं। महाभारत केे रामोपाख्यान में भी सीता को विदेहराज जनक की पुत्री कहा गया है।( विदेहराजो जनक: सीता तस्यात्मजा विभो)

हरिवंश पुराण की रामकथा में सीता की अलौकिक उत्पत्ति का कोई उल्लेख नहीं हुआ है। कूर्मपुराण में लिखा है कि –रामस्य भार्या सुभगा जनकात्मजा शुभा।

कथा सरित्सागर में भी सीता को जनक की आत्मजा कहा गया है–सीता तस्याभवद् भार्या प्राणेशा जनकात्मजा।

भूमित्मजा

सीता की अलौकिक उत्पत्ति का वर्णन वाल्मीकि रामायण में दो बार विस्तारपूर्वक किया गया है। एक दिन जब राजा जनक यज्ञ-भूमि तैयार करने के लिए हल चला रहे थे,एक छोटी सी कन्यका मिट्टी से निकली। उन्होंने उसेे पुत्री-स्वरूप ग्रहण किया और उसका नाम सीता रखा। सीता-जन्म का यह वृतान्त अधिकांश रामकथाओं में मिलता है। विष्णुपुराण में यह कहा गया है कि जिस यज्ञ के लिए जनक भूमि तैयार कर रहे थे वह ‘पुत्रार्थम’ था।

एक कथा यह है कि ऋषि कुशध्वज की पुत्री वेदवती नारायण को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय में तप कर रही थी। किसी दिन रावण की दृष्टि उस कन्या पर पड़ती है। उसके रूप-लावण्य से मोहित होकर वह उसके केशों को पकड़ता है। तब वेदवती अपने हाथ को असि के रूप में बदलकर अपने केशों को काटकर स्वयं को मुक्त करती है और रावण को शाप देकर भविष्यवाणी करती है कि मैं तुम्हारे नाश के लिए अयोनिजा के रूप में पुन: जन्म ग्रहण करूँगी। अन्त में वह अग्नि में प्रवेश करती है और बाद में वह जनक की यज्ञभूमि में उत्पन्न होती है।

रावणात्मजा

सर्वप्रथम यह कथा वासुदेवहिंडी में आई है,जिसके अनुसार विद्याधर मय ने रावण के पास जाकर उसके साथ अपनी पुत्री मन्दोदरी के विवाह का प्रस्ताव रखा। शारीरिक लक्षणों का ज्ञान रखने वालों ने कहा कि मन्दोदरी की पहली संतान कुल नाश का कारण बनने वाली है। रावण मन्दोदरी के सौंदर्य पर मोहित हो चुका था। इसलिए उसने पहली संतान को त्याग देने का निर्णय कर उसके साथ विवाह किया। बाद में मंदोदरी ने एक पुत्री को जन्म दिया तथा उसे रत्नों के साथ एक मंजूषा में रखकर मंत्री को आदेश दिया कि उसे वह कहीं छोड़ आए। मंत्री ने उसे जनक के खेत में रख दिया। बाद में जनक से कहा गया कि यह बालिका हल की रेखा से उत्पन्न हुई है। राजा जनक ने उसे महारानी धारिणी को सौंप दिया।

इस प्रकार की अन्य कथाएँ भी हैं,किन्तु वे इतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं। भागवत धर्म में श्रीराम के विष्णु के अवतार होने की धारणा स्थापित होने के बाद अधिकांशत: सीता जी को लक्ष्मी का ही रूप माना गया है। उनके लक्ष्मीत्व का उल्लेख उत्तरकांड के कुछ प्रक्षिप्त सर्गों में भी मिलता है।किन्तु,वायु, ब्रह्मांड और विष्णु जैसे प्राचीन महापुराणों में सीता और लक्ष्मी को अभिन्न नहीं माना गया है,यद्यपि इन रचनाओं में राम विष्णुु के अवतार माने गए हैं। जबकि हरिवंश, भागवतपुराण, ब्रह्मपुराण, देवीभागवतपुराण, अभिषेक नाटक, रामकियेन, पद्मपुराण और अधिकांश नई रचनाओं के अनुसार सीता और लक्ष्मी एक ही हैं।

रामतापनीय उपनिषद में पहले-पहल सीता और प्रकृति को एक माना गया है। बाद के साहित्य में भी लक्ष्मी के अतिरिक्त सीता मूलप्रकृति, योगमाया और परम् शक्ति मानी जाती हैं। अध्यात्म रामायण में उनके बारे में लिखा गया है:: ‘एषा सा जानकी लक्ष्मीर्योगमायेति विश्रुता।।’ तथा ‘मूल प्रकृतिरित्यके प्राहुमयिति केचन।।’

सौरपुराण में कहा गया है कि जनक ने तपस्या के द्वारा पार्वती को संतुष्ट किया था,फलस्वरूप वे उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुईं।

‘पार्वत्यंशसमुद्भवा जनकेन पुरा गौरी तपसा तोषिता यत:’।

महाभागवतपुराण के अनुसार सीता और लक्ष्मी अभिन्न तो हैं,लेकिन लक्ष्मी स्वयं देवी के अंश से उत्पन्न हैं। स्कंदपुराण के माहेश्वरखंड के अनुसार ब्रह्म-विद्या सीता के रूप में अवतरित हुईं। इसी पुराण के ब्रह्मखंड में लिखा है कि सीता परशुराम अवतार में धरणी,राम अवतार में सीता और कृष्ण अवतार में रुक्मिणी हैं। अध्यात्म रामायण के अनुसार सीता,लक्ष्मी,पार्वती, सरस्वती और प्रभा एक ही हैं।

तुलसीदास जी ने सीता जी के जन्म के बारे में तो कुछ नहीं लिखा,पर उनका दृढ़ विश्वास था कि माता सीता जगतजननी ही हैं। इसलिए मानस के मंगलाचरण में उन्होंने श्रीराम से भी पहले माता सीता की गदगद भाव से इस प्रकार स्तुति की है–” स्थिति और संहार करने वाली, क्लेशों को हरने वाली और सम्पूर्ण कल्याण को करने वाली श्रीरामचन्द्र जी की प्रियतमा हैं।”

‘उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।

सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोहं रामवल्लभाम्।।’

सीता उनके आराध्य प्रभु राम की अतिशय प्रिय भार्या थीं, उनकी भक्ति के लिए इतना ही पर्याप्त् था।इसी भावना को उन्होंने कुछ इस तरह भी व्यक्त किया है:

जनकसुता जगजननी जानकी।

अतिसय प्रिय करुनानिधान की।।

ताके जुग पद कमल मनावऊँ।

जासु कृपाँ निरमल मति पावऊँ।।

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