‘कोई पास न रहने पर भी जन-मन मौन नहीं रहता,आप आपसे कहता है वह,आप आपकी है सुनता।’ कविवर मैथिलीशरण गुप्त के समय में होता होगा ऐसा,जब मन खुद ही कह-सुन लेता था। पर अब जमाना बदल गया है जी। अब ‘मन’ जब तक अपनी,मतलब ‘मन की बात’ सारी दुनिया को सुना न दे,उसे चैन नहीं पड़ती।अपनी बात सुनाने की मन को ऐसी बुरी लत पड़ गई है कि जब तक कोई ‘मन का मीत’ नहीं मिलता और उसे थकाने तक वह अपनी बात न कर ले,उसे कल नहीं पड़ती। कानून ने तो मन के मीत की कोई संख्या तय की नहीं है,लिहाजा सभी के ढे़रों मन के मीत हैं। कुछ निकट के तो कुछ दूर के। किसी अजनबी को भी मन की बतलाते हुए यह जुमला जोड़ दिया जाता तो है कि आप अपने वाले हैं इसलिए बता रहे हैं नहीं तो अपन किसी को हवा तक नहीं लगने देते; मजेदार बात यह है कि हर मीत इस मुगालते में रहता है कि वही इकलौता मन का मीत है। इसी भ्रम में सब एक दूसरे के मन की थाह लेने की कोशिश करते रहते हैं,पर मन ऐसी राजनीति खेलता है कि किसी को कुछ पता नहीं लगने देता। इतने सारे मीतों के बाद भी मन है कि हमेशा शिकायत करता रहता है ‘मीत ना मिला रे,मन का।’ अब ऐसे अघोरी मन का क्या किया जाए,जो कभी भरता ही नहीं।
यह कोई जरूरी नहीं है कि मन का मीत सामने हो,तभी आप मन बात कर पाएँ। “जिओ” की मेहरबानी से वह कहीं भी हो,आपके बोर करने की सीमा से बाहर नहीं होगा। बल्कि, उसके दूर होने पर मन की बात सुनाना अधिक सुरक्षित होता है। बात केवल बात तक रहती है, लात तक नहीं पहुँचती।कई बार बातों ही बातों में बात बन भी जाया करती है।यह तो आपके बात करने के हुनर पर निर्भर है।
जब मन की बात चली है तो यह जान लेना जरूरी है कि आपको भी दूसरे की मन की बात सुनने के लिए तैयार रहना होगा। ‘समय नहीं है’ वाला जुमला नहीं चलेगा। जब तक सामने वाला मन की भड़ास न निकाल ले,तब तक उसके पास से उठ कर जाना या फोन बंद करना वर्जित होगा। आखिर मन का मामला है जी। उसे भी ये भरम है कि आप उसके मीत हैं। वैसे सच्ची बात तो आपका मन जानता है,जो बाद में उसकी नादानी पर ‘मन ही मन’ हंसता है। पर समझदार कह गए हैं,मन मिले न मिले,बात बनाते रहिए। क्या पता, कब बात बनते बनते बन ही जाए।
