8.3 हनुमान् जी: ‘सकल गुणनिधानम्’

8.3 हनुमान् जी: ‘सकल गुणनिधानम्’

आज गाँव-गाँव में हनुमान् जी के संकट मोचक रूप की पूजा होती है, जिसमें वे लक्ष्मण जी के प्राणों पर आए संकट को दूर करने के लिए हिमालय से विशाल औषधि पर्वत आकाशमार्ग से ले जा रहे हैं। लोगों को विश्वास है कि जब वे रामानुज लक्ष्मण की विपत्ति को टाल सकते हैं,तब उनकी विपत्ति को दूर करना उनके लिए कौन सी कठिन बात है। हनुमान् जी पर यह विश्वास लोगों का बहुत बड़ा सम्बल है। यह उन्हें आश्वस्त करता है कि एक महाशक्ति उनके साथ है जो कह रही है “घबराओ मत, मैं हूँ न।” जिससे उनके मन अतिरिक्त आत्मबल से भर जाते हैं और वे संकटों से पार पा जाते हैं।

अध्येताओं का मानना है कि संभवत: आठवीं शताब्दी से लेकर हनुमान् जी को रुद्र का अवतार माना जाने लगा था। जिसके कारण उनके प्रति भक्तिभाव जागृत हुआ और विकसित हुआ। शैव ग्रंथ ‘स्कंद पुराण’ शिव हनुमान् को आशीर्वाद देकर कहते हैं कि तुम्हारे सभी नाम कल्याणकारी होते हैं—उपकाराय लोकानां नामामि तव मारुते लोकानां नामामि तव मारुते। बाद के साहित्य के अनुशीलन से भी प्रतीत होता है कि १०वीं और १५ वीं शताब्दी के बीच हनुमद्भक्ति का पूर्ण विकास हुआ है। १५वीं शताब्दी के बाद साहित्य में उनकी मूर्ति की पूजा का स्पष्ट उल्लेख है और उनके कवच, मंत्र, स्तोत्र आदि भी मिलते हैं। आनन्द रामायण के अनुसार माता सीता ने हनुमान् को आशीर्वाद देते हुए कहा कि गाँव-गाँव में विघ्नशांति के उद्देश्य से तुम्हारी पूजा की जाएगी:

ग्रामारामपत्तनेषु ब्रजखेटकसद्मसु।

वनदुर्गपर्वतेषु सर्वदेवालयेषु च।।

नदीषु क्षेत्रतीर्थेषु जलाशयपुरेषु च।

वाटिकोपवनाश्वत्थ वटवृंदावनेषु ।।

त्वन्मूर्ति पूजयिष्यंति मानवा विध्नशांतये।

भूतप्रेतपिशाचाद्या नश्यंति स्मरणात्तव।।

इसमें विध्नशांति और भूत-प्रेतों का नाश हनुमत्पूजा का उद्देश्य कहा गया है। वास्तव में पंद्रहवीं शताब्दी से लेकर हनुमान् का संकटमोचन रूप सबसे लोकप्रिय है। आनन्द रामायण के मनोहर कांड में राम द्वारा विभीषण को प्रदत्त एक हनुमत्कवच अंकित है, जिसमें भूतोंं और ज्वरों की ही चर्चा है। इसी रामायण के राज्यकांड में सीता की हनुमत्पूजा का वर्णन किया गया है—गोमेयांजनेयं सा कुड्यां कृत्वार्च्य जानकी। अकरोत्प्त्यहं पृच्छवृद्धिं स्वांगुलिमात्रत:। सा कुड्यां कृत्वार्च्य जानकी। अकरोत्प्त्यहं पृच्छवृद्धिं स्वांगुलिमात्रत:।

लांगुलोपनिषद् में हनुमान् के मंत्रों का संग्रह है जिसमें एकादशरुद्रावतार, श्रीरामसेवक, कुमारब्रह्मचारी हनुमान् को भूत-प्रेतों का उच्चाटक, समस्त ज्वरों का विनाशक और सर्वशूलों का उन्मूलक कहा गया है। उन शूलों में एक बाँझपन भी है, जिसे दूर करने के लिए हनुमान् जी की पूजा होती है। तुलसीदास जी ने भी विनयपत्रिका में हनुमान् को ‘संकटसोचविमोचनी मूरती’ मूरती’ कहा है।

यह सत्य है कि सर्वत्र हनुमान् जी उनके संकट-मोचक रूप के कारण ही इतने अधिक लोकप्रिय हैं। किन्तु,साथ ही वे ‘बुद्धिमतां वरिष्ठम्’ ‘ज्ञानिनामग्रगण्यम्’ और ‘सकल गुणनिधानम्’ भी हैं और उनका यह स्वरूप भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उनके लिए प्रज्ञासूचक विशेषणों में से ‘महामतिॆ एवं मतिमान्’ का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। इनके अतिरिक्त ‘प्राज्ञ, महाप्राज्ञ, सुमहाप्राज्ञ, मेधावी, धीमान्, तत्ववित्, साधुबुद्धि, अचिंत्यबुद्धि, वाक्यज्ञ, वाक्यकोविद, वाक्यविशारद, वाक्यविदां श्रेष्ठ, प्रियवादी, कार्यविदां वर’ जैसे शब्दों का प्रयोग भी उनके लिए हुआ है। हनुमान् के संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं पर अधिकार का उल्लेख वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकांड में किया गया है। अशोकवन में सीता को देखकर वह इसलिए संस्कृत नहीं बोलने का निर्णय करते हैं कि सीता उनको कहीं रावण न समझ लें:

वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्।।

यदि वाचं प्रदस्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ।

रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति।।

अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत्।।

उत्तरकांड के उल्लेख की रचना के समय तक यह माना जाने लगा था हनुमान् ने सूर्य की सहायता से व्याकरण का अध्ययन किया था और सूर्य ने दक्षिणास्वरूप हनुमान् से यह प्रतिज्ञा कराई थी कि मैं सुग्रीव की सहायता करूँगा। उत्तरकांड में उनके द्वारा पठित व्याकरण के ग्रंथों का उल्लेख किया गया है। राम-लक्ष्मण से हनुमान् की प्रथम भेंट के अवसर पर हनुमान् के तीनों वेद और व्याकरण के ज्ञान का उल्लेख है:

नानृग्वेदविनीतस्य नाययजुर्वेदधारिणी:।

ना सामवेदविदुष: शक्यमेव विभाषितुम्।।

नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम्।

बहुव्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम्।।

हनुमान् जी को छंदशास्त्र का विशेषज्ञ भी माना जाता है। संभवत: इसी कारण उनको महानाटक (हनुमन्नाटक) की रचना का श्रेय दिया गया है। उस नाटक के अंत में लिखा हुआ है कि हनुमान् ने वाल्मीकि के अनुरोध पर हनुमान् ने अपनी रचना को शिला पर लिख कर समुद्र में फेंक दिया था तथा राजा भोज ने उसे निकलवाकर दामोदर मिश्र से इसका संपादन कराया था। एक वृतांत के अनुसार वाल्मीकि ने राम से कहा –“हनुमान् के नाटक के रहते मेरे रामायण का आदर नहीं होगा। हनुमान् तो प्रत्यक्षदर्शी हैं, मुझे तो ध्यान में ही आपकी कथा का परिचय मिला। इस पर राम ने हनुमान् से कह कर महानाटक समुद्र में फेंकवा दिया।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने विनयपत्रिका में हनुमान् जी को ‘वेदवेदान्तविद्’ की उपाधि दी है। कई रचनाओं में हनुमान् दार्शनिक विषयों की जिज्ञासा प्रकट करते हैं तथा राम से तत्संबंधी शिक्षा ग्रहण करते हैं। अध्यात्म रामायण के अनुसार सीता और उसके बाद राम ने भी हनुमान् को रामतत्व का रहस्य प्रकट किया था। अद्भुत रामायण में राम हनुमान् को अपना विष्णुरूप दिखा कर सांख्ययोग, भक्तियोग आदि समझाते हैं।

हनुमान् जी को ज्योतिषी और संगीतज्ञ भी माना गया है। महाभारत के हनुमान्-भीम संवाद के अनुसार हनुमान् गंधर्वों तथा अप्सराओं से रामायण का गान नित्य ही सुनते हैं। तुलसीदास ने विनयपत्रिका में हनुमान् को ‘गान-गुनगरवगंधर्वजेता’ ‘सामगायक’ ‘सामगाताग्रनी’ आदि कह कर पुकारा गया है। आज भी यह विश्वास किया जाता है कि जहाँ भी रामायण का सस्वर पाठ किया जाता है, हनुमान् जी उपस्थित रहते हैं।

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