
यदि यह कहा जाए कि माता सीता ही कोलकाता की महाकाली हैं, यह बात कई आस्थावानों को अटपटी लगेगी। क्योंकि, प्रचलित कथाओं के अनुसार भगवती पार्वती ही महाकाली के रूप में कोलकाता में विराजमान हैैं। उन्होंने दैत्यराज शुंभ और निशुंभ के साथ युद्ध के समय अपने नौ रूप प्रकट किए थे, जिसमें एक रूप काली या महाकाली का भी था। इसी स्वरूप को बाद में कोलकाता में स्थापित किया गया। एक और कथा के अनुसार भगवान शिव जब माता सती के शव को लेकर जा रहे थे तब उनका अँगूठा यहाँ गिरा था, इसीलिए इस स्थान को शक्तिपीठ की मान्यता है। उनके शरीर का जो हिस्सा जहाँ गिरा वहाँ एक शक्तिपीठ स्थापित हो गया। इस तरह भारतभर में इक्कावन शक्तिपीठो॓ं की स्थापना हुई।
किन्तु, यहाँ बात माता सीता की चल रही है। अधिकांश रामकथाओं में सीताजी का चित्रण एक लाचार और विवश नारी के रूप में किया गया है। जिनमें उनका अपना कई स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं है। वे सदैव अपने पति की अनुगामिनी और छाया बनी रहती हैं। जैसा वे चाहते हैं, वैसा करती हैं। पर कुछ कथाएँ ऐसी भी हैं, जहाँ उनका स्वतंत्र और ओजस्वी स्वरूप उभरता है। वे ऐसे प्रबल शत्रुओं का संहार करने के लिए, जिनका विनाश राम भी नहीं कर पाते हैं, वहाँ अपने तेजस्वी रूप को प्रकट करती हैं। ऐसी कथाएँ कुछ रामायणों में हैं और कुछ लोकगाथाओं में भी।
उड़िया रामसाहित्य में इस कथा के दो अन्य रूप मिलते हैं। सारलादास कृत विलंका रामायण के पूर्व-खंड के अनुसार विलंका लंका के दक्षिण मेंं एक सौ बीस योजन की दूरी पर स्थित थी। जब वहाँ के राजा सहस्त्रस्कंध ने राम, लक्ष्मण और हनुमान् को परास्त किया था, तब सीता ने मंगलादेवी से पुष्प-धनुष और पाँच बाण प्राप्त कर रणभूमि में प्रवेश किया। उन्होंने मनोहर रूप धारण कर पुष्प-धनुष से पाँच शर रावण पर चलाए और राम ने कामातुर रावण के सारे सिर काट दिए। विलंका उत्तरखंड की कथा के अनुसार दशानन रावण के वध तथा विभीषण के अभिषेक के बाद, पहले अंगद को और बाद में हनुमान् को सहस्त्रस्कंध रावण के पास संधि करने के उद्देश्य से विलंका भेजा गया। सहस्त्रस्कंध रावण संधि का प्रस्ताव ठुकराकर युद्ध करने आया। उसने राम-लक्ष्मण मूर्च्छित करके सीता का अपहरण करना चाहा किन्तु सीता के शरीर से एक गंधर्व सेना निकली जिसने रावण का वध किया। विलंका रामायण में ही एक कथा यह भी दी गई है कि काली का रूप धारण करने वाली सीता ने किस प्रकार लक्षशीर्ष रावण का वध किया और बंगाल में स्थापित हो गईं।
आनंद रामायण में भी इस प्रकार की दो कथाएँ हैं। राज्यकांड की कथा के अनुसार शतशीर्ष रावण श्रोण नदी के तट पर मायापुरी में निवास करता था। कुम्भ का पोता निकुंभ पुत्र पौंड्रक उससे सहायता मांगने गया; दोनों ने मिलकर विभीषण को परास्त कर दिया और लंका में राज्य करने लगे। विभीषण सहायता के लिए राम के पास आया। राम सीता विभीषण के साथ लंका चले गए। राम युद्ध में परास्त हुए किन्तु सीता ने शतशीर्ष रावण और पौंड्रक दोनों का वध किया।
तत्वसंग्रह रामायण की कथा के अनुसार किसी मुनि ने एक दिन अयोध्या आकर राम से कहा कि एक शतानन रावण रक्तबिंदु नामक असुर सप्तसिंधु के पार निवास करता है। सीता ने उस रावण का वध करने की इच्छा प्रकट की; राम ने उस प्रस्ताव को स्वीकार किया और सीता तथा हनुमान् को एक विशाल सेना के साथ पुष्पक पर भेज दिया। सीता ने युद्ध में १८ भुजाओं वाला विकट रूप धारण कर शतानन रावण का वध किया।
आनंद रामायण की दूसरी कथा के अनुसार शतशीर्ष रावण के वध के कुछ समय बाद विभीषण फिर राम से सहायता मांगने के लिए अयोध्या आया। अबकि बार कुम्भकर्ण के मूलकासुर नामक पुत्र ने पाताल-निवासी राक्षसों की सहायता से छः महीने घमासान युद्ध के बाद विभीषण को लंका से निकाल दिया था। राम ने अपनी और सुग्रीव की सेना के साथ विमान पर चढ़ कर लंका के लिए प्रस्थान किया। लंका में सात दिन तक मूलकासुर के साथ युद्ध हुआ। जिसमें पहले की तरह हनुमान् ने द्रोणाचल लाकर मृत वानरों को जिलाया। इसके बाद ब्रह्मा ने आकर राम से कहा कि एक तो मैनें मूलकासुर को यह वर दिया है कि वह किसी वीर के हाथ से नहीं मरेगा; दूसरे, किसी ऋषि ने उसको सीता के हाथों मरने का शाप दिया। यह सुनकर राम ने गरुड़ को आदेश दिया कि वह सीता को ले आए। सीता ने लंका पहुँचकर अपनी तामसी छाया को युद्ध के लिए प्रेरित किया। इतने में वानर मूलकासुर का यज्ञ विध्वंस करके लौटे। अब छाया ने चंडी का रूप धारण कर लिया और सात दिन तक युद्ध करने के बाद मूलकासुर का वध किया। मान्यता है कि सीता जी के इसी चंडी स्वरूप ने वहाँ से जाकर कोलकाता में विश्राम किया।
ब्रजलोक साहित्य में प्रचलित एक कथा के अनुसार सीता ने पलंका (पाताल लंका) निवासी सहस्त्रस्कंध रावण का वध किया और इसके बाद वो कलकत्ते में कालमाई हो गयीं।
आगारिया नाम की आदिवासी जाति में सहस्त्रस्कंध रावण के बारे में प्रचलित कथा के अनुसार रावण वध के बाद सीता ने राम से कहा कि पाताल में एक सहस्त्रस्कंध रावण निवास करता है। इस पर राम ने बाण मार कर उसे आहत तो किया किन्तु, उसने राम-बाण को अपने पैरों से निकाल कर कहा कि जिसने तुमने भेजा है उसी के पास जाकर उसको मार डालो। बाण के आधात से राम मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े। तब सीता, राजा लोगुन्दी के पास गईं और उनसे लोहे का एक पात्र मांग लिया। साथ ही यह निवेदन भी किया कि आज्ञासुर और लोहासुर मेरे साथ भेज दिए जाएँ। राजा की अनुमति प्राप्त होने पर एक हाथ में लोहे का पात्र और दूसरे हाथ में तलवार लेकर उन दोनों के साथ चल पड़ीं। कोयले के धुएँ के कारण सीता का रंग काला पड़ गया। उन्होंने रावण के पास पहुँच कर रावण के सिर काट डाले और आज्ञासुर और लोहासुर ने रावण का रक्त पी लिया। इसके बाद आकर वे कोलकाता में निवास करने लगीं।
