महाकाव्य रामायण के रचयिता आदिकवि वाल्मीकि कौन थे?रामकथा साहित्य के मर्मज्ञ इस प्रश्न का उत्तर एक अर्से से खोज रहे हैं,किन्तु किसी निश्चित समाधान तक वे नहीं पहुँच सके हैं।क्योंकि इस महान कवि के जीवनवृत के संबंध में प्रामाणिक सामग्री का नितान्त अभाव है।युद्धकांड की फलश्रुति को छोड़कर प्रमाणिक वाल्मीकिकृत रामायण में वाल्मीकि की ओर कहीं भी संकेत नहीं मिलता।इस फलश्रुति में और बालकांड,उत्तरकांड और महाभारत में वाल्मीकि को रामायण का रचयिता माना गया है।किन्तु,इस आदिकवि से भिन्न भी तीन वाल्मीकि और थे।ये थे वैयाकरण वाल्मीकि,सुपर्ण वाल्मीकि और महर्षि वाल्मीकि।
महर्षि वाल्मीकि–बालकांड और उत्तरकांड के रचनाकाल के समय तक आदिकवि वाल्मीकि तथा प्राचीन ऋषिवर वाल्मीकि को एक माना जाने लगा था और वाल्मीकि को रामायण की घटनाओं का समकालीन माना गया था।
बालकांड के प्रारंभ में रामायण की उत्पत्ति की कथा मिलती है।तपस्वी,मुनि,महर्षि वाल्मीकि नारद से रामकथा का सार सुन लेते हैं,पश्चात श्लोक का आविष्कार कर लेने के बाद,ब्रह्मा के आदेश से रामकथा को श्लोकबद्ध करते हैं और अपनी इस रचना को अपने दो कुशीलव शिष्यों को सिखलाते हैं।ये दोनोंं सर्वत्र रामायण गाते हैं और एक बार उसे अयोध्या के महल में भी राम और उनके भाईयों को सुनाते हैं।
उत्तरकांड के अनुसार लक्ष्मण सीता जी को वाल्मीकि आश्रम के पास छोड़ते हैं और उन्हें महर्षि वाल्मीकि का आश्रय लेने का सुझाव देते हैं,क्योंकि वे ब्राह्मण और दशरथ के सखा हैं।बाद में सीता वाल्मीकि आश्रम में लव और कुश को जन्म देती हैं,वे वाल्मीकि से रामायण सीख लेते हैं और उनका आदेश पा कर उसे राम के यज्ञस्थल पर सुनाते हैं।रामायण सुन लेने के बाद राम सीता को बुला भेजते हैं और वाल्मीकि सीता को ले आकर सभा के सामने सीता के सतीत्व का साक्ष्य देते हैं।इस अवसर पर वाल्मीकि अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि मैं प्रचेता (वरुण) का दसवां पुत्र हूँ।मैंने हजारों वर्ष तप किया है:
प्रचेतसोअहं दशम: पुत्रो राघवनन्दन।
न स्मराम्यनृतं वाक्यमिमौ तु तव पुत्रकौ।।
बहुवर्ष सहस्त्राणि तपश्चर्या मया कृता।।
इसके अतिरिक्त वे इस बात पर भी बल देते हैं कि मैंने कभी पाप नहीं किया है:
मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्व न किल्विषम्।
इससे यह भी पता चलता है कि वाल्मीकि के दस्यु होने की जो कथा बाद में प्रचलित हो गई है उसे उत्तरकांड के रचयिता नहीं मानते थे।
भार्गव वाल्मीकि–महाभारत के एक श्लोक के अनुसार:
श्लोकाश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना।
आख्याते रामचरिते नृपतिं प्रति भारत।।
इससे प्रतीत होता है रामायण के रचयिता और वाल्मीकि दोनों एक ही थे।अथवा महर्षि वाल्मीकि को ही भार्गव की उपाधि मिल गई थी।
बाद की रचनाओं में वाल्मीकि बहुधा भार्गव माना गया है,जैसे विष्णुपुराण और मत्स्यपुराण।वाल्मीकि शब्द की उत्पत्ति प्राय: ‘वल्मीक’ (दीमकों का बाँबी)से मानी जाती है।इसलिए यह कथा प्रचलित होने लगी कि वाल्मीकि वास्तव में वल्मीक से निकले थे।भार्गव च्यवन के विषय में भी इस प्रकार की कथा व्यापक रूप से प्रचलित थी।महाभारत के आरण्यक पर्व के अनुसार भृगु के पुत्र च्यवन तपस्या करते हुए इतने समय तक निश्चल खड़े रहे कि उनका शरीर वल्मीक से ढ़ंक गया।राजपुत्री सुकन्या ने उन्हें अंधा बना दिया और बाद में उनसे विवाह भी कर लिया।यह वृतान्त भागवत पुराण, स्कंदपुराण,देवीभागवतपुराण और पद्मपुराण में भी मिलता है।
वाल्मीकि और च्यवन दोनों के संबंध में माना गया है कि दोनों वल्मीक से निकले थे।इस कारण दोनों कथाओं का मिल जाना स्वाभाविक प्रतीत होता है।एक ओर से वाल्मीकि को भार्गव की उपाधि दी गई और दूसरी ओर च्यवन का संबंध रामकथा से जोड़ा गया।
दस्यु वाल्मीकि–एक परम्परा के अनुसार वाल्मीकि पहले दस्यु थे।बाद में दीर्घ तपस्या करने के बाद ही रामायण की रचना करने में समर्थ हुए।स्कंद पुराण में पहले पहल इसका विकसित रूप मिलता है।इसमें वाल्मीकि के संबंध में चार कथाएँ प्रकारान्तर से दी गई है।पर इनका सबसे प्रचलित रूप अध्यात्म रामायण के अयोध्या कांड में मिलता है।राम,लक्ष्मण और सीता वनवास काल में चित्रकूट के पास पहुँचे,उन्होंने अपना निवास-स्थल निश्चित करने के लिए वाल्मीकि का परामर्ष माँगा।वाल्मीकि ने राम की स्तुति करने के बाद राम नाम का महात्म्य दिखलाने के उद्देश्य से अपनी कथा सुनाई:
अहं पुरा किरातै: सह वर्धित:।
जन्ममात्रद्विजत्वं मे शूद्राचाररत: सदा।।
“मैं पहले किरातों के साथ रहा करता था और निरंतर शूद्रों के आचरण में रत रहने के कारण मेरा ब्राह्मणत्व जन्म मात्र का था।शूद्रा के गर्भ से मेरे बहुत से पुत्र उत्पन्न हुए।चोरों के कुसंग में मैं भी चोर बन गया था और सदा धनुष बाण धारण किए रहता था।एक दिन मैंने सात मुनियों को आते देखा और उनके वस्त्र आदि छीनने के उद्देश्य से उन्हें घनघोर वन में रोक लिया।मुनियों ने कहा कि जिन कुटुम्बियों के लिए तुम नित्य पाप संचय करते हो उनसे पूछ लो कि वे तुम्हारे अधर्म में भागी बनने को तैयार हैं या नहीं।मैंने जाकर पूछा और उत्तर मिला-“यह पाप तो तुम्हीं को लगेगा,हम तो केवल धन के भोगने वाले हैं।” यह सुनकर मुझे वैराग्य उत्पन्न हुआ और मैंने उन मुनियों की शरण ली। हे राम! उन मुनियों ने आपस में परामर्ष किया और आपके नामाक्षरों को उल्टा कर मुझसे कहा कि तुम इसी स्थान पर एकाग्रचित्त होकर निरंतर ‘मरा’ का जप करो (एकाग्रमनसात्रैव मरेति जप सर्वदा)। मैंने ऐसा ही किया।निश्चल खड़ा रहने के कारण मेरे उपर वल्मीक बन गया।एक सहस्त्र युग बीतने पर ऋषि लौटे और उन्होंने मुझको निकलने का आदेश देकर कहा–” हे मुनिवर, तुम वाल्मीकि हो।इस समय तुम वल्मीक से निकले हो,अत: यह तुम्हारा दूसरा जन्म हुआ है।
तत्वसंग्रह रामायण में भी इसी तरह की कथा है।आनन्दरामायण में यह कथा कुछ विस्तार से दोहराई गई है।कृतिवासीय रामायण में उक्त व्याध का नाम रत्नाकर है और वह च्यवन का पुत्र माना जाता है।शेष कथा वैसी ही है।तोरवे रामायण के अनुसार भरद्वाज ने क्रोंचवन में रहने वाले व्याध को आशीर्वाद दिया।बाद में उस व्याध ने बहुत समय तक तपस्या की और ब्रह्मा ने परमर्षित्व प्रदान किया।वह वल्मीक से निकला,इसलिए वाल्मीकि कहलाने लगा।
रामचरित मानस में भी वाल्मीकि के दस्यु,व्याध,शूद्र होने की ओर संकेत किया गया है।
जान नाम कवि नाम प्रतापू।
भयउ सुद्ध करि उल्टा जापू।।
उल्टा नाम जपत जग जाना।वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।।
तुलसीदास जी ने आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के प्रति भाव-विभोर होकर उनकी वंदना करते हुए उन्हें “कविश्वर” की उपाधि दी।(वन्दे विशुद्ध विज्ञानौ कविश्वरकपिश्वरौ।।)साथ ही रामायण के रचनाकार के रूप में उनका स्मरण किया है:
“बंदउँ मुनिपद कंजु रामायन जेहि निरमयउ।
सखर सुकोमल मंजु,दोष रहित दूषण सहित।।”

