6.5 (1) “क्या रावण ने यमराज को सचमुच परास्त कर दिया था”

6.5 (1) “क्या रावण ने यमराज को सचमुच परास्त कर दिया था”

देवर्षि नारद, महाबली रावण के पराक्रम को देखकर बहुत चिंतित थे। क्योंकि, उसका विजय-अभियान निरंतर जारी था। उसने अपने एक अभियान में यक्ष-सेेना को तितर-बितर कर और द्वंद-युद्ध में कुबेर को परास्त कर उनसे पुष्पक विमान छीन लिया था, जो ब्रह्मा जी कुबेर को दिया था। उसने कई प्रतापी राजाओं, जैसे दुष्यंत, सुरथ,पुरूरवा और अनरण्य को पराजय स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। किसी राजा में साहस नहीं था जो रावण के सामने ठहर सके। रावण स्वभाव से ही दुष्ट था और वह देव-ऋषि-यक्ष-गंधर्वों का वध करके उनके उद्यानों को नष्ट कर देता था।

नारद जी को रावण के ऐसे दुष्टतापूर्वक कामों से बहुत पीड़ा पहुँचती थी। इसलिए उन्होंने विशेष युक्ति से काम लेना तय किया। उन्होंने यह विचार किया कि मानवता की रक्षा के लिए क्यों न इसे एक ऐसी महाशक्ति से भिड़ा दिया जाए, जिसे जीतना किसी भी तरह संभव ही नहीं है। यह सोच कर एक बार वे मेघों पर सवार होकर रावण के पास पहुँचे। रावण ने उन्हें प्रणाम किया और कुशल-क्षेम पूछ कर आगमन का कारण पूछा। नारद ने कहा मैं तुम्हारे पराक्रम को देखकर संतुष्ट हूँ। हे रावण, तुम तो देवताओं से भी अवध्य हो, तब इन बेचारे मनुष्यों को क्यों मारते हो। इन्हें मारने से तुम्हें क्या यश प्राप्त होगा। ये मनुष्य तो सदा ही अनेक विपत्तियों में फँसे रहते हैं और सैकड़ों व्याधियों से घिरे रहते हैं। हे राक्षसराज! भूख, प्यास, बुढ़ापे आदि विधानों से मनुष्य सदा क्षीण होते रहते हैं और शोक एवं विषाद से कातर रहा करते हैं। इसलिए मोह में फँस स्वयं नष्ट होने वाले मृत्युलोक के इन संतप्त प्राणियों को पीड़ा देकर तुम क्यों अपनी शक्ति व्यर्थ कर रहे हो। यहाँ के प्राणी तो मृत्यु के अधीन होने के कारण स्वयं ही मरे हुए हैं। अंत में मर्त्यलोक के समस्त जीवों को यमपुरी जाना ही पड़ता है। अतएव, हे महापराक्रमी रावण, तुम यमराज की पुरी पर चढ़ाई कर उन्हें परास्त करो।

‘अवश्यमेभि: सर्वैशच गन्तव्यं यमसादनम्।

तन्निगृह्णिष्व पौलस्त्य यमं परपुरञ्जय।।’

क्योंकि उसके जीत लेने पर निस्संदेह तुम सबको जीता हुआ ही समझो। अपने तेज से दीप्तिमान लंकापति रावण, इस प्रकार नारद जी के समझाए जाने पर बोला–मैं इसी समय विजय के लिए रसातल स्थित यमपुरी जाने को तैयार हूँ। फिर तीनों लोकों को जीत कर नागों और देवताओं को अपने वश में करूँगा। बाद में अमृत प्राप्ति के लिए मैं समुद्र को मथूँगा। हे महाब्रह्मणन्! तो मैं अभी यमपुरी जाता हूँ, जहाँ समस्त प्राणियों को सताने वाले उस यमराज को मारूँगा। यह कह कर नारद मुनि को प्रणाम कर अपने मंत्रियों सहित दक्षिण दिशा की ओर चल दिया।

रावण की ऐसी अद्भुत बात सुन कर नारद जी विचारमग्न हो गए। वे सोचने लगे

आयुष्य के क्षीण होने पर इन्द्र सहित तीनों लोकों को जो न्यायत: दण्ड़ देते हैं, उस काल को भला कोई कैसे जीता जा सकता है? जो यमराज स्वयं जगतसाक्षी हैं और जिनके भय से व्याकुल हो त्रिलोकी भागती है, उन यमराज के निकट यह राक्षसराज रावण स्वयं की इच्छानुसार कैसे जा सकेगा? जो संसार के धाता विधाता हैं, जो पुण्य और पाप के फल देने वाले और शासनकर्ता हैं और जिन्होंने तीनों लोक जीत रखे हैं, उन यमराज को यह कैसे जीत सकेगा।

‘यो विधाता च धाता च सुकृतं दुष्कृतं तथा।

त्रैलोक्यं विजितं येन तं कथं विजयिष्यते।।’

यह तो बहुत कुतूहल की बात है। इसलिए मैं स्वयं यमराज और रावण का युद्ध देखने यमपुरी जाऊँगा। यह सोच कर मन के संकल्प से देवर्षि तत्काल यमपुरी जा पहुँचे। यमपुरी में जा कर उन्होंने देखा कि, यमराज अग्नि को साक्षी कर, जीवों का यथोचित न्याय कर रहे हैं अर्थात् जिसका जैसा अच्छा या बुरा कर्म है, उसके अनुसार उसको पुरस्कृत या दंड़ित कर रहे हैं।

‘अपश्यत्स यमं तत्र देवमग्नि पुरस्कृतम्।

विधानमनुतिष्ठन्तं प्राणिनो यस्य याद्दशम्।।’

यमराज ने नारद जी को देख कर उनका सत्कार किया और आने का कारण पूछा। तब नारद जी बोले–हे पितृराज, दुर्जेय रावण आपको बलप्रयोग द्वारा अपने वश में करने के लिए आ रहा है। देखूँ कालदण्ड चलाने वाले आपकी जीत होती है कि हार।

इसी बीच में सूर्य के समान दीप्तिमान रावण का पुष्पक विमान आता दिखाई दिया। महाबली रावण ने देखा कि, वहाँ समस्त प्राणी अपने-अपने पुण्यों और पापों का फल भोग रहे हैं। यमराज के महाभयंकर रूप धारण करने वाले यमदूत प्रणियों को अनेक प्रकार से यातना दे रहे हैं, जिसके कारण वे आर्तनाद कर रहे हैं। यह देख रावण को बहुत क्रोध आया और उसने ऐसे प्राणियों को जबरदस्ती छुड़ा दिया, जिससे उन प्राणियों को अचिन्त्य सुख प्राप्त हुआ।

यह देख कर यमराज के सैनिक और अनुचरों ने कुपित होकर रावण पर आक्रमण कर दिया। उन सशस्त्र अनुचरों ने पुष्पक विमान ने भारी तोड़फोड़ की। किन्तु,अपनी दिव्यता के कारण वह विमान स्वत: पूर्वानुसार हो गया। रावण और उनके मंत्रियों ने भी उन अनुचरों पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा कर दी। इस भंयकर युद्ध में बहुत बड़ी संख्या में दोनों ओर के लोग हताहत हुए। रावण ने तब बाण को पाशुपतास्त्र से अभिमंत्रित कर छोड़ दिया। उस अमोघ दिव्यास्त्र के प्रभाव से यमराज के सभी सैनिक भस्म हो गए। यह देख कर रावण बहुत जोर से गरजा। रावण का घोर नाद सुनकर यमराज ने समझ लिया कि रावण की जीत हुई और मेरी सेना नष्ट हो गई है।

तब यमराज अत्यंत क्रोध में आ गए और उन्होंने सारथी को तुरंत रथ उपस्थित करने का आदेश दिया। सारथी ने तत्काल उनका दिव्य और विशाल रथ ला कर खड़ा कर दिया, जिस पर महातेजस्वी यमराज सवार हुए। इस चराचर जगत का संहार करने वाले मृत्युदेव भी पाश और मुद्गर सहित यमराज के आगे बैठे थे। यमराज का अमोघ अस्त्र कालदंड़ भी मूर्तिमान होकर रथ पर सवार हो गया। यमराज को इस प्रकार कुपित देख तीनों लोक थर्रा उठे। किन्तु, रावण पर इसका तनिक भी असर नहीं हुआ। यमराज ने रावण पर अनेक अस्त्र चलाए। उधर रावण ने भी यमराज के रथ पर बाणों की जोरदार वर्षा की। यमराज ने रावण के साथ ऐसा भीषण युद्ध सात दिनों तक चला। फिर भी दोनों युद्ध भूमि में ड़टे रहे। रावण ने मृत्यु के चार, सारथी के सात और यमराज के मर्मस्थल पर असंख्य बाण मारे। तब महाराज यम ने कभी निष्फल न जाने वाला कालदण्ड़ उठाया।

जब यमराज रावण पर कालदण्ड चलाने को तैयार ही थे कि तब ब्रह्मा जी प्रकट हो गए और उन्होंने यमराज से कहा कि तुम इस दण्ड को चला कर इस राक्षसराज को मत मारो। क्योंकि हे देवश्रेष्ठ, मैं इसे वरदान दे चुका हूँ और तुम्हें मेरी बात असत्य नहीं ठहरानी चाहिए। यह काल दण्ड जिसे मैंने ही बनाया है, अमोघ है और इसे छोड़ देने पर त्रिलोक में कोई जीवित नहीं बच सकता। फिर एक बात और है, इसके प्रहार से रावण न मरा अथवा मर ही गया, तो मेरा वचन दोनों ही प्रकार से मिथ्या हो जाएगा।

‘यदि ह्यस्मिन्निपतिते न म्रियेतैष राक्षस:।

म्रियते वा दशग्रीवस्तदाप्युभयतोअनृतम्।।’

ब्रह्मा जी के यह वचन सुनकर धर्मात्मा यमराज ने कहा कि आप ही मेरे स्वामी हैं। इसलिए आपकी आज्ञा से इस दण्ड को रख देता हूँ। परन्तु,आप यह बताएँ कि अब मैं क्या करूँ। क्योंकि आपके वरदान से यह अवध्य हो गया है। इसलिए इस राक्षसराज की दृष्टि से मैं अदृष्य हुआ जाता हूँ। यह कह कर यमराज रथ सहित वहीं अन्तर्धान हो गए।यमराज के अदृश्य होने पर स्वयं को जीता हुआ मान रावण ने अपने जीत की मुनादी, ढिंढोरा पिटवा कर करवाई और पुष्पक विमान पर सवार हो कर यमपुरी से चल दिया।

दशग्रीववस्तु तं जित्वा नाम विश्राव्य चात्मन:।

आरुह्य पुष्पकं भूयो निष्क्रान्तो यमसादनात्।।

इस युद्ध में रावण सचमुच में जीता था अथवा नहीं, इस पर अनेक मत हो सकते हैं। किन्तु, तकनीकि रूप से तो रावण जीत ही गया था।क्योंकि उसका प्रतिद्वंदी युद्धभूमि से जा चुका था। उसी परम् प्रतापी रावण, जिसने साक्षात् मृत्यु के देवता को रणभूमि से हटने के लिए बाध्य कर दिया था, उसे श्रीराम ने अपने पराक्रम से उसे पुन: यमराज के पास सदैव के लिए यमलोक भिजवा दिया।

हम भले ही सहमत न हों, पर जैन रामकथा पउमचरियं में यम, इन्द्र, वरुण आदि को देवता नहीं अपितु, साधारण राजा माना गया, जिन्हें रावण परास्त किया था।

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