8.12 भगवान शिव के आराध्य श्रीराम

8.12 भगवान शिव के आराध्य श्रीराम

हमारे यहाँ अगर आध्यात्म की बात छेड़ दी जाए तो साधु-संतों की तो छोड़िए,आम आदमी भी उपदेश के मूड़ में आ जाता है। वह भी संसार को असार,मिथ्या और माया बतलाने लगता है।गृहस्थी उसे बोझ और सन्यास उसे मोक्ष का मार्ग लगने लगता है।उसे ऐसा लगना स्वाभाविक भी है।हमारे साधु-संतों, उपदेशकों, प्रवचनकारों से उसे सदा से यही सब सुनने को मिलता रहा है।सदियों से हमारे ग्रंथ-पुराण भी निवृति का मार्ग ही सुझा रहे हैं।यद्यपि,शुरू से ऐसा नहीं था।वैदिक हिन्दू प्रवृतिमार्गी थे।वैदिक काल जीवन के प्रति आस्था का काल था।उनके ऋषि भी गृहस्थ और धर्माचार्य भी बाल-बच्चों वाले होते थे।जो लोग वैदिक मंत्रों के स्रष्टा थे,ऊँचे दार्शनिक सिद्धाँतों के आविष्कर्ता थे।वे खेती-किसानी और गौओं का पालन-पोषण कर परिवार का पालन और अतिथियों की सेवा करते थे।जब समाज प्रवृतिमार्गी होता है,तब शारीरिक श्रम को हेय नहीं माना जाता।उस समय हलवाहे और विद्वान,दोनों एक समान उद्यमी होते हैं।वैदिक लोगों का समाज ऐसे ही कर्मठ लोगों का समाज था।

परन्तु,उपनिषद काल में सोच और परिस्थितियों में बदलाव आने लगा था।इस युग में समाज में सन्यास की भावना फैलने लगी थी।तब पंड़ितों ने यह सिद्धांत निकाला कि जीवन का सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य मोक्ष है और मोक्ष पाने के लिए कामिनी और कंचन का त्याग जरूरी है।नतीजा यह निकला कि हट्टे-कट्टे नौजवान सन्यासी होने लगे और गृहस्थों व महिलाओं की प्रतिष्ठा समाज में घटने लगी।फिर भी गृहस्थ जीवन अभी तिरस्कृत नहीं हुआ था।इस युग में राजा जनक रूप में हम ऐसे आदर्श को पाते हैं,जो मन से सन्यासी थे और कर्म से गृहस्थ।किंतु,बाद के समय में जैन और बौद्ध धर्माचार्यों ने सन्यास की इतनी महिमा गाई कि सारा समाज सन्यासियों से भर गया।

तब से भारत में सदियों तक निवृति-निवृति की ऐसी भयानक आवाज गूंजती रही कि उसने समाज को पलायनवादी बना दिया।कोई ऐसा सुधारक भी पैदा नहीं हुआ,जो समाज को फटकारे कि निवृति की अधिकता मनुष्य को कायर और दरिद्र बना देती है।दार्शनिक स्तर पर जगत को असत्य कहते-कहते हिन्दुओं ने उसे,सचमुच ही असत्य मान लिया।हर एक हिन्दु माँ के पेट से ही यह विश्वास लेकर आने लगा कि परलोक की साधना सबसे श्रेष्ठ सुकर्म है,चाहे यह लोक हमारे हाथ से छूट ही क्यों न जाए।

१९ वीं सदी में जा कर इस सोच में परिवर्तन आया,जब नवोत्थान के सभी नेताओं ने यह घोषणा की कि प्रवृति का मार्ग ही विजय का मार्ग है और जो निवृति की ओर जाता है,वह वास्तव में दुनिया और जीवन से भाग रहा है।वेदान्त को लोग सन्यास का पथ मानते आए थे।किंतु,स्वामी विवेकानंद जी से वही वेदांत घोर कर्मनिष्ठा समर्थक बन कर उतरा और सारा हिंदुत्व का दर्शन उनकी वाणी में प्रवृतिवादी हो उठा।इसी समय सबसे बड़ा काम लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने किया,जिनका गीता-विषयक ग्रंथ ‘कर्मयोगशास्त्र’ नए हिंदुत्व का सर्वश्रेष्ठ आचार ग्रंथ माना जाता है।उन्होंने पहले-पहल धर्म का व्यावहारिक पक्ष बताया कि धर्म वह नहीं है,जो स्मृतियों में लिखा है,वस्तुत: योग्य उपायों द्वारा आत्म-रक्षा का प्रयास और अन्याय का विरोध भी धर्म ही है।उस समय तिलक के ये उपदेश वीरता,निर्भीकता और सच्चाई के सबसे बड़े उपदेश थे।और आज के समय में भी इनकी महत्ता बनी हुई है।

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