(हम रामकथा से के उस रूप से परिचित हैं, जो ब्राह्मण परम्परा से चली आ रही है,जिसमें राम को श्री हरि विष्णु का पूर्णावतार माना गया है।उनके अवतार लेने का उद्देश्य दुष्टों का विनाश और धर्म की स्थापना रहा है।वाल्मीकि रामायण से रामचरित मानस तक हमें रामकथा का यही स्वरूप दिखता है।किन्तु,हर सम्प्रदाय रामकथा को इस रूप में नहीं देखता।जैसे जैन साहित्य में रामकथा का कुछ अलग ही स्वरूप है।यद्यपि में जैन साहित्य में श्रीराम से संबंधित साहित्य की प्रचुरता है,किन्तु उन्हें जैन सिद्धांतों के सांचे में ढ़ाला गया है। जिससे उसका स्वरूप हमारी जानी-पहचानी रामकथा से अलग हो गया है।जिसकी एक झलक इस आलेख में है।)
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जैन रामकथा का प्रथम और प्रतिनिधि ग्रंथ है ‘पउमचरियं’।जिसकी रचना जैन विद्वान आचार्य विमलसूरि ने की थी।जैन परम्परा के अनुसार यह रचना ७२ ईसवी की है।यह ग्रंथ शुद्ध जैन महाराष्ट्री में लिखा है।इसका संस्कृत रुपान्तरण रविषेणाचार्य ने ६६० ईसवीं में ‘पद्मचरित्र’ के नाम से किया।विमलसूरि ने राम को पउम (पद्म) कहा है,इसलिए अपनी रचना का नाम पउमचरियं (पद्मचरित) रखा है।
विमलसूरि की कथा और वाल्मीकि की कथा की तुलना करने पर स्पष्ट हो जाता है कि मुख्य कथावस्तु की दृष्टि से दोनों में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं है।रामकथा के विभिन्न प्रसंगों में जो अंतर है,वह इस प्रकार है–
रावण-चरित— रावण का चरित्र वाल्मीकि रामायण से बहुत अलग है।रावण एक धर्म-भीरु जैनी है,जो जिन-मंदिरों का जीर्णोद्धार करता है और ऐसे यज्ञों पर रोक लगता है,जिनमें पशुओं की बलि दी जाती है।वह नलकूबर की पत्नी उपरंभा का प्रेम प्रस्ताव अस्वीकार करता है तथा अनन्तवीर्य का उपदेश सुनकर व्रत लेता है कि वह विरक्त परनारी के साथ रमण नहीं करेगा।
इसमें रावण के जन्म की कथा यह है कि राक्षस राजा रत्नश्रवा तथा कैकसी की चार संतान है–दशमुख (रावण),भानुकर्ण (कुम्भकर्ण),चन्द्रनखा (सूर्पनखा) और विभीषण। जब रत्नश्रवा ने पहले-पहल अपने पुत्र को देखा था,तब शिशु माला पहने हुआ था,इस माला में पिता को बालक के दस सिर दिखाई पड़े,इसलिए उन्होंने इस बालक का नाम दशमुख रखा।
अपने मौसेरे भाई वैश्रमण (वैश्रवण-कुबेर) का वैभव देखकर दशमुख अपने भाइयों के साथ तप करने जाता है और विभिन्न विद्याएँ प्राप्त कर लेता है।बाद में वह वैश्रवण और यम को परास्त करता है और पुष्पक प्राप्त कर लंका में प्रवेश करता है।
रावण की बहुत सी विजय यात्राओं का वर्णन किया गया है,जिसमें वह सहस्त्रकिरण,नलकूबर,इन्द्र,वरुण आदि को परास्त करता है।विशेष बात यह है कि यम,इन्द्र,कुबेर,वरुण आदि देवता न होकर साधारण राजा माने जाते हैं।
राम और सीता का जन्म और विवाह– कथा के अनुसार दशरथ का विवाह अपराजिता (कौशल्या),सुमित्रा और कैकेयी के साथ होता है।राम अपराजिता से जन्म लेते हैं,लक्ष्मण सुमित्रा से और भरत तथा शत्रुघ्न,दोनों ही कैकेयी से।
राजा जनक कि विदेहा नामक महारानी से एक पुत्री सीता और एक पुत्र भामंडल उत्पन्न हुआ।राम म्लेच्छों के विरुद्ध जनक की सहायता करते हैं,जिसके कारण राम और सीता का वाग्दान हुआ,बाद में सीता-स्वयंवर के अवसर पर राम ने धनुष चढ़ाया और राम-सीता का विवाह सम्पन्न हुआ।इसके बाद दशरथ को वैराग्य हुआ।उस समय कैकेयी ने अपने वर के बल पर भरत के लिए राज्य मांग लिया। यह सुनकर राम,सीता और लक्ष्मण दक्षिण की ओर चले जाते हैं।बाद में कैकेयी को अपराध-बोध होता है और उसके अनुरोध पर भरत वन में जाकर राम से राज्य स्वीकार करने का अनुरोध करते हैं।राम के मना कपने पर वह अयोध्या लौटकर स्वयं राज्य-भार ग्रहण करते हैं,बाद में भरत किसी मुनि के समक्ष यह प्रतीज्ञा करते हैं कि राम के वापस लौटने पर मैं दीक्षा ग्रहण करूँगा।
वनभ्रमण–यद्यपि ‘पउमचरियं’ में चित्रकूट का उल्लेख है,फिर भी यह अंश वाल्मीकीय वृतान्त से बिल्कुल अलग है।इसमें राम अथवा लक्ष्मण द्वारा इन राजाओं को हराने का जिक्र मिलता है–वज्रकर्ण के विरोधी सिंहोदर,म्लेच्छों का राजा,भरत के विरोधी अतिवीर्य।कई अवसरों पर लक्ष्मण को कन्याएँ विवाह में दी जाती हैं,वे सभी को स्वीकार कर कहते हैं कि लौटते समय उन्हें ले जाऊँगा।इनके अतिरिक्त वे वनमाला,रतिमाला और जितपद्मा को भी प्राप्त कर लेते हैं।
राम वन में कपिल नामक ब्राह्मण और देवभूषण तथा पद्मभूषण से भी भेंट करते हैं।राम की आज्ञा से राजा सुरप्रभ ने वंश पर्वत पर बहुत से मंदिर बनवाए,जिससे इसका नाम रामगिरि रखा गया।
जैन राम कथा ‘पउमचरियं’ में सीता-हरण और खोज की कथा वैसी नहीं है,जैसी हम वाल्मीकि रामायण में पाते हैं।सीता-हरण का कारण विमलसूरि के अनुसार इस प्रकार है–चन्द्रनखा तथा खरदूषण के पुत्र शम्बूक ने सूर्यहास खंग की सिद्धि के लिए बारह वर्ष तक साधना की।उसकी साधना सफल हुई और सूर्यहास खंग प्रकट हुआ।लक्ष्मण संयोग से वहाँ पहुँचते हैं।खंग देखकर उसे उठाते हैं और पास के बांस काट कर शम्बूक का सिर भी काट लेते हैं।चंद्रनखा अपने मृत पुत्र को देखकर विलाप करते-करते वन में फिरने लगती है।राम और लक्ष्मण के पास पहुँचकर वह उनसे उनकी पत्नी बनने का प्रस्ताव करती है।असफल होकर वह पति के पास लौट कर अपने पुत्र के वध का समाचार सुनाती है।रावण को भी सूचना भेजी जाती है।इतने में लक्ष्मण अकेले ही खरदूषण की सेना को रोक लेते हैं।रावण वहाँ पहुँचकर और सीता को देखकर उन पर आसक्त हो जाता है।वह अवलोकिनी विद्या से जानता है कि लक्ष्मण ने राम को बुलाने के लिए उन्हें सिंहनाद का संकेत बताया है।इसलिए वह सिंहनाद करके और इस प्रकार राम को लक्ष्मण के पास भेज कर सीता के अपहरण में सफल हो जाता है।
सीता-हरण के बाद राम और सुग्रीव की मित्रता का वर्णन है।यहाँ सुग्रीव की विपत्ति परम्परागत कथाओं से अलग है।साहसगति ने सुग्रीव का रूप धारण कर उसकी पत्नी और राज्य को छीन लिया था।राम साहसगति को मारकर सुग्रीव को उसका राज्य लौटाते हैं।
सुग्रीव की आज्ञा से विद्याधर सीता की खोज करने जाते हैं।खोजते हुए सुग्रीव रत्नजटी से सुनता है कि रावण ने सीता का हरण किया है।यह सुनकर सभी विद्याधर रावण से डरकर युद्ध से मना कर देते हैं और हनुमान् को रावण के पास भेजने की सलाह देते हैं।हनुमान् अपनी इस यात्रा में नाना महेन्द्र को परास्त करते हैं,क्योंकि महेन्द्र ने उनकी माता अंजना को घर से निकाला था।लंका के पास पहुँचकर वे विभीषण द्वारा निर्मित प्राचीर पार कर पहले वज्रमुख का वध करते हैं और उसके बाद उसकी कन्या लंकासुन्दरी को परास्त करते हैं।तब वे विभीषण से तथा सीता से मिलते हैं।बाद में वे लंका में उद्यानों और महलों का विध्वंस करने लगते हैं और इन्द्रजित द्वारा बाँधे जाकर रावण के सामने उपस्थित किए जाते हैं।वे रावण को धमकाकर अपने बंधनों को तोड़ते हैं और रावण का महल ध्वस्त करके सीता का संदेश राम के पास ले जाते हैं।
युद्ध–वाल्मीकीय वृतान्त को दृष्टि में रखकर युद्धकांड के वर्णन में ये परिवर्तन उल्लेखनीय हैं- सेतुबंध के स्थान पर समुद्र नाम के राजा की कथा दी गई है,वह वानरों की सेना को रोक लेता है,जो नल द्वारा पराजित किया जाता है।
–विभीषण के अनुरोध करने पर कि सीता को लौ़टाया जाए,रावण ने उसे नगर से निकालने का आदेश दिया।इस पर विभीषण ने अपनी समस्त सेना के साथ हंसद्वीप में राम की शरण ली।उसी समय सीता के भाई भामंडल भी युद्ध में भाग लेने राम के पास आ पहुँचे।
–राम और लक्ष्मण की जगह पर सुग्रीव और भामंडल इन्द्रजित् के नागपाश में बाँधे गए तथा गरुड़केतु लक्ष्मण द्वारा मुक्त हुए।
–लक्ष्मण को शक्ति लगने पर द्रोणमेघ की कन्या विशल्या उनकी चिकित्सा करती है और बाद में लक्ष्मण और विशल्या का विवाह सम्पन्न हो जाता है।
–रावण सामन्त नामक दूत को भेजकर संधि प्रस्ताव रखता है।रावण राम को अपने राज्य का एक अंश तथा तीन हजार कन्याओं को इस शर्त पर देने को तैयार है कि वह सीता को त्याग दें और कुम्भकर्ण,इन्द्रजित् तथा मेघवाहन को मुक्त कर दें।
— रावण बहुरूपा नामक विद्या को सिद्ध करने के लिए शांतिनाथ के मंदिर में साधना करने लगता है।वानर सैनिकों के द्वारा ध्यान भंग किए जाने के निष्फल प्रयत्न बाद रावण अपनी साधना में सफलता प्राप्त करता है।
— बहुरूपा विद्या सिद्ध करने के बाद रावण फिर से सीता से मिलने जाता है और धमकी देता है कि अब राम का वध करके मैं अवश्य तुम्हारे साथ रमण करूँगा।तब सीता ने उत्तर दिया कि मेरा जीवन राम पर आधारित है और वह मूर्छा खाकर पृथ्वी पर गिर जाती हैं।राम के प्रति सीता का अटल प्रेम देखकर रावण पछताने लगता है और राम तथा लक्ष्मण को युद्ध में परास्त कर उन्हें सीता लौटाने का संकल्प लेता है।
— लक्ष्मण (नारायण) ही रावण (प्रतिनारायण) का वध करते हैं।
— कुम्भकर्ण और रावण के पुत्र इन्द्रजित् और मेघवाहन,जो युद्ध में कैदी हो गए थे,रावण के वध के बाद मुक्त किए जाते हैं।वे विरक्त होकर तपस्या करने जाते हैं।मन्दोदरी,चन्द्रनखा आदि आठ हजार युवतियां भी महल को छोड़कर साधना का जीवन अपनाती हैं।लंका में प्रवेश कर राम सर्वप्रथम सीता से मिलने जाते हैं।देवता दोनों का मिलन देखकर पुष्पवृष्टि करते हैं तथा सीता के निर्मल चरित्र का साक्ष्य देते हैं।राम के संदेह अथवा अग्नि-परीक्षा की ओर कोई संकेत भी नहीं मिलता।
— राम-लक्ष्मण अब रावण के महल में ठहरते हैं तथा उन कन्याओं को बुला भेजते हैं,जिनके साथ उनकी मंगनी हो चुकी है। लंका में ही उनके साथ विवाह सम्पन्न हो जाता है। इसके बाद राम-लक्ष्मण के छ: वर्ष तक लंका में निवास करने का उल्लेख किया गया है।
उत्तरकांड की रामकथा के अनुसार किसी दिन दो देवता बलभद्र (राम) और नारायण (लक्ष्मण) का स्नेह परखने के लिए लक्ष्मण को विश्वास दिलाते हैं कि राम स्वर्गवासी हो गए हैं।इस पर लक्ष्मण शोकातुर होकर प्राणत्याग देते हैं और नरक जाते हैं (क्योंकि उन्होंने युद्ध में भारी हिंसा की थी)। लक्ष्मण की अंत्येष्टि के बाद राम विरक्त होकर दीक्षा लेते हैं और सत्रह हजार वर्ष तक साधना करके निर्वाण प्राप्त करते हैं।अन्त में लक्ष्मण,रावण और सीता के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उनको भी अनेक बार जन्म लेने के बाद मुक्ति मिल जाएगी।
यह रामकथा हमें विचित्र और अटपटी लग सकती है क्योंकि यह हमारी धारणा से मेल नहीं खाती।किन्तु,लगभग दो हजार वर्ष पूर्व,जब आचार्य विमलसूरि ने यह कथा लिखी होगी,तब जैन साधु (साहु-परम्पराएँ) में ऐसी ही मान्यता प्रचलित रही होंगी,जिसे उन्होंने अपने गुरु से सुनकर उसके आधार पर अपने महाग्रंथ ‘पउमचरियं’ की रचना की होगी।
