“कल्पना के घन बरसते”

“कल्पना के घन बरसते”

अभी जब चारों ओर बादल (घन) बरस रहें हों, तब आप कहेंगे कि बरसते बादलों की कल्पना करने की अभी जरूरत ही क्या है। यह नजारा तो चारों ओर प्रत्यक्ष ही दिखाई दे रहा है। फिर भी आप कितनी भी कल्पना की कितनी ही उड़ान भर लें, आपको बारिश में गीत गीले होते नहीं दिखेंगे, न भाव रिमझिम करते दिखेंगे और न आप स्वरों को रसीले होते देख पाएँगे।

किन्तु, यदि कल्पना में देखने वाला कवि, हिन्दी के सुप्रसिद्ध गीतकार भरत व्यास हों तो सब संभव है। कहते हैं न ‘जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि।’ कल्पना की जितनी ऊँची उड़ान एक कवि भर सकता है, वह किसी और के बस की बात नहीं है। इस गीत में भावों को तरंगित करने वाले संगीतकार थे दादा वसंत देसाई। जो शास्त्रीय संगीत को कम से कम वाद्ययंत्रों के सहारे सरल और श्रवणीय धुनों में रच देते थे। प्रस्तुत गीत भी उन्हीं की रचना है। लता जी के दिव्य स्वरों का तो कहना ही क्या। उतने ही कोमलता से उनका साथ महेन्द्र कपूर भी इस गीत में निभाते हैं। यह गीत ‘फिल्म अमर ज्योति’ (1965) के लिए रचा गया था।

गीत कुछ इस प्रकार है….

लता– कल्पना के घन बरसते,

गीत गीले हो रहे

भाव रिमझिम कर रहे हैं (2)

स्वर रसीले हो रहे,

कल्पना के घन बरसते।

नाचतीं श्यामल घटाएँ, थिरकती बरसात है

महेन्द्र– इक कहानी बनके आई

ये सुहानी रात है (2)

झूमता फिरता पवन

लता– हो, झूमता फिरता पवन झोंके नशीले हो रहे

कल्पना के घन बरसते

लता– किस प्रणय की आग में जल गीत गाता है पवन

गीत गाता है पवन

महेन्द्र– मांग भरता है दुल्हन की मोतियों से ये गगन (2)

झुक रहे तेरे नयन (2)

कितने नशीले हो रहे

कल्पना के घन बरसते।

गीत पढ़ने से तो केवल शब्द पकड़ में आते हैं। पर यदि इस गीत का सम्पूर्ण असर महसूस करना हो तो इसे शांत वातावरण में सुनने की आवश्कता होगी। यू-ट्यूब पर यह गीत उपलब्ध है।

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