श्रीराम भले ही स्वयं ब्रह्म थे, सर्वज्ञ थे, फिर भी मानव रूप धारण करने पर उन्हें भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरू के गृह जाना पड़ा था। अल्पकाल में ही सम्पूर्ण विद्या प्राप्त करने के उपरान्त भी गुरू वशिष्ठ बहुत दिनों से चिंतित थे,क्योंकि वे जानते थे कि राम की शिक्षा अभी कुछ अधूरी है। राम यद्यपि कुशाग्र बुद्धि थे और उन्होंने वेद-वेदांत सहित समस्त शास्त्रों की शिक्षा बहुत कम समय में प्राप्त कर ली थी। अस्त्र-शस्त्रों के संचालन में भी वे निपुण थे। तथापि दिव्यास्त्रों की शिक्षा उन्हें अभी तक नहीं मिल सकी थी। कौशल राज्य के आस-पास राक्षसों का उपद्रव बढ़ता जा रहा था। राक्षस ऋषि-मुनियों को पीड़ित करते रहते थे,इस कारण उन राक्षसों का शमन जरूरी हो गया था। किन्तु, गुरू जानते थे कि राम के लिए बिना दिव्यास्त्रों के ज्ञान के उनका नाश कर पाना कठिन होगा। एक बार वे सोच ही रहे थे कि क्या किया जाए, तभी सूचना मिली कि महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं।उन्हें ऐसा लगा कि जैसे उनके मन की कामना पूरी हो गई हो। क्योंकि, वे जानते थे कि विश्वामित्र ही हैं जो सारे दिव्यास्त्रों के ज्ञाता हैं। यदि वे अपने दिव्यास्त्रों का ज्ञान राम को दे दें, तो राम अजेय हो जाएँगे।किन्तु, प्रश्न यह था कि ऐसा कैसे हो पाएगा।अचानक अपने-आप ऐसा संयोग बन गया।जब विश्वामित्र जी ने राजा दशरथ के सामने उनके यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को देने की मांग रख दी,ताकि वे चिंतामुक्त होकर यज्ञ कर सकें। राजा दशरथ अपने किशोरवय पुत्रों को किसी भी मूल्य पर देने को तैयार नहीं थे। (राम देत नहिं बनत गोसाईं) दुर्दान्त राक्षसों का सामना करने के लिए वे राम को कैसे भेज देते। एक तो चौथेपन की संतान, वो भी सबसे प्यारी। अभी-अभी तो राम गुरू के आश्रम से शिक्षा प्राप्त कर लौटे हैं। अभी तो वे ठीक से उन्हें दुलार भी नहीं पाए हैं।उस सुकुमार राम को वे विश्वामित्र के साथ कैसे भेज दें। वह भी घनघोर वनों में जाने के लिए।उनका पुत्र-मोह उन्हें इसकी अनुमति नहीं दे रहा था। उनके मन में बहुत संघर्ष चल रहा था। तब उन्होंने विश्वामित्र के सामने स्वयं चलने और उनकी सारी सेना ले जाने का प्रस्ताव रखा। विश्वामित्र ने राजा का प्रस्ताव अमान्य कर दिया। विश्वामित्र को तो केवल राम और लक्ष्मण की जरूरत थी। तब गुरू वशिष्ठ ने दशरथ को बहुत प्रकार से समझाया। अंतत: राम का हित समझ कर भारी मन से दशरथ ऋषि विश्वामित्र के साथ राम और लक्ष्मण को भेजने के लिए राजी हुए।
यह तो रामकथा का वह अँश है,जिसे थोड़ा-बहुत हम सभी जानते हैं।किन्तु, इससे थोड़ी भिन्न कथा भी है।कृतिवास रामायण के अनुसार दशरथ ने राम और लक्ष्मण के स्थान पर भरत और शत्रुघ्न को विश्वामित्र के साथ भेज दिया। सरयूतट पर पहुँचकर विश्वामित्र ने राजकुमारों से कहा–यहाँ से दो पथ हैं। पहले पथ से जाने में हमें तीन दिन लगेंगे, दूसरे पथ से हम तीसरे पहर पहुँच जाएँगे। किन्तु,इस पथ पर ताड़का राक्षसी का भय रहता है। भरत ने उत्तर दिया “खतरे वाले रास्ते से हमें क्या प्रयोजन है।” यह सुनकर विश्वामित्र समझ जाते हैं कि दशरथ ने उनके साथ छल किया है और वह अयोध्या लौटकर राम को माँग लेते हैं। इससे मिलती-जुलती कथा सेरी राम में भी है। जिसमें महीरसी कली(राजा जनक)स्वयं आकर दशरथ से निवेदन करते हैं कि उनके पुत्र सीता के स्वयंवर में भाग लें। दशरथ भरत और शत्रुघ्न को उनके साथ भेज देते हैं। कली उनको चार मार्गों में से चुनने देते हैं,जिसमें क्रमश: १७,२०,२५ और ४० दिन लगेंगे। अंतिम मार्ग निरापद है,अन्य मार्गों में क्रमश: राक्षसी,गैंडे और नागिन का भय रहता है। भरत और शत्रुघ्न लंबा मार्ग चुुनते हैं,जिससे कली उन्हें योग्य नहीं समझते।कली लौटकर दूसरी बार राम और लक्ष्मण को ले जाते हैं। राम १७ दिन वाला मार्ग चुनकर जुगीन(ताड़का)नाम की राक्षसी का वध करते हैं।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार विश्वामित्र ने सरयू तट पर पहुँचकर राम को बला और अतिबला नाम के मंत्र प्रदान किए जिन्हें जपकर राम को श्रम,ज्वर,भूख-प्यास का अनुभव नहीं होगा।उनके रूप में कोई परिवर्तन नहीं आएगा और वह ज्ञान प्राप्त करेंगे। बाद में विश्वामित्र ने उन्हें ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किए जो देवताओं को भी दुर्लभ हैं।जैसे ही विश्वामित्र उन दिव्यास्त्रों के मंत्रों का उच्चारण करने लगे वैसे ही वे मंत्र साक्षात् रूप धारण कर श्रीराम के समक्ष हाथ जोडकर खड़े हो गए और कहने लगे–हे परमोदार राघव, हम आपके दास हैं।तब राम ने उन्हें अपने हाथ से छुआ और बोले जब मैं तुम्हारा स्मरण करूँ,तब तुम आकर मेरा काम कर जाना। इनमें कालचक्र, विष्णुचक्र, ऐन्द्रास्त्र, ब्रह्मास्त्र, विद्याधरास्त्र, पिनाकास्त्र, नारायणास्त्र, आग्नेयास्त्र, वाव्यास्त्र, गंधर्वास्त्र, मानवास्त्र, मदनास्त्र,मोहनास्त्र,
सत्यास्त्र, परमारस्त्र, सोमास्त्र आदि थे।
सिद्धाश्रम पहुँचने के पहले विश्वामित्र राम को सुकेतु की पुत्री,सुन्द की पत्नी और मारीच की माता ताड़का की कथा सुनाते हैंं।अगस्त्य ने सुन्द को मार डाला और मारीच को राक्षस और ताटका को एक विकराल नरभक्षिणी यक्षी बन जाने का शाप दिया।बाद में राम ताड़का का वध करते हैं और विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करते समय राम सुबाहु और अन्य राक्षसों पर आग्नेयास्त्र चला कर मार डालते हैं और मारीच पर मानवास्त्र चला कर उसे शतयोजन दूर समुद्र में फेंकते हैं। यहाँ राम दिव्यास्त्रों का पहली बार और सफल प्रयोग करते हैं। बाद में खर-दूषण की सेना पर उन्होंने मोहनास्त्र का प्रयोग किया था, जिससे सारे सैनिक एक दूसरे राम समझ कर आपस में लड़ मरे थे। रावण पर ब्रह्मास्त्र के प्रयोग का उल्लेख भी मिलता है, जिससे वह जल कर भस्म हो गया था।
इससे पता चलता है कि हर कठिन चुनौति नए अवसर लेकर आती है। यदि राम विश्वामित्र के साथ वन नहीं जाते तो वे इन दिव्यास्त्रों को प्राप्त करने से चूक जाते। राम दृढ़संकल्पी थे,हम जैसे साधारण मानव नहीं,जो चुनौति से अक्सर घबरा जाया करते हैं और कुछ दिव्य हासिल करने से चूक जाया करते हैं और बाद में पछताते हैं।
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अयोध्या में रामलला के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा के महोत्सव पर स्वदेश,भोपाल द्वारा प्रकाशित विशेषांक में प्रकाशित मेरा एक आलेख।

