5.2 कैसी थी श्रीराम की कद-काठी

5.2 कैसी थी श्रीराम की कद-काठी

रामचरित मानस की कथा तो हम जानते ही हैं कि जब हनुमान् जी माता सीता से भेंट करने लंका गए तो उन्होंने अपना आकार सूक्ष्म बना लिया और वे अशोक के वृक्ष पर चढ़ कर स्वयं को पत्तों में छिपा कर बैठ गए। वहाँ कुछ देर बाद अंत:पुर की स्त्रियों के साथ रावण आया।उसने सीता जी को कई प्रलोभन दिए, डराया-धमकाया, ताकि सीता उसकी पत्नी बनने के प्रस्ताव को मान लें। पर सीता जी टस से मस नहीं हुई और उसे बहुत खरी-खोटी सुनाई । यह सुनकर वह बहुत क्रोधित हो गया । अंत में वह बोला कि या तो तू मेरी बात मान ले नहीं तो दो महीने बाद तू जीवित नहीं रह पाएगी। इसके बाद सीता जी बहुत अवसाद में आ गईं और शोक में डूब गई। बाद में हनुमान् जी ने श्रीराम के गुण गाए, जिससे उनका चित्त शांत और हर्ष से भर गए । हनुमान् जी वृक्ष से नीचे उतरे और हाथ जोड़ कर उनसे हर तरह से विश्वास दिलाया कि वे श्रीराम के भेजे हुए राम-दूत ही हैं। तब माता सीता ने उन पर भरोसा किया और अपनी दुु:ख भरी कहानी सुनाई । हनुमान् जी ने भी श्रीराम की विरह-जनित व्याकुलता और पीड़ा के बारे में बताया ।

किन्तु, बात इतनी सरल और सीधी भी नहीं थी । हनुमान् जी रावण और सीता के संवादों को सुना था। उन्होंने देखा कि उसके जाने के बाद सीता जी संताप और दु:ख से व्याकुल कभी अशोक का सहारा लेकर खड़ी हो जाती कभी बैठ जाती हैं। हनुमान् जी बहुत असमंजस में थे कि सीता जी से भेंट और बात कैसे की जाए। अगर वे संस्कृत में संभाषण करेंगे तो सीता जी डर जाएंगी और उन पर बिल्कुल भरोसा नहीं करेंगी । क्योंकि, लंका में संस्कृत बोलने वाले तो बहुत लोग हैं। रावण तो स्वयं महापंड़ित है । वह अभी संस्कृत में ही संभाषण करके गया । इसलिए उन्होंने सोचा कि मुझे अवध के आसपास की लोकभाषा में बात करना चाहिए। यह निश्चय कर उन्होंने लोकभाषा में राम-कथा सुनाना शुरू की, जिसे सुन कर सीता जी हर्ष और आनंद से भर गईं ।

राजा दशरथ को दिए गए वचन की पूर्ति में किस प्रकार राम वन को आए, कहाँ-कहाँ उन्होंने विश्राम किया, किस तरह वे पंचकुटी पहुँचे, सीता जी आग्रह पर वे किस तरह स्वर्णमृग के पीछे दौड़े, वन से सीता और लक्ष्मण के नाम की पुकार सुन कर किस तरह सीता जी लक्ष्मण को श्रीराम की सहायता के लिए जाने को बाध्य किया। कुटिया को सूनी देख कैसे रावण साधु का वेष बनाकर आया और आप को हर के लंका ले आया । आपकी पुकार सुन कैसे जटायु ने आपको बचाने के लिए रावण से युद्ध किया और घायल होकर गिर पड़ा । वापस लौटने पर राम कुटिया में आपको न पाकर व्याकुल हो गए और आपको ढूँढ़ने निकले। उनकी भेंट जटायु से हुई जो मरणासन्न था। उसकी विधिवत् अंत्येष्टी के बाद वे आपको ढूँढ़ते-ढूंढ़ते दक्षिण दिशा की ओर ऋष्यमूक पर्वत तक पहुँच गए। जहाँ उनकी भेंट और मैत्री सुग्रीव से हुई, जो कि किष्किंधा का राजा था और अपने बड़े भाई द्वारा राज्य छीन कर निर्वासित कर दिया गया था। श्रीराम ने भी उसे अपनी आपबीती सुनाई। दोनों ने एक-दूसरे की सहायता का वचन दिया । तब सुग्रीव के साथ द्वंदयुद्ध के बीच राम ने वाली का वध करके वानरों का राज्य सुग्रीव को दे दिया। उसके बाद वानरराज सुग्रीव की आज्ञा से हजारों वानर सीता देवी का पता लगाने के लिए सम्पूर्ण दिशाओं में निकले हैं। युवराज अंगद के नेतृत्व में दक्षिण दिशा को निकले दल में मैं भी हूँ। जो समुद्र को लांघ कर आप तक आ पहुंचा हूँ और आपके दर्शन कर कृतकृत्य हो गया हूँ।

हनुमान् जी के मुख से सारी कथा सुन कर सीता जी विस्मय से भर गईं। सुखद आश्चर्य के साथ उन्होंने सब ओर दृष्टि दौड़ाई । तब अशोक वृक्ष की एक शाखा के भीतर छिपे हुए पिंगल वर्ण वाले श्वेतवस्त्र धारी हनुमान् जी पर उनकी दृष्टि पड़ी। तब हनुमान् जी वृक्ष से उतर कर विनीत भाव से उनके पास आ बैठे। सीता और हनुमान् के परस्पर दर्शन से दोनों को ही अद्भुत प्रसन्नता प्राप्त हुई। वे दोनों विश्वस्त होकर परस्पर वार्तालाप करने लगे।

शोक संतप्त सीता की बात सुनकर हनुमान् उनके कुछ अधिक निकट चले गए। हनुमान् जी ज्यों ज्यों निकट आते, त्यों-ही-त्यों-त्यों सीता जी को शंका होती कि यह रावण ही न हो। लंका तो है ही मायानगरी और रावण तो महामायावी है। वे मन ही मन सोचने लगीं- अहो! धिक्कार है, जो इसके सामने मैंने अपने मन की बात कह दी। यह दूसरा रूप धर कर आया हुआ रावण ही है। यह सोच कर वे बहुत भयभीत हो गईं।

उसके बाद हनुमान् जी ने सीता जी के चरणों में प्रणाम किया । वानर को बार-बार वंदना करते देख कर उनसे मधुर वाणी में बोलीं– वानरश्रेष्ठ, सचमुच यदि तुम राम के दूत हो तो तुम्हारा कल्याण हो। वानर, मेरे प्रियतम श्रीराम के गुणों का वर्णन करो। सीता जी के वचन सुन कर हनुमान् जी ने बतलाना आरंभ किया।

“श्रीराम सूर्य के समान तेजस्वी, चंद्रमा के समान लोककमनीय और देव कुबेर की भाँति सम्पूर्ण जगत के राजा हैं। महायशस्वी भगवान विष्णु के समान पराक्रमी और बृहस्पति जी की भाँति सत्यवादी और मधुरभाषी हैं। रूपवान्, सौभाग्यशाली और कांतिमान तो इतने हैं कि मानों मूर्तिमान् कामदेव हों। “

यह सुनकर सीता जी को आनंद तो आ रहा था फिर भी वे आश्वस्त नहीं हो पा रही थीं। वे मन ही मन सोच रही थीं कि श्रीराम के जिन गुणों का हनुमान् ने वर्णन किया है, वे किसी से सुनकर भी बताए जा सकते हैं।इसलिए क्यों न मैं इनसे राम के शारीरिक लक्षणों के बारे में पूछूँ, क्योंकि वह तो ऐसा व्यक्ति ही बता सकता है, जो सचमुच श्रीराम के निकट रहा हो। यह सोच कर सीता जी ने हनुमान् जी से पूछा ‘मुझे बताओ कि श्रीराम और लक्ष्मण की आकृति कैसी है? उनकी रूप किस तरह का है? उनकी जाँघें और भुजाएँ कैसी हैं।?’

सीता जी के ऐसा पूछने पर हनुमान् जी ने श्रीराम के स्वरूप का यथावत वर्णन शुरू किया।

‘उनके कंधे मोटे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, गला शंख के समान और मुख सुन्दर है। गले की हँसली मांस से ढकी हुई है और नेत्रों में कुछ- कुछ लालिमा है।’

‘उनका स्वर दुन्दुभि के समान गंभीर और शरीर का रंग सुंदर व चिकना है। उनके सभी अँग सुडौल और बराबर हैं। उनकी कान्ति श्याम है।’

उनके तीन अँग (वक्ष:स्थल, कलाई और मुट्ठी) सुदृढ़ हैं। भौहें, भुजाएँ और मेढ्र लम्बे हैं। केशों के अग्रभाग, अण्डकोष और घुटने- ये तीन अँग समान है। वक्ष:स्थल, नाभि की किनारे का भाग और उदर– ये तीन उभरे हुए हैं। नेत्रों के कोने, नख और हाथ-पाैर के तलवे–ये तीनों लाल हैं। स्वर, चाल और नाभि– ये तीन गंभीर हैं। ‘

उनके उदर और गले में तीन रेखाएँ हैं। तलवों के मध्यभाग, पैरों की रेखाएँ और सिर के बाल — ये तीनों चिकने हैं और स्वर, नाभि– ये तीन गंभीर हैं। ‘

‘उनके उदर और गले में तीन रेखाएँ हैं। तलवों के मध्यभाग पैरों स्तनों के अग्रभाग–ये तीन धँसे हुए हैं। गला, पीठ तथा पिंडलियाँ– ये चार अँग छोटे हैं। मस्तक में तीन भँवरें हैं। पैरों के अँगूठे और ललाट में चार-चार रेखाएँ हैं। वे चार हाथ ऊँचे हैं। उनके कपोल, भुजाएँ, जाँघें और घुटने– ये चार अँग बराबर हैं।

‘ शरीर में जो दो-दो की संख्या में चौदह ( भौंहे, नथुने, नेत्र, कान, ओंठ, स्तन, कोहनी, कलाई, जाँघ, घुटने, अण्डकोष, कमर के दोनों भाग, हाथ और पैर) अँग होते हैं,वे भी परस्पर सम हैं। उनकी चारों कोनों की चारों दाढ़ें शास्त्रीय गुणों से युक्त हैं। वे सिंह, बाघ, हाथी और साँड़–इन चार के समान चार गतियों से चलते हैं। उनके ओंठ, ठोढ़ी और नासिका–सभी प्रशस्त हैं। केश, नेत्र, दाँत, त्वचा और पैर के तलवे–इन पाँचों अँग में स्निग्धता भरी हुई है। दोनों भुजाएँ, दोनों जाँघें, दोनों पिंडलियाँ, हाथ और पैर की अँगुलियाँ- ये आठ अँग लंबे हैं। ‘

‘उनके नेत्र, मुख-विवर, मुखमंडल, जिह्वा. ओंठ, तालु, स्तन, नख, हाथ और पैर–ये दस अँग कमल के समान हैं। छाती, मस्तक, ललाट, गला, भुजाएँ, कँधे, नाभि, चरण, पीठ और कान– ये दस अँग विशाल हैं। वे श्री, यश और प्रताप तीनों से व्याप्त हैं। पार्श्व भाग, उदर, वक्ष:स्थल, नासिका, कंधे और ललाट–ये छ: अँग ऊँचे हैं। केश, नख, लोम, त्वचा, अँगुलियोंं के पोर, शिश्न, बुद्धि और दृष्टि आदि नौ सूक्ष्म (पतले) हैं तथा वे पूर्वाह्न, मध्याह्न और अपराह्न– इन तीनों कालों द्वारा क्रमश: धर्म, अर्थ और काम का अनुष्ठान करते हैं। ‘

उनके सौतेले भाई लक्ष्मण भी बड़े तेजस्वी हैं। अनुराग, रूप और सद्गुणों में श्रीराम के समान हैं। उन दोनों भाइयों में इतना अंतर है कि लक्ष्मण के शरीर की कांति सुवर्ण के समान गौर है और महायशस्वी श्रीराम का विग्रह श्यामसुंदर है। वे दोनों नर श्रेष्ठ आपके दर्शन के लिए उत्कंठित हो सारी पृथ्वी पर आपकी खोज करते हुए हम लोगों से मिले थे।

देवी, मैं दशरथनंदन श्रीराम का दूत हूँ और आपके दर्शन के निमित्त यहाँ आया हूँ। आप मुझे सुग्रीव का मंत्री और वायुदेवता का पुत्र हनुमान् समझें। यह कह कर हनुमान् जी चुप हो गए।

यह सुन कर माता सीता परम् संतुष्ट, आश्वस्त और आनंदित हुईं। पूर्व में उनके मन में जो शंकाएँ थीं, वह जाती रहीं। अब उन्होंंने हनुमान् जी को श्रीराम का सच्चा दूत और समर्पित भक्त के रूप में देखा, जिससे उनके मन में हनुमान् जी के प्रति स्नेहयुक्त वात्सल्य भाव उमड आया।

(श्रीराम के विग्रह से संबंधित विवरण वाल्मीकि रामायण के अनुसार।)

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