महाप्रतापी रावण को मार गिराना श्रीराम के लिए भी आसान नहीं था। रावण महाबली के साथ ही महामायावी भी था। उसने कई विद्याएँ सिद्ध की थीं। जैन रामकथा ‘पमउचरियं’ के अनुसार रावण बहुरूपिणी विद्या की सिद्धि के लिए शांतिनाथ मंदिर में साधना करने जाता है। वह ध्यान में लीन हो जाता है। तब यह ज्ञात होने पर रामदल के बहुत से वानर, महाबली अंगद के नेतृत्व में उसकी साधना भंग करने वहाँ आ जाते हैं। वे वहाँ भारी उपद्रव मचाते हैं, किन्तु, रावण विचलित नहीं हुआ और उसने बहुरूपिणी विद्या प्राप्त कर ली। इसी प्रकार उसने बहुत सारी सिद्धियाँ हासिल की थीं। जिनका प्रयोग वह आवश्यकतानुसार करता रहता था। राम के साथ युद्ध के दौरान भी उसने मायावी व्यूह रच ड़ाला था। कभी उसने बहुत से राम, लक्ष्मण प्रकट कर दिए, कभी वह स्वयं अनेक रूपों में प्रकट हो गया। यद्यपि मायापति राम के आगे उसकी कुछ चली नहीं।
राम-रावण युद्ध का वर्णन अलग-कथाओं में अलग-अलग तरीके से किया गया है। वाल्मीकि रामायण के वर्णन के अनुसार
महोदर, महापार्श्व और विरुपाक्ष के वध के बाद रावण ने स्वयं रणभूमि में प्रवेश किया। इस युद्ध में उसने लक्ष्मण को अपनी शक्ति से आहत किया किन्तु राम द्वारा पराजित होकर भाग गया। बाद में रावण एक नए रथ पर चढ़ रणभूमि में प्रवेश किया और इन्द्र ने राम के पास अपना रथ और अपने सारथि मातलि को भेज दिया। द्वंदयुद्ध फिर प्रारंभ हुआ; इसमें अपने स्वामी को मूर्च्छित देख कर रावण का सारथि रथ को रणभूमि से दूर लेकर चला गया। चेतना प्राप्त कर रावण ने अपने सारथि को युद्धभूमि में लौटने का आदेश दिया। राम-रावण के इस अंतिम युद्ध के वर्णन में इसका उल्लेख मिलता है कि रावण के सिर फिर से उत्पन्न हो जाते थे यहाँ तक कि राम ने रावण के एक सौ सिर काट दिए (एकमेव शतं छिन्नं शिरसां तुल्यवर्चसाम्)। अन्त में मातलि के परामर्श के अनुसार राम ने अगस्त्य द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र से रावण की छाती को विदीर्ण कर दिया जिससे रावण निष्प्राण होकर भूमि पर गिर पड़ा। युद्ध में राम के पास इन्द्र का भेजा रथ था अथवा नहीं, इसमें भी मतभिन्नता है। रावण की मृत्यु पर विलाप करती हुई रावण की पत्नियाँ कहती हैं “जिसे देवता भी पराजित नहीं कर पाते हैं वह एक पैदल लड़ने वाले मनुष्य से मारा गया।( अवध्यो देवतानां यस्तथा दानव रक्षसाम्। हत: सोअयं रणे शेते मानुषेण पदातिना।।)
रावण वध से संबंधित बाद के वृतान्तों में
अधिकतर रावण के मर्मस्थल अथवा रावण की मृत्यु की किसी गुप्त युक्ति का उल्लेख है। रावण के नाभि में अमृत कुंड होने संबंधी अवधारणा सर्वप्रथम अध्यात्म रामायण में ही आई, जिसके अनुसार भीषण युद्ध के बीच विभीषण ने यह गुप्त रहस्य राम को बताया, जिसे जानकर राम ने आग्नेय अस्त्र से उस अमृत को सुखाया था। रावण के शरीर में स्थित अमृत का उल्लेख बहुत सी राम कथाओं में भी किया गया है, जैसे-आनंद रामायण, रंगनाथ रामायण, धर्मखण्ड, तत्व संग्रह रामायण, रामचरितमानस—
(नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावण बल ताकें।।)भावार्थ रामायण आदि। प्रतीत होता है, इन रामकथाओं के रचनाकारों ने इस प्रसंग के लिए अध्यात्म रामायण का अनुसरण किया था।
रावण के प्राण कहीं अन्यत्र होने अथवा उसका मर्मस्थल कहीं और होने जैसी धारणाओं के आधार पर भी कई कथाएँ बन गईं। जैसे- तत्वसंग्रह रामायण के अनुसार रावण ने जटायु से युद्ध करते समय धोखा देकर कहा था कि मेरा मर्मस्थल पैर का अँगूठा है। दक्षिण भारत के एक वृतान्त के अनुसार रावण का हँसनेे वाला सिर उसका मर्मस्थल है। सेरीराम में सीता हनुमान् को बताती हैं कि रावण के दाहिने कान के नीचे एक छोटा सा सिर है उसमें रावण का जीव रहता है।
कृतिवास रामायण में एक रोचक कथा दी गई है। इसके अनुसार रावण ने तपस्या करने के बाद ब्रह्मा से अमरत्व का वरदान मांगा था। ब्रह्मा ने उसे आश्वासन दिया कि तुम्हारे सिर और भुजाएँ कट जाने पर फिर उत्पन्न होंगी और रावण को ब्रह्मास्त्र देकर कहा था कि इस ब्रह्मास्त्र से तुम्हारा मर्मस्थान छेदित हो जाने पर ही तुम मर सकोगे। रावण बाद में वह ब्रह्मास्त्र मंदोदरी की रक्षा में छोड़ दिया । विभीषण ने इस रहस्य को खोल दिया तब हनुमान् ने राम की अनुमति से ब्राह्मण वेश में मंदोदरी के पास पहुँचकर कहा कि जब तक ब्रह्मास्त्र तुम्हारे पास है, रावण मर नहीं सकता। किन्तु, मुझे आशंका है कि विभीषण कहीं यह न जान लें तुमने उसे कहाँ छिपा रखा है। मंदोदरी ने उत्तर दिया कि मैं बहुत सावधान हूँ, मैंने उसे इस खंभे
में छिपाकर रखा है। इस पर हनुमान् ने स्फटिक का वह खंभा लाठी से तोड़ दिया तथा ब्रह्मास्त्र लेकर राम के पास लौटे।
बिर्होर रामकथा के अनुसार रावण का जीव उसके महल के भीतर एक मंजूषा में सुरक्षित था। हनुमान् और लक्ष्मण उस मंजूषा को खोलकर रावण के जीव को मुक्त कर दिया था। रामकियेन की कथा के अनुसार रावण का जीव गोपुत्र नामक रावण के गुरु के पास एक मंजूषा में बंद था और हनुमान् ने अंगद के साथ गोपुत्र के पास जाकर उस मंजूषा को छल से प्राप्त कर लिया। ब्रह्मचक्र के अनुसार रावण ने लंकादहन के बाद ही अपना हृदय किसी ऋषि के यहाँ सुरक्षित रखा था, हनुमान् ने रावण का रूप धारण कर उसे प्राप्त किया था और राम को दे दिया।
महानाटक के अनुसार राम ने विश्व के कल्याण को दृष्टि में रखकर रावण के वक्षस्थल पर बाण नहीं चलाया, राम जानते थे रावण के हृदय में सीता का निवास था, सीता के हृदय में राम और राम के हृदय में भुवनावली विद्यमान् थी। रामचरितमानस में इसका उल्लेख है। (ऐहि के हृदय बस जानकी, मम जानकी उर बास है।
मम उदर अनेक लागत बान सब कर नास है।।……) मानस में ही त्रिजटा सीता को आश्वासन देती है कि सिरों के कट जाने पर रावण व्याकुल होकर तुम्हें भूल जाएगा, तभी राम उसके हृदय में बाण मारकर उसका वध करेंगे ।( काटत सिर होइहिं विकल छूट जाई तव ध्यान।
तब रावनहि हृदय मँहु मरिहहिं राम सुजान।।)
कई कथाओं में रावण वध के वर्णन में अनेक गौण परिवर्तन किए गए हैं, जिन्हें जानना रुचिकर होगा। महाभारत के अनुसार रावण ने अंतिम युद्ध के समय राम तथा लक्ष्मण का रूप धारण करने वाले बहुत से मायामय योद्धाओं को उत्पन्न किया था। रावण की इस माया का उल्लेख बाद की राम कथाओं में भी मिलता है, उदाहरणस्वरूप रामचरित मानस। महाभारत में माना गया है कि राम का ब्रह्मास्त्र रावण को इस तरह जला देता है कि राख भी शेष नहीं रही। बलरामदास रामायण में राम रावणवध के समय अपना शरीर बढ़ाकर कृतान्तक रूप धारण कर लेते हैं। तत्वसंग्रह रामायण के अनुसार राम ने रावण का वध करने के लिए परमेश्वर का रूप धारण कर लिया; तोरवे रामायण में भी माना गया है कि रावण ने अपने वध के पूर्व राम का विश्वरूप देखा था। इस रचना के अनुसार ऋषि अगस्त्य ने युद्ध के समय ही राम को त्रिमूर्ति नामक बाण दिया और राम ने उसी बाण से रावण का वध किया था।

