यह बात तो उलटबांसी सी ही लगती है।भला यह कैसे संभव है कि रामायणकालीन पात्रों का सामना इतिहास कालीन विदेशी जातियों से हुआ हो। यहाँ इतिहासकालीन का अर्थ मात्र यह है कि इतिहास में जिनकी तिथि और कालक्रम सुनिश्चित किया जा चुका हो। क्योंकि, रामायण कालीन पात्रों की पुरातनता तय करना तो बहुत कठिन है। इस सम्बंध में सबके अपने-अपने मत हैं। आम धारणा के अनुसार उन्हें त्रेतायुग का माना जाता है, जो न जाने कब रहा होगा, जबकि जिन ऐतिहासिक विदेशी जातियों का उल्लेख यहाँ होने वाला है, वे लगभग ईसा पूर्व पांचवीं शती से पहली शती ईसवीं के बीच भारत आई थीं।
वाल्मीकि रामायण की एक कथा के अनुसार एक बार राजा विश्वामित्र अपनी एक अक्षौहणी सेना के साथ दिग्विजय पर निकले। उन परम प्रतापी राजा के सामने कोई भी राजा टिक न सका। वे सेना सहित भ्रमण करते हुए महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में जा पहुँचे। जहाँ महर्षि के अनेक शिष्य ऋषि-मुनियों के साथ निवास करते थे। महर्षि वसिष्ठ और राजा विश्वामित्र बहुत प्रेमपूर्वक आपस में मिले और एक-दूसरे की कुशलक्षेम पूछी। महर्षि ने राजा का आतिथ्य सत्कार किया। महर्षि ने राजा से यह आग्रह भी किया कि वे उनके साथ आई समस्त सेना का स्वागत भी करना चाहते हैं। राजा ने यह सोच कर कि कंद-मूल, फल खाने वाले ऋषि कैसे इतनी बड़ी सेना का सत्कार कर पाएँगे, विनम्रतापूर्वक मना किया। किन्तु, महर्षि के बहुत आग्रह करने पर वे राजी हो गए। फिर भी उन्हें यह जानने का उत्सुकता तो थी कि व्यवस्था किस प्रकार से हो पाती है।
तब महर्षि वसिष्ठ ने अपनी कामधेनु ‘शबला’ गौ को सारी व्यवस्था करने की आज्ञा दी। उनकी आज्ञा पर कामधेनु ने तुरंत पर्याप्त मात्रा में भिन्न-भिन्न प्रकार के भोजन की व्यवस्था कर दी, जिन्हें पाकर सारी सेना तृप्त हुई। राजा विश्वामित्र कामधेनु के इस चमत्कार को देखकर चकित रह गए। उन्होंने महर्षि से चलने की आज्ञा ली किन्तु, उनसे शबला गौ देने की विनती भी की। बदले में उन्होंने हजारों गौएँ, रथ, घोड़े, हाथी देने का प्रस्ताव किया। किन्तु, महर्षि किसी भी तरह अपनी शबला गौ को देने को सहमत नहीं हुए। तब राजा ने बलपूर्वक उस गौ को ले जाने के लिए अपने सैनिकों को आज्ञा दी। सैनिक उसे खींच कर ले जाने लगे। वह बहुत दु:खी हुई और अपनी रस्सी छुड़ाकर वसिष्ठ जी के पास वापस आ गई। उसने महर्षि से पूछा कि उन्होंने उसका त्याग क्यों कर दिया। तब वसिष्ठ बोले कि मेरे पास तो इतनी शक्ति है नहीं कि मैं राजा को रोक सकूँ। तब गौ बोली महर्षि ब्राह्मण की तपस्या का बल तो सबसे महान बल होता है, उसके सामने क्षत्रिय (शारीरिक) बल तो कुछ भी नहीं। आपकी आज्ञा हो तो मैं कुछ उपाय करूँ, तब महर्षि ने उसे शक्तिशाली सेना उत्पन्न करने की आज्ञा दे दी।
उनका यह आदेश सुनकर उस गौ ने वैसा ही किया। उसके हुँकार करते ही सैकड़ों पह्लव जाति के वीर पैदा हो गए।
“तस्या हुम्भारवोत्सृष्टा: पल्वा: शतशो नृप।
नाशयन्ति बलं सर्वं विश्वामित्रस्य पश्यत:।।”
वे सब विश्वामित्र के देखते ही देखते उनकी सारी सेना का विनाश करने लगे। तब क्रोधवश राजा विश्वामित्र ने कई तरह के अस्त्रों का प्रयोग कर उन पह्लव सेना का नाश कर ड़ाला। तब शबला गौ ने पुन: यवनमिश्रित शक जाति के भयंकर वीरों को प्रकट किया। उन यवनमिश्रित शकों से वहाँ की समस्त भूमि भर गई। उन्होंने विश्वामित्र की सेना को नष्ट करना आरम्भ किया। तब महातेजस्वी विश्वामित्र ने उन पर बहुत से अस्त्र छोड़े। उन अस्त्रों की चोट खाकर वे यवन, कम्बोज और बर्बर जाति के योद्धा व्याकुल हो उठे।
विश्वामित्र के अस्त्रों से घायल होकर व्याकुल हुआ देख वशिष्ठ जी ने फिर आज्ञा दी—” हे कामधेनु! अब योगबल से दूसरे सैनिकों की सृष्टि करो।” तब उस गौ के हुँकार से सूर्य के समान तेजस्वी काम्बोज उत्पन्न हुए। थन से शस्त्रधारी बर्बर प्रकट हुए। योनिदेश से यवन और शकृदेश से शक उत्पन्न हुए। रोमकूपों से म्लेच्छ, हारीत और किरात प्रकट हुए।
“तस्या हुम्भारवाज्जाता: काम्भोजा रविसन्निभा:।
ऊधस: त्वथ सञ्जाता: पल्वा: शस्त्रपाणय:।।
योनिदेशाच्च यवना: शकृद्देशाच्छकास्तथा।
रोमकूपेषु च म्लेच्छा हारीता: सकिरातका:।।”
“उन सब विदेशी सैनिकों का क्या हुआ, राजा विश्वामित्र किस प्रकार राजर्षि बने। उनका पुन: महर्षि वसिष्ठ से फिर युद्ध क्यों हुआ, वे राजर्षि से ब्रह्मर्षि बनने को लालायित क्यों हुए।” यह कहानी फिर कभी।
अभी तो यह छोर ढूँढ़ना है कि रामायण में इन विदेशी जातियों का उल्लेख आया कैसे । क्योंकि, इतिहासकार बताते हैं कि ये विदेशी जातियाँ ईसा पूर्व पांचवी शती से पहली शती के बीच अर्थात् छ: सौ वर्षों के अंतराल में भारत आईं। न कि अकस्मात् और एक साथ। भारत पर सबसे पहले ईरानी आक्रमण ५५० ई.पू. में हुआ। इसके बाद सिकंदर के नेतृत्व में ३२८ ई.पू. में यूनानियों ने भारत पर आक्रमण किया। ये आक्रमण भारत के पश्चिमोत्तर भाग तक सीमित रहे। उनके बाद लगभग ७१ ई.पू. में शक भारत में आए। उन्होंने उज्जैन के राजा गर्दभिल्ल को हराकर अवन्ति पर आधिपत्य जमाया। किन्तु, मात्र चौदह वर्ष बाद ही ई.पू.५७ में गर्दभिल्ल के पुत्र विक्रमादित्य ने शकों को उज्जयिनी से खदेड़ा और विक्रम-संवत् का प्रवर्तन किया। संवत् की स्थापना के १३५ वर्ष बाद शकों ने भारत पर पुन: आक्रमण किया। उन्होंने अवन्ति पर पुन: अधिकार कर ७८ ईसवी में शक संवत् चलाया।
शकों के बाद पह्लव भारत आए और पश्चिमोत्तर भारत के बड़े भूभाग पर कब्जा जमाया। उनके कुछ ही समय बाद ऋषिक-तुषार अथवा कुषाण भारत आए। कुषाणों का सबसे प्रतापी राजा कनिष्क था जिसने एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया था। वैसे पांचवी शती ईसवीं में हूण भी भारत आए, जो सर्वाधिक बर्बर और क्रूर थे। किंतुु, शबला गौ ने जिन्हें उत्पन्न किया था, उनमें उनका नाम नहीं है।
इस संबंध में राम-कथा के अध्येताओं का मत है कि राम-कथा संबंधी आख्यानों की रचना और प्रचार-प्रसार वैदिक काल के बाद से होने लगा था। किन्तु, पांचवीं-छठीं ईसा पूर्व में कभी महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें क्रमबद्ध संहिता का रूप दिया। इस प्रकार रामायण की रचना हुई। मूल रामायण में पाँच कांड़ (अयोध्या से युद्धकांड़ तक) ही थे। बाद में अन्य ऋषियों ने उसमें बालकांड और उत्तरकांड भी जोडे़। इनमें कई पौराणिक कथाएँ सम्मिलित कर दी गईं, जिनका मूल रामकथा से कोई संबंध नहीं था। कई प्रक्षेपक भी इसमें जुड़े।यह विकास लगभग दूसरी ईसवीं शती तक होता रहा। उसके बाद रामायण का स्वरूप स्थिर हो गया। इसलिए उस काल तक जो प्रमुख घटनाएँ हुईं अथवा विदेशी आक्रमण हुए, वे रूपक के तौर पर इसमें सम्मिलित कर लिए गए। यही कारण है कि कामधेनु गौ के माध्यम से यवन,शक, पह्लव, कुषाण आदि विदेशी लड़ाकू जातियों की उत्पत्ति की धारणा संस्थापित की गई।

