8.8 हनुमान् जी की गदा

8.8 हनुमान् जी की गदा

आजकल के सियासी माहौल में जो भी धार्मिक प्रतीक हाथ लग जाता है,राजनीति उसका दोहन करने में पीछे नहीं रहती। अब लोगों का ध्यान हनुमान् जी की गदा पर गया है, इसलिए जगह-जगह उसका प्रदर्शन होने लगा है। हनुमान् जी के साथ उनकी गदा अनिवार्यत: बताई जाती है। कुछ उनकी गदा का नाम कौमुदकी बतलाते हैं, जबकि यह भगवान विष्णु की गदा का नाम था। कइयों को ऐसा मानना है कि वे सदा अपनी गदा साथ लिए घूमते थे और उनकी शक्ति गदा में ही समाई थी जिसके जरिए ही वे अपने शौर्य का प्रदर्शन कर पाते थे। यदि गदा उनके साथ न होती तो वे अधिक कुछ नहीं कर पाते। क्या सचमुच ऐसा ही था और गदा सर्वत्र-सर्वदा उनके साथ होती थी, जिसका वे हर युद्ध में प्रयोग करते थे। आइए! वाल्मीकि रामायण के संदर्भ में देखें कि इस धारणा का सच क्या है।

माता सीता की खोज में जब अँगद के नेतृत्व में वानरों की टोली दक्षिण दिशा की ओर निकली, तब विशाल समुद्र सामने पाकर सबके हाथ-पाँव फूल गए। हनुमान् भी बेबस से देख रहे थे। उन्हें ऋषियों का शाप था कि जब तक उन्हें कोई याद नहीं दिलाएगा, तब तक उन्हें अपनी शक्ति विस्मृत रहेगी। तब वयोवृद्ध जामवंत उनके पास जाकर उन्हें उनकी शक्ति और देवताओं द्वारा बालपन में दिए गए वरदानों का स्मरण दिलाते हैं। जिसमें अपनी देह को मनचाहा आकार देने, वायु में असीमित गति से उड़ सकने की क्षमता, अस्त्र-शस्त्रों से अवध्यता और चिरंजीवत्व प्रमुख थे। जामवंत उन्हें समझाते हैं कि केवल वे ही हैं, जो विशाल समुद्र को लांघ कर लंका द्वीप पहुँच सकते हैं, और माँ सीता का पता लगा सकते हैं।

अपनी वास्तविक क्षमता का बोध हो जाने पर हनुमान् पर्वताकार होकर एक ऊँचे पर्वत महेन्द्र गिरी पर चढ़ जाते हैं और लंका जाने के लिए छलांग लगाते हैं। पर तब उनके पास कोई गदा नहीं होती। आगे की कथा सभी को मालूम है कि वे किस तरह लंका में प्रवेश करते हैं, वहाँ माता सीता की खोज करते हैं, अशोक वाटिका पहुँच कर सीता जी से भेंट करते हैं, उन्हें प्रभु राम का संदेश देकर आश्वस्त करते हैं और वापस लौटने का निश्चय करते हैं। किन्तु, सहसा उनके मन में विचार आता है कि उन्हें रावण से भेंट कर शत्रुपक्ष की क्षमता का पता लगाकर जाना चाहिए। प्रश्न यह था कि महाप्रतापी राक्षसराज रावण से उनकी भेंट हो तो कैसे? तो उन्हें इसका सरल सा उपाय यही सूझता है कि रावण के इस विशाल और सुंदर वन को तहस-नहस किया जाए। यह तय कर वे अपने अभियान में भिड़ जाते हैं। अनेक विशाल वृक्षों को उखाड़ देते हैं। अशोक वाटिका में स्थित एक चैत्य के शिखर पर चढ़ कर उसे तोड़-फोड़ डालते हैं। वन के रक्षकों के आने पर वे चैत्य के एक विशाल धातु के स्तंभ को उखाड़ लेते हैं और उससे राक्षस वीरों का सामना करते हैं। यहाँ से हनुमान् जी का एकल शौर्य प्रदर्शन शुरू होता है। और युद्धों में वे प्राय: सहायक की भूमिका में रहे हैं, किन्तु, यही एकमात्र ऐसा युद्ध था,जिसमें वे रावण के महावीरों और युद्धप्रवीण सेना के सामने अकेले थे।

जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ा, युद्ध की भीषणता बढ़ती गई। शत्रुसेना हाथी, घोड़े, रथ पर सवार होकर या पैदल ही आगे बढ़ी। उनके हाथों में धनुष-बाण, प्रास, पट्टिश, खड्ग, भुशुण्ड़ी, मुद्गर, शतघ्नी,परिघ, मूसल, नालीक, नाराच और तलवार जैसे घातक हथियार थे। जबकि,हनुमान् जी के अस्त्र-शस्त्र शिलाएँ, पर्वत खण्ड, वृक्ष, मुक्का, झापड, नाखून थे।

वहाँ सबसे पहले प्रहस्त-पुत्र जम्बुमाली अपनी सेना के साथ आया और मारा गया। उसके बाद उनका सामना सात मंत्री-पुत्रों से हुआ जो विकट पराक्रमी होने के बाद भी खेत रहे। तब रावण ने पाँच सेनापतियों को भेजा, पर वे भी मारे गए। इसके बाद रावण-पुत्र अक्ष कुमार जो महान पराक्रमी होने के साथ ही धनुष विद्या में प्रवीण था, आया और मारा गया। अंत में इंद्रजित वहाँ आया, जिसने दिव्यास्त्र का प्रयोग कर हनुमान् जी को बन्धन में बांधा, जिसमें बंधकर वे रावण के दरबार में आए।

राम-रावण युद्ध में भी हनुमान् जी का सामना रावण के कई सेनानायकों से हुआ, जिनमें धूम्राक्ष, अकम्पन, देवांतक, त्रिशरा और निकुम्भ थे, जो हनुमान् जी के हाथों मारे जाकर परलोक सिधारे। इन युद्धों में हनुमान् जी ने इन महाबली और युद्ध विद्या में निपुण सेनानायकों का सामना वृक्षों, पर्वतों, शिलाखंडों जैसे प्राकृतिक उपादानों से ही किया था और गदा या कोई अस्त्र-शस्त्र उनके या अन्य वानर वीरों के पास नहीं थे।

इसके विपरीत महाभारत काल में कई महावीर गदायुद्ध प्रेमी और इस युद्ध कला में पारंगत थे। इनमें सबसे पहले महावीर भीम का नाम आता है। उनके अलावा भी श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम, दुर्योधन, जरासंध,जयद्रथ आदि गदायुद्ध कला में प्रवीण थे। फिर भी कोई उनका नाम नहीं लेता। और न जाने क्यों गदा को हनुमान् जी का आयुध मान लिया गया और वह उनके साथ जुड़ गई। वैसे राजनीति को इन सच्चाइयों से क्या लेना-देना, जिससे उनका काम बने, वह उनके काम की।

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