1.7 कैसे शुरू हुई रामभक्ति की पावन धारा.

1.7 कैसे शुरू हुई रामभक्ति की पावन धारा.

श्रीराम को श्रीहरि के अवतार होने संबंधी मान्यता यद्यपि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में तब मिल चुकी थी,जब भागवत धर्म फलने-फूलने लगा था।फिर भी राम-भक्ति का वातावरण बनने में लगभग एक हजार वर्ष लग गए।यह रसमय वातावरण आठवीं-नौवीं शताब्दी से बनना शुरु हुआ जोकि,सोलहवीं शती में आकर अपने उच्चतम शिखर पर पहुँच गया।रामानुज सम्प्रदाय के अन्तर्गत ऐसे अनेक ग्रंंथों की रचना हुई,जिनमें रामभक्ति का काव्यात्मक और भावात्मक निरुपण किया गया साथ ही वैष्णव संहिताओं और उपनिषदों में रामभक्ति और रामपूजा का शास्त्रीय प्रतिपादन और राम के प्रति दास्य-भक्ति को भी महत्व दिया गया है।इन रचनाओं में अगस्त्य-संहिता, कलिराघव, बृहद् राघव और राघवीय संहिता प्रमुख है।तीन रामभक्ति सम्बन्धी साम्प्रदायिक उपनिषदें भी हैं–रामपूर्वतापनीय,

रामोत्तरतापनीय और रहस्योपनिषद्।इनमें राम परमपुरुष और सीता मूल प्रकृति मानी जाती हैं।

इन रचनाओं में वेदान्त और भक्ति का समन्वय करने का प्रयत्न किया गया है तथा राम को परब्रह्म परमात्मा ही माना गया है।मुक्तिकोपनिषद् में हनुमान् परमात्मा के रूप में राम की स्तुति करने के बाद (राम त्वं परमात्माअसि सचिदानन्द) उनसे निवेदन करते हैं कि राम अपने स्वरूप का तात्विक निरूपण करें–तवद् रूपं ज्ञातुमिच्छामि तत्वतो राम मुक्तये। इस पर राम वेदान्तज्ञान को सायुज्य मुक्ति का साधन बतलाते हैं और हनुमान् को निर्गुण भक्ति की साधना करने का उपदेश देते हैं। सीतोपनिषद में भी सीता को प्रकृति,साक्षात् शक्ति,योगशक्ति, भोगशक्ति,वीर शक्ति के रूप में निरूपण किया गया है।

रामभक्ति का अगला विस्तार रामानन्द सम्प्रदाय के प्रसार से हुआ।यद्यपि रामानन्द का सम्बन्ध रामानुज सम्प्रदाय से ही माना जाता रहा है।रामानन्द की प्रामाणिक रचनाओं में वैष्णवमताब्जभास्कर तथा श्री रामार्चन पद्धति प्रमुख है।इनमें उन्होंने रामानुज के विष्णु-लक्ष्मी के स्थान पर राम-सीता को अपना आराध्य माना है और उनके प्रति दास्य-भक्ति का प्रचार किया है।रामावत सम्प्रदाय के प्रचार के कारण राम-भक्ति जनसाधारण में फैलने लगी और आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास ने इस रामभक्ति को अपनी अमर रचना ‘रामचरितमानस’ में एक काव्यात्मक और हृदयग्राही रूप दिया है।

रामभक्ति के विकास के साथ ही रामकथा को भक्ति के सांचे में ढ़ालने का काम अध्यात्म रामायण, आनन्दरामायण और अद्भुत रामायण के माध्यम से भी हुआ है।अध्यात्म रामायण का स्पष्ट उद्देश्य है शंकराचार्य के सुप्रसिद्ध वेदान्त के आधार पर राम-भक्ति का प्रतिपादन करते हुए वाल्मिकीय रामकथा को थोड़े परिवर्तन के साथ प्रस्तुत करना।इसका रचनाकाल संभवत: १५वीं शती ईसवी है।यद्यपि इसकी रचना रामानन्दी सम्प्रदाय के बाहर हुई है,फिर भी अध्यात्म-रामायण शीघ्र ही इस सम्प्रदाय में प्रतिष्ठा पाने लगा और उसे रामचरितमानस का मुख्य आधार-ग्रंथ बनने का गौरव भी प्राप्त हुआ है।

साम्प्रदायिक रामायणों में अध्यात्म रामायण निर्विवाद रूप से सबसे महत्वपूर्ण है।रामभक्ति के विकास में इस ग्रंथ का अधिक महत्व है।इसकी कुछ खास विशेषताएँ इस प्रकार है—समस्त रचना पार्वती-शंकर-संवाद के रूप में दी गई है।नारद ने ब्रह्मा से इस संवाद को सुना था। इसमें अवतारवाद की व्यापकता है। राम, सीता, लक्ष्मण के परब्रह्म, मूलप्रकृति और शेष के अवतार होने का निरंतर उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार विश्वामित्र, वसिष्ठ, जनक, कौशल्या, कुम्भकर्ण, रावण आदि रामावतार के रहस्य से परिचित हैं। बालकांड में भागवत के अनुकरण पर इसमें भी विष्णु राम रूप में प्रकट होने के पूर्व माता कौशल्या को अपना चतुर्भुज रूप दिखाते हैं। राम की बाल-लीला भी कृष्ण की बाल-लीला के समान ही होती है।अहिल्या के उद्धार के बाद केवट का प्रसंग आता है,जो कि मानस में अयोध्याकांड में रखा गया है।राम के युवराज पद पर अभिषेक के पूर्व राम-नारद-संवाद आता हैै,जिसमें नारद राम को उनके मानवरूप में प्रकट होने का प्रयोजन बतलाते हैं। राम-वनवास के समय राम नाम महात्म्य दिखलाने के लिए वाल्मीकि अपनी आत्मकथा सुनाते हैं कि कैसे राम नाम के प्रभाव से वे पापकर्म से निवृत होकर ऋषि बने।अरण्यकांड में मायामयी सीता के हरण का वृतान्त दिया गया है।इसमें लक्ष्मण के बारह वर्ष तक उपवास करने का उल्लेख भी है। राम द्वारा सेतुबंध के पूर्व शिवलिंग की स्थापना की जाती है। कालनेमि का वृतान्त भी इसमें जुड़ा हुआ है। रावण का शुक्र के परामर्श के अनुसार यज्ञ करना तथा अंगद द्वारा उसे भंग किया जाना उल्लेखित है। रावण के नाभिदेश में स्थित अमृत का भी इसमें जिक्र है। वैकुण्ठ जाने के उद्देश्य से रावण के सीताहरण का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि वाल्मीकि रामायण के साथ-साथ अध्यात्म रामायण ने भी अन्य साम्प्रदायिक रामायणों के लिए आधार का काम किया।

Back To Top