जानकार लोग बतलाते हैं कि यदि आत्मसाक्षात्कार करना हो, तो गहरे ध्यान में उतरना होगा। इतने गहरे कि जिसमें विचार खो जाएँ ,मन खो जाए । यहाँ तक कि दैहिक बोध भी खो जाए। किन्तु, क्या ऐसी अवस्था आ पाना मुमकिन है? विचार खोने का विचार भी आखिर एक विचार ही तो है। क्या यह आत्मसम्मोहन की एक अवस्था मात्र नहीं है?
ओशो इस बारे में बहुत जोर देते थे कि जैसे-जैसे आप गहराई में उतरते जाते हैं, वैसे वैसे विचार, मन सब छूटता जाता है। आपको नए-नए अनुभव होते जाते हैं, यदि आपकी ऐसी अवस्था अखण्ड़ बनी रही तो आप को दिव्य ज्योति, दिव्य प्रकाश का दर्शन होता है। जिससे परम् शाँति, परम् आनंद प्राप्त होता है और जिसके बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहता। यही है आत्मसाक्षात्कार या ईश्वर दर्शन।
बौद्ध-दर्शन में भी ध्यान की एक बहुत प्राचीन पद्धति या तकनीकी का विधान है। जिसे “विपस्सना” या विपश्यना नाम से जाना जाता है। इस ध्यान तकनीक का उद्देश्य मानसिक विकारों को दूर करना और परम् मुक्ति के सर्वोच्च आनंद को प्राप्त करना है। विपश्यना एक आत्म अन्वेषणात्मक यात्रा है जो मन और देह के मूल को समझने और आत्म अशुद्धियों को कम करने के लिए प्रेरित करती है।
पर मुझ जैसा एक साधारण व्यक्ति क्या करे जो आत्मसाक्षात्कार के लिए ध्यान की इतनी गहराईयों में उतरने में समर्थ नहीं पाता हो। जिसके मन में विचार सतत चलते हैं। यहाँ तक कि नींद में भी विचार सपनों के रूप में श्रृंखलाबद्ध आते रहते हों। जिसके लिए विचारशून्य होना भी मात्र एक परिकल्पना हो। क्या वह कभी ऐसी गहरी विचारशून्य अवस्था में नहीं पहुंच सकता?
आम तौर पर इसका उत्तर नहीं में ही मिलेगा। क्योंकि, शरीर की हर अवस्था में आपके मन में विचार चलते रहते हैं और देहबोध बन रहता है। पर हाँ, कभी-कभी ऐसी अवस्था भी आती जब सब कुछ खो जाता है। मुझे ऐसी अवस्था से कई बार गुजरना पड़ा है। वह है गहरी निश्चेतना अर्थात् बेहोशी की अवस्था। मुझे अलग-अलग कारणों से विभिन्न समय में आप्रेशन के दौरान गहरी बेहोशी में रहना पड़ा। एक घंटा से लेकर चार घंटे तक। ऐसी बेहोशी, जिसमें आप जीवित तो होते हैं, पर आप का मन, विचार, चेतना, देह-बोध सब खो जाते हैं। आपके शरीर के साथ क्या हो रहा है, आप जान ही नहीं पाते हैं। सब कुछ निपटने के बाद जब आप होश में आते हैं, तब आपको पता लगता है। पर अपने अनुभव से एक बात में निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि ऐसी अवस्था में न मुझे कोई ज्योति दिखाई दी न दिव्य प्रकाश और न ही कोई दिव्य संगीत सुनाई दिया, जिसका कई लोग दावा करते हैं। शायद वे लोग बहुत पवित्र होते होंगे।
