8.11 कहाँ था मंदोदरी का मायका

8.11 कहाँ था मंदोदरी का मायका

रावण की पटरानी मंदोदरी कहाँ की थी,इसे लेकर इतिहासकार- पुराणकार और अध्येता देश के कई नगरों की चर्चा करते हैं।मध्यप्रदेश के मंदसौर और राजस्थान के मंडोर के लोग दशाशन को अपना दामाद बताते हैं।कुछ समुदाय रावण से ऐसे ही रिश्तों को मानकर विजयादशमी पर देश के अन्य हिस्सों की तरह उनका पुतला नहीं जलाते। लेकिन सच यह है उक्त दोनोंं ही जगह से मंदोदरी का संबंध होने का कोई पुख्ता पौराणिक आख्यान या आधार नहीं मिलता।मंदसौर में तो आज भी वह पीढ़ी मौजूद है जिसने इस लोक मान्यता को जन्म लेते देखा है।लगभग चार दशक पहले तक कोई इसकी चर्चा भी नहीं करता था।

मान्यताओं और लोक विचारों का अक्सर कोई न कोई सूत्र या सिरा मिलता है।लेकिन मंदोदरी के बारे में इतिहास और पुराणों के अध्येता ऐसे किसी आधार को स्थापित नहीं कर पाते।रामायण भी जिस तरह अन्य पात्रों की भौगोलिक सम्बद्धता की चर्चा करती है,वैसी मंदोदरी की नहीं मिलती।स्पष्ट उल्लेख नहीं होने से कई स्थानीय मान्यताएँ प्रचलित हो गईं।

सबसे दृढ़ व प्रचलित मान्यता जोधपुर के मंडोर की है जहाँ माना जाता है कि रावण का विवाह हुआ था।एक वेदी को इसका गवाह माना जाता है।हालांकि इसका कोई पौराणिक साक्ष्य नहीं है।राजस्थान के लोककला-विद डा.महेन्द्र भानावत बताते हैं कि साढ़े सात हजार साल पहले रावण ने यहाँ आकर मंदोदरी से विवाह किया।उसी के नाम से इसका नाम मंडोर पड़ा।उनकी कुलदेवी का पूजास्थल आज भी है।लेकिन वे कोई प्राचीन या शास्त्रीय उल्लेख नहीं देते। जोधपुर में रावण का मंदिर है और श्रीमाली समाज इन्हें पूजता है।

इसी तरह मंदसौर में रावण को एक समुदाय दामाद मानता है।दशानन की चालीस फीट की प्रतिमा भी बनाई गई है।लेकिन इसका पौराणिक उल्लेख कहीं नहीं है।न ही कोई ऐसी प्राचीन मान्यता ही है।वरिष्ठजन इसे कोई चार दशक पुरानी मान्यता ही बतलाते हैं।स्थानीय इतिहासकार व दशपुर एडवांस स्टडी सेंटर के निदेशक डाॅ.कैलाशचन्द्र पांडे कहते हैं कि मंदसौर शब्द का निर्माण अठारहवीं सदी के आसपास हुआ।पहले यह दशौर के नाम से जाना जाता था।जैन ग्रंथों में इसे दश उर कहा गया है।कालिदास के मेघदूत में भी इसका इसका जिक्र है।सबसे धीमे चलने वाला ग्रह शनि होता है जिसे मंदसौरी कहते हैं।कुछ लोगों ने इसे उससे जोड़ा पर इस नगर का उल्लेख रामायण व पर रामकथा साहित्य में कहीं नहीं है।मंदसौर में गुजरात के कपड़ा कारोबारियों ने खानपुर इलाके में सूर्य मंदिर बनवाया था।इसी क्षेत्र में कपड़ा रंगने वाले व उससे संबंधित उद्यमी रहने लगे।यहाँ मिट्टी की रावण प्रतिमा थी जिसे बाद नगर पालिक ने पक्का बनवाया।नामदेव समाज इन्हें पूजने लगा।मंदोदरी के जीवनकाल से संबद्ध कोई सूत्र यहाँ किसी के पास नहीं है।

वाल्मीकि रामायण में मंदोदरी के विवाह की बात कही गई है।मंडोर के लोग मानते हैं कि थार के मरुस्थल में हेमा व मय के सामने उनकी पुत्री मंदोदरी का परिणय प्रस्ताव आया।मंडोर में विवाह हुआ।वाल्मीकि रामायण भौगोलिक स्थिति पर प्रकाश नहीं डालती। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण ने किसी दिन मृगया के समय दिति के पुत्र मय को देखा जो अपनी पुत्री मंदोदरी के साथ वन में टहल रहा था।रावण द्वारा परिचय पूछे जाने पर मय ने अपनी कथा सुनाई तथा रावण का परिचय प्राप्त करने के बाद उसके सामने अपनी पुत्री मंदोदरी के साथ विवाह करने का प्रस्ताव रखा।रावण ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया,रावण ने उस अवसर पर रावण को अमोघ शक्ति भी दे दी जिससे वह बाद में लक्ष्मण को आहत करने वाला था।

आनन्द रामायण एक सर्वथा अलग कथा मिलती है।इसके अनुसार रावण ने अपने गायन द्वारा शिव को प्रभावित कर उनसे दो वर मांग लिए अर्थात् अपनी माता कैकसी के लिए आत्मलिंग और अपने लिए पार्वती को।शिव ने रावण को सावधान किया कि इस लिंग को मार्ग में पृथ्वी पर कहीं रख देने पर वह वहीं अटल हो जाएगा।इसके बाद रावण लिंग और पार्वती को लेकर चला गया।पार्वती ने विपत्ति में विष्णु का स्मरण किया।विष्णु ने अपने अँग के चंदन से सुंदरी मंदोदरी की सृष्टि करके उसे मय के घर में रख दिया,तब वह ब्राह्मण का रूप धारण कर मार्ग में रावण से मिले और उन्होंने रावण से कहा शिव ने धोखा देकर वास्तविक पार्वती को पाताल में मय के यहाँ छिपाया है।यह सुनकर रावण ने शिव के पास जाकर वास्तविक पार्वती को लौटाया और पाताल जाने को तैयार हुआ।रास्ते में लघुशंका करने की इच्छा से आत्मलिंग उस ब्राह्मण (विष्णु) के हाथ में दे दिया।देर हो जाने पर विष्णु आत्मलिंग गोकर्ण में भूमि पर रखकर अन्तर्द्धान हो गए।रावण वापस आकर आत्मलिंग उठाने में असमर्थ हुआ,तब उसने मय के घर जाकर विष्णु द्वारा निर्मित मंदोदरी को प्राप्त किया।

दक्षिण भारत के एक वृतांत में इस कथा का एक अन्य रूप मिलता है।विष्णु के स्थान पर नारद रावण के पास जाकर कहते हैं कि पार्वती एक तालाब में छिपी बैठी हुई है।इस पर रावण मन्दोदरी को तालाब से निकाल कर उसे लंका ले जाता है।उस वृतान्त के अनुसार मंदोदरी वास्तव में एक मंडूक है,जिसने नारी का रूप धारण किया था।

रंगनाथ रामायण में मन्दोदरी की उत्पत्ति के संबंध में कथा इस प्रकार है।पार्वती ने किसी दिन स्नान करने के बाद अपने शरीर के चंदन से एक पुतली बनाई और शिव ने उनकी प्रार्थना सुनकर पुतली में प्राण डाले।वह उसका सौन्दर्य देखकर उसपर आसक्त हो गए,किन्तु पार्वती के आग्रह पर उन्होंने उसे मंडूक में बदल दिया और कहा कि जब मय संतति के लिए तपस्या करेगा, तो मैं इसे फिर कन्या का रूप देकर मय को प्रदान करूँगा।बाद में मय ने उसका विवाह रावण के साथ कराया।

रामकियेन में मंदोदरी की कथा का एक अन्य रूप मिलता है।किसी मंडूक ने चार ऋषियों का जीवन बचाया था और पुरस्कार स्वरूप ऋषियों नें मंडो नामक एक अत्यंत सुन्दर युवती में बदलकर उसे ईश्वर को समर्पित कर दिया।ईश्वर ने उसे उमा को दे दिया।बाद में ईश्वर के दिए हुए वर के बल पर रावण ने उमा को प्राप्त किया।तब नारायण ने माली का रूप धारण कर रावण के सामने एक पौधे को उलटे ढंग से रोपने का प्रयत्न किया। रावण उसकी मूर्खता पर टिप्पणी करने लगा,जिस पर नारायण ने कहा कि जिसने मंडो को छोड़कर उमा को चुन लिया वह मुझसे अधिक मूर्ख है।यह सुनकर रावण ईश्वर के पास गया और उसने उमा को लौटा कर मंडो को ले लिया।

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(इस आलेख के लेखक हैं वरिष्ठ पत्रकार श्री शिवकुमार विवेक एवं विजय बुधोलिया)

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