8.10 लोक-देवता हनुमान्

8.10 लोक-देवता हनुमान्

हनुमान जी हमारे लोक जीवन में रचे-बसे ऐसे देवता हैं कि वे सभी को अपने से लगते हैं।किसी भी तरह के संकट आने पर सबसे पहले हम हनुमानजी को ही याद करते हैं।वे ही एक ऐसे देवता हैं जिनके बारे में भरोसे से कहा जा सकता है ‘सबहिं सुलभ,सब दिन,सब देसा।सेवत सादर समन कलेसा।।वे हैं भी इतने सरल कि न कोई वर्ग-भेद देखते हैं,न कोई जात-पांत।न उन्हें किसी विशेष पूजा पद्धति की जरूरत है, न ही किसी मंत्रोच्चार की।न उन्हें राजसी श्रृँगार चाहिए और न छप्पन भोग।उन्हें तो सरल मन से लगाया गया गुड़-चने का भोग ही पर्याप्त् है।फिर भला ऐसे सीधे-सरल पर महाप्रतापी देवता को कोई क्यों न याद करे।उनके प्रति गांव वालों की श्रद्धा तो बस देखते बनती है।इसीलिए उनके मंदिर गाँव-गाँव में मिल जाते हैं।माना जाता है कि जहाँ रामकथा होती है,वहाँ वे खुद ही हाजिर हो जाते हैं क्योंकि वे ‘प्रभु चरित्र सुनबे के रसिया’ जो ठहरे।

हनुमान जी सदा से राम-कथा और राम-दरबार के महत्वपूर्ण पात्र रहे हैं,पर स्वतंत्र देवता के रूप में उन्हें मान्यता कब मिली,यह कहना कठिन है।संभवत: आठवीं शताब्दी में हनुमान रुद्र के अवतार माने जाने लगे थे।इस कारण उनके प्रति भक्तिभाव जागृत होने लगा।स्कंद पुराण (रेवा खंड) में शिव हनुमान को आशीर्वाद देकर कहते हैं “उपकाराय लोकानां नमामि तव मारुते।” उस स्थल पर हनुमान के बारह नाम उद्धत हैं।इससे पता चलता है कि रेवा खंड के रचनाकाल में हनुमान के नामों का जप होने लगा था।सोलहवीं शती के पूर्व से ही उनकी मूर्तियों और मंदिर के प्रमाण मिलते हैं।किंतु,विष्णु धर्मोत्तर पुराण और वृहत संहिता के ‘प्रतिमा-लक्षण’ नामक खंड़ में हनुमान की प्रतिमाओं का जिक्र नहीं मिलता।बाद के साहित्य को देखने से पता चलता है कि दसवीं और पंद्रहवीं शती के बीच हनुमत भक्ति का पूर्ण विकास हुआ।पंद्रहवीं शताब्दी के बाद साहित्य में उनकी मूर्ति पूजा का स्पष्ट उल्लेख है और उनके मंत्र,कवच व स्तोत्र भी मिलते हैं।

उनके लिए “राम दुआरे,तुम रखवारे,होत न आज्ञा बिनु पैसारे” कहा अवश्य गया है, पर हनुमान जी की आज्ञा न केवल राम (वैष्णव भक्ति) अपितु शैव भक्ति के लिए जरूरी थी।अर्थात् शैव और वैष्णव दोनों भक्ति की धारा के संवाहक हनुमान जी ही हैं।

राम भक्ति का भाव समस्त मध्यकालीन राम साहित्य में व्याप्त है।इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि आदि रामायण के उत्साही व विश्वस्त राम सेवक हनुमान को उस साहित्य में आदर्श राम सेवक के रूप में प्रस्तुत करते।बहुत सी रचनाओं में हनुमान को राम भक्ति का आचार्य माना गया है।बाद के साहित्य में हनुमान को दिए गए वरदानों में उनकी राम भक्ति को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है।यहाँ तक कि उनके चिरंजीवी होने का प्रयोजन भी रामभक्ति ही बन जाता है।माना जाता है कि जहाँ भी राम कथा का पारायण होता है,वहाँ कथा सुनने हनुमान जी स्वयं पधार जाते हैं।

“यत्र यत्र कथा प्रचरिष्यति ते शुभा।

तत्र तत्र गर्ति मे अस्तु श्रवणार्थ सदैव हि।।”

रामकथा में हनुमान अपने सखाओं की अपेक्षा पराक्रमी और बुद्धिमान अवश्य हैं।पर यह मानना तर्कसंगत होगा कि हनुमान रामकथा के अन्य वानरों के समान ही वे भी वानर-गोत्रीय मानव थे।रामचरित मानस में हनुमान के वानरत्व विषयक विशेषणों का बाहुल्य है,किन्तु, महाकवि तुलसीदास ने हनुमान की जिस उच्चस्तरीय कल्पना और वंदना की है:

‘अतुलित बल धामं हेमशैलाभ्रदेहं, दनुजवन कृषाणुं ज्ञानिनाम अग्रगण्यम।सकल गुण निधान वानराणामधीशं,रघुपति प्रिय भक्तं वातजात नमामि।।’

इससे तो यही ध्वनित होता है कि वे हनुमान जी को निरा वानर नहीं मानते थे।उनके यही भाव अंगद-रावण संवाद प्रसंग के एक दोहे में भी मिलते हैं-

“सेन सहित तव मान मथि,वन उजारि पुर जारि।

कस रे सठ हनुमान कपि,गयउ जो तव सुत मारि।।”

अर्थात् सेना सहित तेरा मान मथ कर,अशोक वन को उजाड़ कर,नगर को जलाकर और तेरे पुत्र को मारकर जो लौट गए,क्यों रे दुष्ट!वे हनुमान क्या वानर हैं।

भक्तगणों के लिए हनुमान जी “अष्ट सिद्धी,नव निधि के दाता” और स्वामी हैं,इसलिए उनके लिए यह कठिन नहीं है कि भक्त उन्हें जिस कामना से पूजें,वे उसकी इच्छा पूरी करें।निष्काम भक्तों के संकटों को तो वे स्वत: ही दूर कर देते हैं।

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