(45 वर्ष पुरानी आप-बीती) … “रिसर्च स्कालर को भीलों ने लूटा” (एक शोध-यात्रा जो त्रासदी में बदल गई)

(45 वर्ष पुरानी आप-बीती) … “रिसर्च स्कालर को भीलों ने लूटा” (एक शोध-यात्रा जो त्रासदी में बदल गई)

भानपुरा से लौटा था। हिंगलाजगढ़ जैसी कठिन और खतरनाक जगह,जहाँ जंगली जानवरों और लुटेरे कंजरों से कदम-कदम पर टकराने का डर था, सर्वे बिना बाधा के पूरा हुआ। बाद में यही बात सालती रही कि कोई सनसनीखेज और यादगार घटना नहीं घटी।

शोध-कार्य की लगन और जोश ने बीजागढ़ जाने को प्रेरित किया। जो खरगोन शहर से लगभग तीस मील दूर है। अकेले ही जाना तय हुआ। सोचा, जब हिंगलाजगढ़ जैसे इलाके में कुछ नहीं हुआ, तो यहाँ क्या होगा। यह तो अपना ही इलाका है।

सुबह से ही कैमरा और जरूरी सामानों से लैस होकर सायकल पर चल पड़ा। करीब तीन घंटे के बाद भडवाली गांव पहुँचा, तब तक हालत बुरी हो चुकी थी। लगता था जैसे हर पैडल पर पहिया उल्टा घूम रहा हो।

गाँव में थोड़ी देर सुस्ताने के बाद जानकारी ली कि बीजागढ़ कितनी दूर है। एक ने बतलाया ” ज्यादा नी दो कोस (चार मील)। उकाज मोड से जलालाबाद गाँव लगेल छे।” मुझे हैरानी हो रही थी कि जो पहाड़ इतना करीब दिख रहा है, उसके लिए चार मील चलना होगा।

अभी दो मील ही दूर आया था कि एक मोड पर, ऊँची पहाड़ियों से पत्थर बरसना शुरू हो गए। इसके पहले मैं समझ पाता कि माजरा क्या है, तीन-चार पत्थर बदन पर अपने निशान छोड़ चुके थे। देखते-देखते तीन आकृतियाँ सामने आ गईं। दो के हाथ में बड़े-बड़े पत्थर थे और एक तीर-कमान से लैस था। सभी ऊँचे-पूरे और हट्टे-कट्टे। उनमें से एक जो ज्यादा मजबूत था, ने मेरे पास आकर आदेश दिया ” पैसे दे।”

देर करने का कोई कारण नहीं था। तुरंत कुल जमा दस रूपए उसके हवाले किए। दूसरी कड़कती आवाज आई “अरू दे।” अपनी लडखडाती आवाज में मैंने बतलाने की कोशिश की कि ‘और नहीं है।’ “जल्दी दे, नी तो मारि नाकूँगा।”

‘नहीं, और नहीं है, इतने ही थे।’

“अरु होऊ नी?” मैं क्या जवाब देता।

अचानक उसकी निगाह मेरी कलाई घड़ी पर पड़ी। “इने उतार।” ‘ इसका क्या करोगे?’ मैंने समझाने की कोशिश की।

“जल्दी दे।” और उसने मेरे उतारने के पहले झपट ली।

“कित्ते की छे?” उसने जानकारी हासिल की।

‘ढ़ाई सौ।’

“हूँ, कपड़ा उतार।”

मैंने फिर समझाने की कोशिश की ‘कपड़े क्यों लेते हो,ये तुम्हारे क्या काम आएंगे?’ मुझे अभी बीजागढ़ जाना है, नक्शे बनाना है, चित्र बनाना है, जरूरी काम है।’

उसके चेहरे का तनाव कुछ कम हुआ। मगर उसके दूसरे साथी मेरी बयानबाजी से बोर हो रहे थे। वे झटपट फैसला करना चाह रहे थे। उनमें से एक ने, जिसने तीर कमान पर चढ़ा रखा था, सरदार से पूछा “खोसूँ।” पर उसे संकेत नहीं मिला।

अब उसका ध्यान मेरे झोले पर गया, जो साइकल पर टंगा था।

“ई में कई छे।”

‘ कुछ नहीं, कपड़े और खाने का सामान।’ मैंने कैमरा होने की बात साफ छिपा दी।

” दे” उसने आज्ञा दी।

मैंने फिर कुछ कहने की जुर्रत की। हालांकि, ऐसा करना खतरनाक था। मोबाईल कोर्ट के मजिस्ट्रेट के सामने सफाई देने जैसा। मार की मात्रा बढ़ने की संभावना थी।

‘ इसका क्या करोगे? बेचोगे तो पकड़े जाओगे।’

बात उन्हें सटीक लगी। वैसे भी ढ़ाई सौ की चीज उनके हाथ आ चुकी थी। एक ने पूछा “साथ मा अरु कोण छे।” सहसा मेरे मुँह से निकला–‘ दो पीछे आ रहे हैं।’

युक्ति काम कर गई। दूसरे बटेर फँसाने की जल्दी में उन्होंने मुझे हुकुम दिया “जल्दी जा, पीछा मति देखजे, नी तो मारि न्हाकांगा।”

मुझे शहीद बनने की कोई तमन्ना थी नहीं,इसलिए उनकी बात न मानने का कोई सवाल उठता ही नहीं था।

वहाँ से आगे बढ़ा। यह डर भी था कि आगे इनके दूसरे भाई भी न मिल जाएँ, नहीं तो वे निर्वस्त्र किए बिना नहीं छोडेंगे। किन्तु, रास्ते में ऐसा कोई हादसा नहीं हुआ।

जैैसे-तैसे जलालाबाद आया। खेत में चार-पाँच वारेला लोग काम करते मिले। ये भीलों की अपेक्षा अधिक सभ्य होते हैं और लूटपाट का धंधा नहीं करते।

मुझे आता देखकर सब मेरे समीप चले आए। “क्यूँ भई, कैलांग आएल रे।” एक ने स्वाभाविक सा प्रश्न किया। अपने को निरापद स्थान पर देखकर मैंने उन्हें अपनी राम-कहानी सुनाई। उनमें से एक, जो मेरे चेहरे को गौर से देख रहा था, ने पूछा “मार्यो नी।” मेरे स्वाभिमान को ठेस पहुँची, मैंने प्रतिप्रश्न किया ‘जरूरी था क्या?’

“नी, वात ई छे कि उ लोग होण बिना मिहणत कोई चीज लेता नी।” बात स्पष्ट हो चुकी थी, कुछ पूछने की गुंजाईश ही नहीं रही। तब दूसरा बोला “साब ठट्ठा (मजाक) करि रेगा रे।” हाजरी में हुज्जत कैसी, झट से शर्ट उतार कर दिखा दिया। तब उनकी हमदर्द आवाज सुनाई दी,जिससे मेरी हिम्मत बढ़ी।

आगे ऐसी ही हालत में, उनके तीन बालकों को साथ लेकर करीब चार सौ फीट ऊँचे पहाड़ पर चढ़ कर, दुखती रगों से सर्वे और फोटोग्राफी का काम पूरा किया।

वापसी पर कईयों को यह किस्सा बयान किया। सयानों सलाह दी “थाने में जाकर रपट लिखा दो।” किन्तु, मुझे उसमें कोई सार नजर नहीं आया। सोचा, घडी तो घडी, यदि कपड़े भी उतरवा लिए जाने की रपट की होती, तब भी एक निर्विकार चेहरे से ठंडे स्वर में उत्तर सुनने को मिलता ” आपको ऐसी जगह ये चीजें ले जानी नहीं थी।” तब उनको कौन समझाता कि एक शरीफ आदमी के लिए कपड़े पहनना कितना जरूरी है।


(यह व्यंग लेख ‘नईदुनिया’ में दिनांक 24 फरवरी, 1979 के संपादकीय पृष्ठ पर उसी स्थान प्रकाशित हुआ था, जहाँ इसके बाद से व्यंग का स्तंभ ‘अधबीच’ शुरू किया गया। )

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