रामायण की घटनाएँ महाभारत से बहुत पहले घटित हुईं थीं । इसलिए सहज ही यह माना जा सकता है कि रामायण की रचना महाभारत से पहले ही हुई होगी। वैसे भी रामायण में महाभारत के किसी पात्र का उल्लेख नहीं है, जबकि, महाभारत में चार स्थलों पर रामकथा का वर्णन किया गया है। फिर भी बहुत संभव है कि भारत (अर्थात् महाभारत का प्राचीनतम रूप) रामायण के पूर्व उत्पन्न हुआ हो। चतुर्विंशतिसाहत्री भारतसंहिता तथा शतसहस्त्रम महाभारत, इन दो सोपानों का उल्लेख महाभारत में ही मिलता है। भारतरत्न पी.वी. काणे जैसे धर्मशास्त्रों के उद्भट विद्वान और अन्य विशेषज्ञों का मत है कि रामायण की रचना भारत और महाभारत के बीच हुई होगी। शंखायन आदि सूत्रों तथा पाणिनि में भारत के विषय में निर्देश मिलते हैं, रामायण के विषय में नहीं। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की रचना रामायण के पूर्व ही हो चुकी थी। यह निर्विवाद है कि भारत और रामायण स्वतंत्र रूप से उत्पन्न हुए, भारत पश्चिम में और रामायण पूर्व में। दोनों के सम्पर्क के पश्चात् ही भारत ने महाभारत का रूप धारण कर लिया है।
महाभारत में श्रीराम को भी विष्णु का अवतार माना गया है। आरण्यकपर्व में भीम-हनुमान्-संवाद-संवाद में हनुमान् यों कहते हैं।
“अब दाशरथिर्वीरो रामोनाम महाबल:।
विष्णुर्मानुष्यरूपेण चचार वसुधामिमाम्।।”
आरण्यकपर्व के अंतिम अध्याय में कहा गया है कि विष्णु ने दशरथ के घर पर रह कर रावण का वध किया है।
“विष्णुना वराता चापि गृहे दशरथस्य वै।
दशग्रीवो हतश्छन्न संयुगे भीमकर्मणा।।”
आरण्यकपर्व के स्वर्गारोहण प्रसंग में रामावतार का संकेत किया गया है।
“वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ।
आदौ चान्ते च मध्ये च हरि: सर्वत्र गीयते।।”
महाभारत में चार स्थानों में रामकथा के वर्णन से यह स्पष्ट है कि महाभारत के रचनाकार कवि रामकथा से भलिभान्ति परिचित थे। महाभारत में आरण्यक पर्व में दो, द्रोण पर्व में एक और शांतिपर्व में एक स्थान रामचरित का उल्लेख किया गया है। पर इनमें सबसे महत्वपूर्ण आरण्यकपर्व की रामकथा ‘रामोपाख्यान’ है।
आरण्यकपर्व में मार्कण्डेय मुनि द्वारा युधिष्ठिर को रामचरित सुनाने का प्रसंग आता है। वे यह कथा तब सुनाते हैं, जब द्रोपदी के हरण और उसे पुन: प्राप्त करने के बाद युधिष्ठिर अपने दुर्भाग्य पर शोक प्रकट कर कहते हैं ‘क्या मुझसे अधिक भी कोई अभागा है? (अस्ति नूनं मयाकश्चिदल्पभाग्यतरो नर: )तब मार्कण्डेय राम का उदाहरण देकर युधिष्ठिर को धैर्य बंधाने का प्रयत्न करते हैं। युधिष्ठिर के रामचरित सुनने की इच्छा प्रकट करने पर उन्हें रामोपाख्यान सुनाते हैं।
रामोपाख्यान की रामकथा ठीक वैसी भी नहीं है, जैसी वाल्मीकि रामायण में है। ऐसा माना जा सकता है कि रामोपाख्यान के रचयिता ने रामायण की हस्तलिपि का सहारा नहीं लिया है, किंतु अपने प्रदेश में प्रचलित रामायण उसे कंठस्थ रही होगी। इस कथा के संक्षिप्त वर्णन करने में छोटे-मोटे अंतर सहज ही आ गए होंगे।
यहाँ कांडवार यह देखना रुचिप्रद होगा कि रामकथा के किन-किन प्रसंगों में अंतर आया है।
बालकांड–
राम और उनके भाईयों के जन्म प्रसंग में पुत्रेष्टि यज्ञ तथा पायस का उल्लेख नहीं है।
सीता को जनक की पुत्री ही माना गया है, अयोनिजा नहीं।
चारों भाईयों की शिक्षा और विवाह, सीता को छोड़कर अन्य पत्नियों के नाम नहीं मिलते।
अयोध्याकांड—
गुह और अत्रि का उल्लेख नहीं होता। कैकयी को केवल एक वर मिला था। मन्थरा के विषय में लिखा है कि वह पहले एक गंधर्व दुंदुभी थी।
अरण्यकांड—
इसमें विराध, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य, अयोमुख तथा शबरी से संबंध रखने वाली सामग्री का अभाव है।
किष्किंधाकांड—
राम-सुग्रीव की मैत्री, वालिवध तथा वानरों का प्रेषण और उनका पूर्व, पश्चिम तथा उत्तर की ओर से प्रत्यागमन। पर इसमें–
सुग्रीव के साथ मित्रता करने के लिए राम के बल की परीक्षा नहीं होती।
वालि और सुग्रीव का द्वंदयुद्ध केवल एक बार हुआ है।
सुंदरकांड—-
किष्किंधाकांड के अंतिम भाग और सुंदरकांड के पहले ६० सर्ग, अर्थात् हनुमान् तथा उनके साथियों का समस्त वृत्तान्त रामोपाख्यान का रचयिता स्वयं वर्णन नहीं करता, वरन हनुमान् राम के पास लौटकर सुनाते हैं। रामोपाख्यान में अविंध्य को अधिक महत्व दिया गया है।
रामायण में सीता हनुमान् से अविंध्य का उल्लेख करती है और उसके बाद अविंध्य के विषय में कुछ नहीं कहा जाता है। अविंध्यो नाम मेधावी विद्वानराक्षस पुंगव:।
धृतिमाञ्छीलवावृन्वृद्धो रावणस्य सुसंमत:।।
रामक्षयमनुप्राप्तं रक्षसां प्रत्यचोदयत्।
न च तस्य स दुष्टात्मा श्रृणोति वचनं हितम्।।
रामोपाख्यान में त्रिजटा सीता को सांत्वना देकर अविंध्य का संदेश सुनाती है—राम, सुग्रीव के साथ मैत्री कर शीघ्र आने वाले हैं। रावण नलकूबर के श्राप के कारण सीता का सतित्व नष्ट करने में असमर्थ है।
“अविंध्यो नाम मेधावी वृद्धो राक्षसपुंगव:।
स् रामस्य हितान्वेषी ……………………।।
इसके अतिरिक्त सीता हनुमान् से इस संदेश का उल्लेख करती है। इन्द्रजित् के वध के बाद अविंध्य रावण को सीता की हत्या करने से रोकता है। रामायण में सुपार्श्व यह कार्य करता है।
रावण के बाद विभीषण और अविंध्य सीता को राम के पास ले जाते हैं।
युद्धकांड—
इस कांड में कई परिवर्तन किए गए हैं।
रावण की सभा, राम का मायामय सिर, रावण-सुग्रीव युद्ध, इन सबका रामोपाख्यान में अभाव है। सेतुबंध के वृत्तान्त में समुद्र राम को सपने में दर्शन देता है और सहायता की प्रतिज्ञा करता है। राम का समुद्र में बाण मारना आदि, इसका रामोपाख्यान में उल्लेख नहीं हुआ है।
रामोपाख्यान के अनुसार कुंभकर्ण का वध लक्ष्मण द्वारा किया जाता है।
द्वंदयुद्ध और लंकादहन— रामोपाख्यान में इस सामग्री का अभाव है।
रामायण में इन्द्रजित् एक मायासीता की हत्या करता है। रामोपाख्यान में इस सामग्री का उल्लेख नहीं है। नागपाश का वृत्तान्त रामायण में दो बार मिलता है। रामोपाख्यान में केवल एक बार और इसमें विभीषण, राम और लक्ष्मण को प्रज्ञास्त्र से स्वस्थ कर देता है तथा राम को कुबेर का भेजा हुआ जल देता है। इस जल से आँखें धोकर राम अदृश्य प्राणी देख सकते हैं। (अन्तर्हितानाम भूतानां दर्शनार्थम्।) हनुमान् द्वारा औषधी पर्वत ले आने का रामोपाख्यान में उल्लेख नहीं होता है।
इसी तरह रामोपाख्यान में लक्ष्मण को शक्ति लगने का वृत्तान्त नहीं मिलता। इसमें रावण माया द्वारा राम और लक्ष्मण का रूप धारण किए हुए मायामय राक्षसों को उत्पन्न करता है। राम इनका विनाश करते हैं और इसके बाद ब्रह्मास्त्र द्वारा रावण को इस तरह जलाते हैं कि राख भी शेष नहीं रहती (न च भस्मापयदृश्यत।)
रामोपाख्यान में सीता की अग्निपरीक्षा भी नहीं होती।
उत्तरकांड—–
रामोपाख्यान राम के अयोध्या में प्रत्यागमन तथा उनके अभिषेक पर समाप्त होता है।
