“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो”

“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो”

“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो” अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘कामायिनी’ में ऐसा लिख कर हिंदी के महान छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद ने नारियों के प्रति सचमुच अपनी श्रद्धा व्यक्त की या नारियों को प्रेम,सौंदर्य,कोमलता और त्याग की प्रतिमूर्ति बताकर एक दायरे तक सीमित कर दिया और उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व को नकार दिया।

समाज में समान महत्व रखते हुए भी नर-नारी का आपसी संबंध सदा से विवाद का विषय रहा है।जबकि,सच्चाई तो यह है कि नारी है तो गृहस्थी है,नारी है तो नव-जीवन है। इसलिए,जब-जब प्रवृति-मार्ग का उत्थान हुआ,नारी और गृहस्थ,दोनों की पद-मर्यादा में वृद्धि हुई है। ऐसा समय वैदिक काल में था । यह समष्टिवादी युग था। जिसमें समाज की वृद्धि और मजबूत संगठन के लिए दोनों के बराबरी के सहभागिता की जरूरत थी।

किन्तु,उसके बाद व्यष्टिवादी युग आया जिसमें प्राय: निवृति-मार्ग का ही असर रहा रहा है। इसलिए,नारी की स्थिति पुरुषों के मुकाबले हमेशा कमतर आंकी गई। समाज में उनकी प्रतिष्ठा थी,जो निजी मुक्ति के लिए वैराग्य ले लेते थे। चूँकि, वैरागियों के लिए नारी किसी काम की चीज नहीं थी, इसलिए सभी संत उसे पाप की खान बताते चले गए। बुद्ध और महावीर ने स्त्रियों को भिक्षुणी होने का अधिकार देकर पुरुषों के समान जरूर माना। किन्तु,बुद्ध को भी इस बात का पछतावा था कि उन्होंने ऐसा किया है। उन्होंने अपने शिष्य आनंद से कहा-“आनन्द!मैंने जो धर्म चलाया वह पाँच सहस्त्र वर्ष तक चलने वाला था,किन्तु,अब वह केवल पाँच सौ वर्ष तक चलेगा,क्योंकि नारियों को मैंने भिक्षुणी होने का अधिकार दे दिया है।”और हुआ भी यही। बुद्ध के पाँच सौ साल बाद ही, महायान सम्प्रदाय निकला जो बहुत उदार था और बौद्ध-मत धीरे-धीरे हिंदुत्व के अँक लौटने लगा। ठीक इसी समय,जैनों में दिगम्बर-सम्प्रदाय का प्रवर्तन हुआ,जिसके आचार्यों ने मुनि-धर्म में यह संशोधन उपस्थित कर दिया कि पुरुष योनि में जन्मे बिना भिक्षुणियों को मुक्ति नहीं मिलेगी,इसलिए महिलाओं का भिक्षुणी बनना व्यर्थ है।

किन्तु,शाक्त-दर्शन ऐसे विचारों से सरोकार नहीं रखता था। इस दर्शन के अनुसार नारी-मात्र पूजनीय समझी जाने लगी। खासकर, माताओं और बालिकाओं का शाक्त-धर्म में बहुत ऊँचा और पवित्र स्थान है। शाक्त-तंत्र में स्त्रियों पर हाथ उठाने की मनाही है। महानिर्वाण-तंत्र का कहना है कि जो पति अपनी पत्नी को कु-वाक्य कहता है,उसे प्रायश्चित स्वरूप एक दिन का उपवास करना चाहिए। यह भी कि विवाह के पूर्व बालिकाओं को भलि-भाँति पढ़ा-लिखाकर उन्हें सुयोग्य बना देना चाहिए। आगम नारी-मात्र को शक्ति मानते हैं और उनके अनुसार किसी भी स्त्री के साथ अच्छा व्यव्हार न करना अपराध है।किन्तु,इन शास्त्रों के उपदेशों का समाज में बहुत असर हुआ होगा,ऐसा प्रतीत नहीं होता।क्योंकि,समाज आजतक वैसा ही महिला विरोधी बना हुआ है।

आधुनिक काल के शुरुआत में पश्चिमी दुनिया में जन्में उदार विचारों के परिणाम की वजह से नारी भी अपनी स्वाधीनता के लिए संधर्ष करने लगी। स्वतंत्रता का असली मतलब आर्थिक स्वाधीनता ही है।पर,पुरुष का अहम नहीं चाहता कि नारी आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो।इसलिए वह कहता है कि मेरी महीने भर की कमाई तुम्हें समर्पित है। तुम इसे चाहे जैसे खर्च करो। पर कार्यालय और कल-कारखाने में जाकर अपना रूप-रंग मत खराब करो। और नारी इस प्रलोभन को सहर्ष स्वीकार कर लेती है। वह अपनी यह प्रशस्ति सुन कर मगन है कि नारी सौंदर्य की देवी है,सुधा और चांदनी है,मंदार और जूही की माला है।

कवियों और दार्शनिकों ने भी नारी को एक प्रलोभन यह कह कर दिया है कि वह पुरुष की प्रेरणा का स्त्रोत है,नारी से प्रेम और प्रेरणा पाकर वह बड़े-बड़े कार्य कर ड़ालता है। यह कि हर सफल पुरुष के पीछे स्त्री का हाथ होता है। महिलाएँ यह सुनकर खुश क्यों हो लेती हैं कि वे पुरुषों कि प्रेरणा-स्त्रोत हैं, उनकी शक्ति हैं। वे विचार क्यों नहीं करतीं कि क्या उनका सारा जीवन पुरुषों को प्रेरित करने के लिए है। क्या उनका अपना कोई ध्येय नहीं हो सकता। क्या उन्हें भी अपने व्यक्तित्व का स्वतंत्र विकास नहीं करना है। ऐसे तमाम सवाल है,जिनका समाधान नारियों को ही खोजना होगा। प्रकृति ने नर-नारी की रचना एक ही तत्व से की है।इसलिए,जो पुरुष के लिए संभाव्य है,वह स्त्री के लिए भी असंभव नहीं हो सकता। अपितु,महिलाओं में मातृत्व ऐसा गुण अवश्य है,जिसके कारण नारी,नर से भी श्रेष्ठ हो जाती है।

आज की बदली हुई परिस्थिति में यद्यपि, नारी उन तमाम क्षेत्रों में प्रवेश कर रही हैं,जिनमें अभी तक पुरुषों का ही वर्चस्व था।अब तो बल्कि,हर क्षेत्र में नारी अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर रहीं हैं,जो कि समाज के लिए शुभ-संकेत है।

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