आमतौर पर यह माना जाता है कि हनुमान जी एक ही बार हिमालय गए थे,जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी और वे अचेत हो गए थे।तब लंका निवासी वैद्य सुषेण के कहने पर वे संजीवनी बूटी लाने के लिए हिमालय पर गए थे। वहाँ बूटी की सही पहचान न कर पाने के कारण पूरा पहाड़ उखाड़ लाए थे। रामचरित मानस में हमने ऐसा ही पढ़ा है।किन्तु,वाल्मीकि रामायण कहना है कि वे सिर्फ दो बार नहीं बल्कि चार बार हिमालय पर गए थे।दो बार संजीवनी बूटी लाने,जिसके निमित्त वे औषधि का पूरा पहाड़ ले आए थे और दोनो बार वे उसे वापस रखने भी गए थे।क्योंकि,वे जानते थे कि ये ऐसी दिव्य औषधियाँ है,जो और कहीं नहीं केवल हिमालय के जलवायु में ही पनप सकती हैं।
यहाँ लंका में घनघोर युद्ध चल रहा है।मेघनाद के बाण वर्षा से राम-लक्ष्मण के सहित सारे वानर यूथपति बुरी तरह से घायल हैं।इसी बीच उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर लिया है, जिससे बड़ी संख्या मेंं वानर सेना का संहार हो रहा है।उसे रोकने में कोई भी सफल नहीं हो पा रहा है।लगभग सभी अचेत पड़े हैं।बहुत देर बाद ऋक्षराज जाम्बवान को चेतना आती है।पर उनकी स्थिति ऐसी नहीं है कि वे बात भी कर पाएँ। तभी विभीषण उनके पास आते हैं।उनसे जाम्बवान पूछते हैं–हनुमान् कैसे हैं? विभीषण को बहुत आश्चर्य होता है कि ये श्रीराम और लक्ष्मण के बारे न पूछ कर हनुमान् के बारे में क्यों पूछ रहे हैं।वो यही प्रश्न जाम्बवान से करते हैं तब जाम्बवान कहते हैं “यदि हनुमान् जीवित हैं तब समझ लीजिए कि हम सभी जीवित ही हैं।अन्यथा सबको मृत जानिए।इतनी ही देर में हनुमान् वहाँ आ जाते हैं।तब जाम्बवान उनसे कहते हैं–हे वीर,मेरी बात ध्यान से सुनो,तुम्हीं हो जो सबके प्राणों पर आए संकट को टाल सकते हो।क्योंकि,तुम्हीं इतने पराक्रमी हो।पर इसके लिए समुद्र के ऊपर से तुम्हें हिमालय पर जाना होगा।
गत्वा परममध्वानमुपर्युपरि सागरम्।
हिमवंत नगश्रेष्ठं हनुमान्गन्तु मर्हसि।।
वहाँ पहुँचने पर तुम्हें बहुत सुवर्णमय पर्वत ऋषभ का और कैलाश शिखर का दर्शन होगा।उनके बीच में औषधियों का पर्वत दिखाई देगा,जो सभी प्रकार की औषधियों से सम्पन्न है।उनमें से तुम्हें चार प्रकार की औषधियाँ लानी है,जिनके नाम मृतसंजीवनी,विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी है।उनकी बात सुनकर हनुमान् जी उड़ कर हिमालय पहुँच जाते हैं।वे औषधियों की सही-सही पहचान नहीं कर पाते हैं इस कारण उस पहाड़ को ही उखाड़ लाते हैं और लंका में युद्धस्थल पर रख देते हैं।उन औषधियों की सुगंध से राम-लक्ष्मण सहित सारी सेना सचेत और स्वस्थ हो जाती है।
तावप्युभौ मानुष राजपुत्रौ तं गन्धमाग्राय महौषधीनाम्।
वभूव स्तुस्तत्र तथा विशल्या वत्तस्थरन्ये च हरिप्रवीरा:।।
बाद में हनुमान् जी उस पर्वत को वापस जाकर उसकी जगह पर रख देते हैं।
हनुमान् जी की इस प्रथम यात्रा का उपरोक्त वर्णन वाल्मीकि रामायण में आया है।किन्तु,इस यात्रा के वर्णन में किसी विशेष घटना का उल्लेख नहीं किया गया है।बाद की रचनाओं में भी इसका कोई विकास नहीं हुआ।कम्ब रामायण और रामकियेन में माना गया है इन्द्रजित ने लक्ष्मण और बहुत से वानरों को ब्रह्मास्त्र द्वारा आहत किया था।लक्ष्मण को आहत देखकर राम रणभूमि में मूर्छित होकर गिर पड़े।उसी अवसर पर रावण ने सीता को मूर्छित पड़े हुए राम और लक्ष्मण को दिखलाया।अध्यात्म रामायण तथा रामचरित मानस में हनुमान् जी के इस यात्रा का कोई उल्लेख नहीं है।
हनुमान् जी की द्वितीय यात्रा के वर्णन का बहुत विकास हुआ है।इसके विषय में सामग्री वाल्मीकि रामायण के तीनों पाठों में मिलती है।इसके अनुसार रावण की शक्ति से लक्ष्मण को आहत देखकर राम विलाप करते हैं।तब सुषेण उन्हें बताते हैं कि लक्ष्मण जीवित हैं।अध्यात्म रामायण और रामचरित मानस के अनुसार ये सुषेण रावण के राजवैद्य हैं,जिन्हें हनुमान् जी लंका से उनकी घर सहित उठा लाते हैं।पर वाल्मीकि रामायण की कथा के अनुसार ये सुषेण वे नहीं है,अपितु वानरराज सुग्रीव के ससुर और तारा के पिता हैं,ये परम् बुद्धिमान हैं और इन्हें वनौषधियों का सर्वोत्तम ज्ञान है।वे पास खड़े हनुमान जी से कहते हैं कि हे सौम्य!तुम शीघ्र ही यहाँ से महोदय पर्वत पर जाओ, जिसका पता जाम्बवान तुम्हें पहले ही बता चुके हैं और उसके दक्षिण शिखर पर उगी हुई वे ही महौषधियों को यहाँ ले आओ।उन्हीं से वीरवर लक्ष्मण के जीवन की रक्षा होगी।हनुमान् उस पर्वत पर गए और पूर्व की भांति उसे उखाड़ कर ले आए।तब महातेजस्वी वानरश्रेष्ठ सुषेण ने हनुमान् जी की अत्यंत प्रशंसा की और उन औषधियों को उखाड़ लिया तथा उन्हें कूट-पीसकर लक्ष्मण जी की नाक में दे दिया। जिसे सूंघते ही वे निरोग हो उठ बैठे।वाल्मीकि रामायण के उदीच्य पाठों में ‘कालनेमि और ग्राही का वृतान्त,हिमालय में गंधर्वों की चुनौती और हनुमान् द्वारा उनका वध, औषधि-पर्वत को वापस ले जाते समय राक्षसों का आक्रमण और पराजय’ जैसे प्रसंग भी मिलते हैं।जबकि भरत-हनुमान्-संवाद का प्रसंग मात्र गौडीय पाठ में मिलता है।
गौडीय और पश्चिमोत्तरीय पाठों में हनुमान् जी से अनुरोध किया जाता है कि वह सूर्योदय के पूर्व ही लौटें–यावद्रात्रिर्न हीयते।सूर्योदय के पूर्व ही हनुमान् के लौटने की जरूरत की बाद की रामकथाओं में प्राय: उल्लेख किया गया है।कृतिवास रामायण के अनुसार रावण के आदेशानुसार मध्यरात्रि में ही सूर्योदय हुआ था किंतु, हनुमान् ने सूर्य को अपनी कांख में दबा लिया।भावार्थ रामायण के अनुसार राम से भयभीत होकर हनुमान् के लंका पहुँचने के पहले उदित होने का साहस नहीं करते हैं।बलरामदास रामायण में लिखा है कि किसी ब्राह्मणी ने अपने पातिव्रत्य धर्म के बल पर बहुत समय तक सूर्योदय का समय टाल दिया था।
औषधि-पर्वत लाते समय भरत से हनुमान् के भेंट की प्राचीनतम कथा वाल्मीकि रामायण के गौडीय पाठ में उपलब्ध है।हिमालय की ओर जाते हुए हनुमान् को देखकर भरत को कौतूहल हुआ और उन्होंने बाण मारकर उन्हें नीचे गिराना चाहा किंतु,हनुमान् ने अपना परिचय देकर अपनी यात्रा का उद्देश्य प्रकट किया।भरत के प्रश्न के उत्तर में हनुमान् ने वनवास से लेकर लक्ष्मण के आहत होने तक सारा वृतान्त सुनाया और भरत को विजयी राम के शीघ्र वापस लौटने का भरोसा देकर हिमालय की ओर प्रस्थान किया।बाद की रचनाओं में इस कथा में कुछ परिवर्तन कर दिए गए हैं।जैसे प्राय: यह माना गया है कि हिमालय से लंका जाते समय हनुमान्-भरत की भेंट हुई थी।
महानाटक में माना गया है कि भरत ने पर्वत ले जाते हुए हनुमान् को आकाश में देखकर उन्हें बाण मारकर नीचे गिरा दिया था।’हा राम लक्ष्मण’ पुकार कर हनुमान् मूर्छित हो गए।तब वसिष्ठ उनको पर्वतीय औषधियों द्वारा चेतना में लाए।युद्ध वृतान्त सुनाने के बाद हनुमान् ने भरत की परीक्षा लेने के उद्देश्य से कहा–मैं बहुत थक गया हूँ,आप ही यह पर्वत लंका की ओर ले चलें।यह सुनकर भरत ने पर्वत के साथ हनुमान् को बाण पर बिठाकर धनुष-संधान किया।भरत का पराक्रम को देखकर हनुमान् को संतोष हुआ और बाण से उतरकर उन्होंने भरत के बाहुबल की प्रशंसा की।इसके बाद रुद्रावतार हनुमान् पर्वत को उठाकर चले गए और अर्धरात्रि में ही लंका के निकट पहुँच गए।
महानाटक के अनुसार ही रंगनाथ रामायण,तोरवे रामायण,आनन्द रामायण,भावार्थ रामायण, रामचरित मानस में कथा दी गई है।मानस की कथा के अनुसार भरत जी हनुमान् जी से बोले कि हे तात! तुम्हें जाने में देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जाएगा।इसलिए तुम पर्वत सहित मेरे बाण पर चढ़ जाओ,मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ श्रीराम हैं।भरत जी की बात सुनकर हनुमान् जी के मन में अभिमान उत्पन्न हो गया कि मेरे बोझ से बाण चलेगा कैसे?(सुनि कपि मन उपजा अभिमाना।मोरे भार चलिहि किमि बाना।।) फिर यह सोचकर कि प्रभु के प्रताप से सब कुछ संभव है, भरत जी के चरणों में वंदना कर बोले:-
“तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहऊँ नाथ तुरंत।
अस कहि आयसु पाई पद बंदि चलेउ हनुमंत।।”
इसीलिए हनुमान् जी को संकट मोचक कहा जाता है क्योंकि वे हर कष्ट-संकट की घड़ी में सबके काम आते रहते हैं।यहाँ तक कि वे अपने प्रभु राम,माता सीता और भाई लक्ष्मजी के संकट मोचक भी रहे हैं।

