5.3 शत्रु की भी सराहना करने वाले महान पराक्रमी हनुमान्

5.3 शत्रु की भी सराहना करने वाले महान पराक्रमी हनुमान्

आमतौर पर हम तो अपने मित्रों के गुणों की सराहना करने में कंजूसी वापरते हैं। जबकि,जो गुणग्राहक होते हैं, वे इस मामले में बहुत उदार होते हैं और मित्रों या परिचितों के छोटे-छोटे गुणों की सराहना करने से भी नहीं चूकते। पर जो महान होते हैं, उनकी गुणग्राहकता और भी अधिक होती है और वे तो अपने शत्रुओं के गुणों की

सराहना करने से भी आगे रहते हैं। जैसे कि हमारे हनुमान् जी थे, जिन्होंने युद्ध में रावण पुत्र अक्षकुमार के पराक्रम और रण-कौशल की भी दिल खोल कर प्रशंसा की थी।

वास्तव में यह युद्ध हनुमान् जी ने स्वयं आमंत्रित किया था, जब माता सीता से भेंट करने के बाद उन्होंने अशोक वाटिका को उजाड़ और राक्षस वीरों को पछाड़ कर रावण को चुनौति देने का निर्णय लिया। यद्यपि वे ऐसा नहीं करते और सीधे लौट जाते तो भी पर्याप्त् था। क्योंकि, श्रीराम द्वारा उन्हें सौंपा गया काम पूरा हो गया था। पर हनुमान् जी तो हनुमान् जी ठहरे। केवल उतना ही काम करके वापस लौट जाते तो उन्हें संतोष कैसे होता। उन्होंने सोचा कि जब मैं इतनी दूर आ ही गया हूँ तो शत्रुपक्ष के बल की थाह भी ले लूँ, महाबली रावण से भेंट भी कर लूँ और नगर रचना को भी ठीक से देख-समझ लूँ। क्योंकि, यही बातें हैं जो युद्ध के समय पर काम आ सकती हैं।

फिर उन्होंने सोचा कि रावण तक संदेश भेजने का काम कैसे किया जाए कि रावण स्वयं मुझसे मिलने के लिए आतुर हो जाए। यह काम आरंभ करने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान उन्हें अशोक वाटिका ही लगी, जहाँ कि उस समय वे खड़े थे। उन्होंने अपना आकार विशाल बना लिया और राक्षसियों को डराना शुरू कर दिया, जिससे वे भाग कर रावण के पास गईं और कहा कि महाराज; कोई विशालकाय वानर वाटिका में घुस आया है और उसने वाटिका तहस-नहस कर दी है। वाटिका के बड़े भाग को उसने उजाड़ दिया है और केवल उतने ही भाग को सुरक्षित छोड़ा है, जहाँ सीता जी हैं। साथ ही उसने सीता से भेंट कर कुछ बातें भी की हैं, परन्तु सीता इस बारे में कुछ बता नहीं रही हैं। उसने बगीचे के जो सशक्त और सशस्त्र रखवाले थे उन्हें यमलोक पहुँचा दिया है।

यह सुनकर रावण अत्यंत कुपित हो गया। अपने प्रिय प्रमदावन (अशोकवन) के विध्वंस का समाचार जानकर रावण ने अपने ही समान तेजस्वी ‘किंकर’ नाम के राक्षसों को हनुमान् को पकड़ लाने के लिए भेजा। राजा की आज्ञा पाकर अस्सी हजार वेगवान किंकर हाथों में कूट और मुद्गर लिए उस महल से बाहर निकले।

यहाँ हनुमान् जी तो उनकी प्रतीक्षा कर ही रहे थे। प्रमदावन के फाटक पर खड़े हुए उन वानर वीर के पास पहुँच कर वे वेगशाली निशाचर उन पर झपटे। उन शूरवीर राक्षसों से सब ओर से घिर जाने पर महाबली हनुमान् ने फाटक पर रखा हुआ एक भयंकर लोहे का परिघ उठा लिया और उन्होंने उस परिघ से सामने आए हुए सभी राक्षसों का संहार कर डाला और युद्ध की इच्छा से पुन: फाटक पर चढ़ गए।

यहाँ किंकर वीरों के मारे जाने का समाचार सुनकर रावण ने प्रहस्त के पुत्र जम्बुमाली को भेजा, जिसकी युद्ध में कोई तुलना नहीं थी। आते ही महातेजस्वी जम्बुमाली ने हनुमान् जी को तीखे बाणों से बींधना शुरू कर दिया। तब क्रोधित हनुमान् जी ने उस पर एक बड़ी चट्टान उस पर फेंकी, जिसे उसने दस बाण मार कर तोड़-फोड़ दिया। तब हनुमान् जी ने उस परिघ को उठा और वेग से घुमा कर जम्बुमाली पर फेंका, जिससे महारथी जम्बुमाली और उसका रथ चूर-चूर हो गया।

इधर जम्बुमाली के वध का समाचार सुनकर रावण क्रोध से जल उठा। उसने अपने मंत्री के रणकुशल सात पुत्रों को आज्ञा दी। रावण की आज्ञा पाकर वे सातों महारथी उस राजमहल से निकले, जो अग्नि के समान तेजस्वी थे। उनके साथ बहुत बड़ी सेना भी थी। तब पराक्रमी हनुमान् ने राक्षसों की उस विशाल वाहिनी को भयभीत करने के लिए घोर गर्जना की और उन राक्षसों पर टूट पड़े। थोड़ी ही देर में उन्होंने मंत्री पुत्रों को सेना सहित धराशायी कर दिया। उनका ऐसा विकराल रूप देख कर शेष सेना यहाँ-वहाँ भाग गई।

तब राक्षसराज रावण ने विरूपाक्ष, यूपाक्ष, दुर्धर, प्रघस और भासकर्ण, इन पाँच सेनापतियों को, जो बड़े वीर, नीतिनिपुण, धैर्यवान और युद्ध में वायु के समान वेगशाली थे, हनुमान् को पकड़ने के लिए आज्ञा दी। उन्होंने भी विशाल सेना साथ में ली। आगे जाने पर उन्होंने देखा कि महाकपि हनुमान् द्वार पर खड़े हुए हैं, जिनकी शक्ति, बल, वेग, बुद्धि, उत्साह, शरीर और भुजाएँ सभी महान् हैं। उन्होंने और उनकी सेना ने भारी पराक्रम दिखाया और हनुमान् जी को घायल भी किया। पर घायल होने पर उनका वेग, शक्ति और आकार और बढ़ गया। तब हनुमान् जी ने उन्हें विशाल वृक्षों को उखाड़ कर मारना, भारी शिलाएँ उन पर फेंक कर कुचलना, पूरे पर्वत को उखाड़ कर राक्षस वीरों को धराशायी करना प्रारम्भ किया, जिससे देखते ही देखते पाँचों सेनापति और उनकी सेना यमद्वार पहुँच गई।

हनुमान् जी के द्वारा अपने पाँच सेनापतियों को सेवकों और वाहन सहित मारा गया सुनकर रावण ने अपने सामने बैठे हुए पुत्र अक्षकुमार की ओर देखा, जो युद्ध के लिए उद्धत और उत्कंठित रहने वाला था। रावण जानता था कि अक्षकुमार, मेघनाथ के स्तर का तो नहीं, फिर भी कुछ कम भी न था। वह भी महान पराक्रमी और युद्धकौशल में निपुण था।

उसके पास एक रथ था,जो उसने भारी तपस्या से अर्जित किया था। उसमें मन के समान वेग वाले आठ घोड़े जुते हुए थे और देवता या असुर कोई भी उसे नष्ट नहीं कर सकता था। वह रथ बिजली के समान प्रकाशित होता और आकाश में भी चलता था। उस रथ को सभी अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित किया गया था। घोड़े, हाथी और बड़े-बड़े रथों की भयंकर आवाज से पृथ्वी और आकाश को गुंजाता हुआ बड़ी भारी सेना साथ लेकर वाटिका के द्वार पर बैठे हुए शक्तिशाली वीर वानर हनुमान् जी के पास जा पहुँचा।

रामचरित मानस में अक्षकुमार के युद्ध कौशल को कोई विशेष महत्व नहीं दिया गया है। उसमें केवल इतना लिखा है– ” पुनि पठयउ तेहिं अक्षकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।। आवत देखि बिटप गहि तर्जा । ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।” जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार ऐसा बिल्कुल नहीं था। बात इतनी सरल भी नहीं थी। अक्षकुमार एक महान पराक्रमी योद्धा था, जिसका रणकौशल देखकर हनुमान् जी स्वयं उसकी सराहना किए बिना नहीं रह सके थे।

रणभूमि में अक्षकुमार का पराक्रम बड़ा प्रचण्ड दिखाई देता था। उसके तेज, बल, पराक्रम और बाण सभी बढ़े-चढ़े थे। अक्षकुुमार निशाना साधने, बाण को धनुष पर चढ़ाने और छोड़ने में बड़ा प्रवीण था। उस वीर ने विषधर सर्पों के समान भयंकर तीन बाण हनुमान् जी के मस्तक पर मारे।

उन तीनों की चोट हनुमान् जी के माथे पर एक साथ ही लगी। इससे रक्त की धारा बहने लगी। वे उस रक्त से नहा उठे और उनकी आँखें घूमने लगीं। अक्षकुमार के बलपूर्वक छोड़े गए सैकड़ों बाणों से बिद्ध होने पर भी हनुमान् जी ने तुरंत आकाश को विदीर्ण करते हुए से भीषण स्वर में गंभीर गर्जना की। उस युद्धस्थल पर मन के समान वेगवाले वीर हनुमान् जी भयंकर पराक्रम प्रकट करने लगे। वे अक्षकुमार के बाणों को व्यर्थ करते हुए दो बाणों के बीच से हवा की तरह निकल जाते।

अक्षकुमार हाथ में धनुष लिए युद्ध के लिए उन्मुख हो अनेक प्रकार के उत्तम बाणों से आकाश को आच्छादित किए देता था। पवनकुमार हनुमान् ने उसे बड़े आदर की दृष्टि से देखा और मन ही मन कुछ सोचने लगे।

‘यह महाबली अक्षकुमार बालसूर्य के समान तेजस्वी है और बालक होकर भी बड़ों के समान कर्म कर रहा है। युद्ध सम्बंधी समस्त कर्मों में कुशल होने के कारण अद्भुत शोभा पाने वाले इस वीर को यहाँ मार डालने की मेरी इच्छा नहीं हो रही है।’

‘ यह महामनस्वी राक्षसकुमार बल और पराक्रम की दृष्टि से महान् है। युद्ध में सावधान और एकाग्रचित्त है और शत्रु के वेग को सहन करने में अत्यंत समर्थ है। अपने कर्म और गुणों की उत्कृष्टता के कारण यह नागों, यक्षों और मुनियों द्वारा प्रशंसित हुआ होगा, इसमें संशय नहीं है।

किन्तु, यदि इसकी उपेक्षा की गई तो यह मुझे परास्त किए बिना नहीं रहेगा, क्योंकि संग्राम में इसका पराक्रम बढ़ता जा रहा है। अत: अब इसे मार डालना ही मुझे सही जान पड़ता है। बढ़ती हुई आग की उपेक्षा करना कदापि उचित नहीं है।’

ऐसा विचार कर आकाश में विचरते हुए वीर हनुमान् थप्पड़ों की मार से उन आठों उत्तम और विशाल घोड़ों को यमलोक पहुँचा दिया। उसके बाद हनुमान् जी ने उसके रथ को हाथों से पीट कर चकनाचूर कर दिया, जिससे वह महान रथ आकाश से पृथ्वी पर आ गिरा।

उस समय महारथी अक्षकुमार धनुष और तलवार ले अन्तरिक्ष में उड़ने लगा। तब वायु के वेग वाले पराक्रमी हनुमान् ने उस राक्षस के पास पहुँच कर उसके दोनों पैर दृढ़ता से पकड़ लिए और वेग से कई बार घुमा कर बड़े वेग से पृथ्वी पर पटक दिया। तब तो उस राक्षस की देह चकनाचूर हो गई और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।

अक्षकुमार को पृथ्वी पर पटक कर महाकपि हनुमान् जी ने राक्षसराज रावण के हृदय में बहुत बड़ा भय उत्पन्न कर दिया। उसके मारे जाने पर नक्षत्र-मंड़ल में विचरने वाले महर्षियों, यक्षों, नागों, भूतों तथा इन्द्र सहित देवताओं ने वहाँ एकत्र होकर बड़े विस्मय और विनय के साथ हनुमान् जी के दर्शन किए।

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