महर्षि वाल्मीकि यदि रामजन्म के प्रसंग को लिखते,तो वे राम के अयोनिज जन्म लेने अर्थात् उन्हें सहसा शिशु के रूप में प्रकट होना बताते अथवा सामान्य शिशुओं जैसे अपनी माता के उदर से जन्म लेने की बात लिखते। किन्तु, यह जिज्ञासा अधूरी ही रह जाती है, जब हमें पता चलता है कि महर्षि ने बालकांड और उत्तरकांड स्वयं लिखा ही नहीं था। उन्होंने अपनी रामायण में अयोध्याकांड से युद्धकांड तक की कथा लिखी थी। विद्वानों का मत है कि वाल्मीकि रामायण में बालकांड और उत्तरकांड बाद में जोडे गए हैैं। रामकथा मर्मज्ञ बतलाते हैं कि महर्षि वाल्मीकि का उद्देश्य महानायक राम के ‘पुरुषोत्तम’ स्वरूप को जनमानस के सामने लाना था, ताकि समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत हो सके और समाज उसेे अपना सके। न कि ईश्वर की लीला के रूप में। क्योंकि, यदि उनके सम्पूर्ण चरित्र को ईश्वर की मानव लीला मान लिया जाता है तो फिर वह चरित्र सामान्य व्यक्ति के लिए अनुकरणीय नहीं रह जाता। वह केवल श्रद्धा-भक्ति, पूजा-आराधना का विषय बन कर रह जाता । फिर भी कालांतर में श्रीराम को भगवान विष्णु का अवतार मानने की अवधारणा प्रबल होने लगी। जिसका भरपूर दिग्दर्शन वाल्मीकि रामायण के बालकांड और उत्तरकांड और मूल कथा में अनेक स्थानों में जोड़े गए प्रक्षेपकों में होता है।
पर अब श्रीराम को ब्रह्म का पूर्णावतार ही माना जाता है। क्योंकि, अध्यात्म रामायण और संत तुलसीदास ने रामचरित मानस के माध्यम से इसी भावना को जन-जन में रोपित किया है। मानस में उन्होंने अथ से इति तक श्रीराम का चित्रण परब्रह्म के रूप में ही किया है। मानस में वे कभी भी और कहीं भी इससे इतर सोचने का अवकाश नहीं देते। यदि एक पंक्ति में वे राम को मानव के रूप व्यवहार करते दिखाते हैं,तो अगली ही पंक्ति में तुरंत इसे परब्रह्म की मानव लीला सिद्ध कर देते हैं।
उनके मन में इस बात को लेकर तनिक भी संदेह नहीं था कि उनके आराध्य परब्रह्म से भिन्न कोई और हैं। वे लिखते हैं ‘बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।
वाल्मीकि रामायण,हरिवंश, विष्णुपुराण आदि के अनुसार राम,भरत आदि चारों भाई विष्णु के एक-एक चतुर्थांश से समन्वित हैं।भक्तिभाव के पल्लवित होने पर राम परब्रह्म के पूर्णावतार माने जाने लगे और लक्ष्मण,भरत और शत्रुघ्न क्रमश: शेष,शंख और सुदर्शन के अवतार।वाल्मीकि के बाद की रचनाओं में राम की बाललीला के वर्णन में भागवत पुराण की कृष्ण की बाललीला का अनुसरण किया गया है। अध्यात्म रामायण में राम का नटखटपन,माखन चोरी, मृदभांडों
का फोड़ना आदि वर्णित है, जो स्पष्टत: भागवत पुराण पर निर्भर है। यह वर्णन आनन्द रामायण और राम रहस्य में भी पाया जाता है। सत्योपख्यान में राम द्वारा जलपात्र में प्रतिबिंबित चन्द्रमा को पकड़ने के प्रयास का वर्णन है। तुलसीदास जी ने अपनी कवितावली तथा गीतावली के वर्णन में सूरसागर की कृष्ण-बाललीला का अनुकरण किया है।
रामभक्ति का ऐसा गहन वातावरण सदा से नहीं था। यद्यपि भारतीय भक्तिमार्ग का बीजारोपण वैदिक साहित्य में ही हो चुका था,फिर भी वह शताब्दियों के बाद ही भागवत सम्प्रदाय मेें पल्लवित हो सका।भागवतों के इष्टदेव वासुदेव कृष्ण, विष्णु के अवतार माने जाने लगे। जिसके कारण भक्ति-भावना इन्हीं विष्णु-वासुदेव कृष्ण में केन्द्रित होकर विकसित होने लगी। बाद में राम भी विष्णु के अवतार माने गए। पर राम के अवतार स्वीकृत हो जाने के शताब्दियों बाद रामभक्ति की शुरुआत हो पाई। प्रौढ़ रामभक्ति की प्राचीनतम रचनाएँ तमिल आल्वार संतों की हैं। इसके बाद बारहवीं शती में रामानुज-सम्प्रदाय के अन्तर्गत राम भक्ति और रामोपासना से संबंधित संहिताओं और उपनिषदों की रचनाएँ शुरू हुईं। आगे चलकर रामानंद और रामावत सम्प्रदाय के कारण रामभक्ति जनसामान्य की धार्मिक चेतना का अंग बन गई। उस समय बहुत सी साम्प्रदायिक रामायणों की रचना हुई। जिनमें कंबनकृत तमिल रामायण, तेलुगु द्विपद रामायण,मलयालम रामचरितम्, कन्नड तोरवे रामायण, असमिया माधवकंदली रामायण,बंगाली कृतिवास रामायण,हिन्दी रामचरित मानस,उडिया बलरामदास रामायण और मराठी भावार्थ रामायण हैं। किन्तु,’आध्यात्म रामायण’ निर्विवाद रूप से सबसे महत्वपूर्ण है। चौदहवीं सदी से समस्त रामकथा साहित्य भक्तिभाव से ओतप्रोत होता गया और इसका समस्त वातावरण बदल गया। राम विष्णु के अँशावतार न रहकर परब्रह्म के पूर्णावतार माने जाने लगे, सीताहरण और रावणवध को नया रूप दिया गया और कथानक के अन्य गौण प्रसंगों का दृष्टिकोण भी बदलने लगा। माता सीता राक्षस रावण के वश में हुई थीं,यह विचार भक्तों को असह्य मालूम होने लगा। इसलिए उनकी मर्यादा की रक्षा के लिए भक्तों ने सीता की एक छाया मात्र का हरण स्वीकार किया। मूल रामकथा में रावण ने कामवासना से प्रेरित होकर सीता का हरण किया था और दंडस्वरूप राम द्वारा पराजित होकर मारा गया था। भक्ति की भावना बढ़ने पर यह धारणा भी बनी कि कृष्ण और राम का नाम स्मरण मात्र से ही मुक्ति प्रदान करता है चाहे वह वैर भाव से ही क्यों न हो। जो कोई कृष्ण या राम के हाथों मारा जाता है वह परम पद प्राप्त कर लेता है। इसलिए यह माना गया कि रावण ने मोक्ष पाने के उद्देश्य से ही सीता का अपहरण किया था (सुर रंजन भंजन महि भारा, जो भगवंत लीन्ह अवतारा।।तौं मैं जाई बैरु हठि करऊँ।प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।)और राम के हाथों मर कर उसने सायुज्य मुक्ति प्राप्त की थी।
इस तरह रामकथा अनेक सोपानों को पार करती हुई धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति में व्याप्त हो गई। मानव हृदय को आकर्षित करने की जो शक्ति रामकथा में मौजूद है,वह अन्यत्र दुर्लभ है।
