रामलीला उत्तरी-भारत में परम्परागत रूप से खेला जाने वाला राम के चरित पर आधारित नाटक है।लोग इन्हें बहुत रुचि से देखते हैं।यह प्राय: विजयादशमी के अवसर पर खेला जाता है।लोकनाट्य के रूप में प्रचलित इस रामलीला का देश के विविध प्रांतों में अलग-अलग तरीकों से मंचन किया जाता है।
समुद्र से लेकर हिमालय तक प्रख्यात रामलीला का आदि प्रवर्तक कौन है,इस बारे में कई मत हैं।एक किंवदंती का संकेत है कि त्रेतायुग में श्रीराम के वन जाने के बाद चौदह वर्ष की वियोगावधि अयोध्या-वासियों ने राम की बाल-लीलाओं का अभिनय कर बिताई थी।एक अन्य कथा के अनुसार अयोध्यावासियों द्वारा सीता जी के चरित्र पर लांछन लगाए जाने के कारण श्रीराम ने लोकनिन्दा से बचने के लिए सीता जी का त्याग कर दिया, जिस कारण से उन्होंने वाल्मीकि आश्रम में शरण ली।वहाँ उन्होंने दो सुंदर पुत्रों को जन्म दिया।महर्षि वाल्मीकि ने दोनो पुत्रों का नाम लव और कुश रखा तथा उन्हें शस्त्र और शास्त्रों की शिक्षा देकर दक्ष बनाया।साथ ही उन्हें रामायण भी कंठस्थ कराई।उन्हें इस बात का बहुत दु:ख था कि अयोध्यावासियों ने निर्दोष सीता जी के चरित्र पर व्यर्थ लांछन लगाया।इसलिए अयोध्या-वासियों को उनके द्वारा किए गए इस अपराध का बोध कराने के लिए एक बार वे अपनी समस्त शिष्य-मंडली के साथ अयोध्या गए। वहाँ उन्होंने सरयू के किनारे डेरा ड़ाला।जहाँ उन्होंने बहुत बड़ा मंच बनवाया और समस्त अयोध्यावासियों को नाटक देखने का आमंत्रण दिया।सारे अयोध्यावासी नाटक देखने वहाँ पहुँचे।उस नाटक में उनके शिष्यों ने रामलीला का मंचन किया।उस नाटक में विशेषकर माता सीता द्वारा लंका में बिताए दु:खपूर्ण दिनों,रावण वध के बाद ली गई उनकी अग्नि-परीक्षा का वर्णन था। जिसमें वहाँ आकर अग्निदेव सहित सम्पूर्ण देवताओं ने उनकी पवित्रता को प्रमाणित किया था।यह भी बताया गया कि इसके उपरांत भी अयोध्या ने नगर वासियों द्वारा उनके चरित्र पर लांछन लगाने का पाप किया गया।जिसके कारण सर्वथा निर्दोष होते हुए भी एक महारानी को किस प्रकार वनवास में कठिन जीवन बिताना पड़ रहा है,आदि मार्मिक प्रसंगों का मंचन किया गया।इसे देखकर अयोध्यावासियों को अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ।जिसके बाद उन्होंने निर्दोष सीता जी को वापस लाने के लिए अपने राजा राम से प्रार्थना की।
आज हम रामलीला का जो स्वरूप देखते हैं,एक जनश्रुति के अनुसार इसके प्रतिष्ठापक गोस्वामी तुलसीदास हैं।इन्होंने हिंदी में जनकल्याणकारी नाटकों का अभाव पाकर रामलीला शुरू कराई।इनकी प्रेरणा से अयोध्या और काशी के तुलसीघाट पर प्रथम बार रामलीला हुई थी।इनका प्रमुख आधार रामचरित मानस था।
किन्तु, रामलीला के विधिवत आयोजन का जो प्रामाणिक विवरण प्राप्त होता है,उसके अनुसार ईसवीं वर्ष 1783 में रामनगर में रामलीला की शुरुआत काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने की थी। तब से यह रामलीला आज भी उसी अंदाज़ में होती है। यही अंदाज़ इस रामलीला को अन्य रामलीला से अलग करता है। पूरा मंचन रामचरितमानस के आधार पर अवधी भाषा में होता है।खासबात यह है कि 233 साल पुरानी यह रामलीला आज भी पेट्रोमेक्स और मशाल की रोशनी में ही होती है। लीला देखने हजारों की भीड़ जुटती है फिर भी किसी माइक का इस्तेमाल नहीं होता। बीच-बीच में ख़ास घटनाओं के वक़्त आतिशबाज़ी ज़रूर होती है।
यही नहीं, इस रामलीला की एक अौर खासियत है जो कहीं देखने को नहीं मिलती। यह रामलीला किसी एक मंच पर नहीं होती। करीब चार किलोमीटर के दायरे में एक दर्जन कच्चे-पक्के मंचों को इसका मंचन होता है। इन मंचों को ही अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और अशोकवाटिका का रूप दिया जाता है।
रामलीला की तैयारी, इसकी शुरुआत और निर्देशन का काम मुख्य रूप से दो लोग करते हैं। एक पर मुख्य किरदारों की ज़िम्मेदारी होती है, जबकि दूसरे पर बाक़ी पात्रों की। रामचरितमानस की चौपाइयों पर कुल 27 किरदारों के लिए रामलीला में 12-14 बच्चे हिस्सा लेते हैं। सावन से ही रामलीला की तैयारी शुरू हो जाती है और मुख्य लीला भादों में अनंत चतुर्दशी के दिन रावण के जन्म के साथ शुरू होकर आश्विन महीने की शुक्ल पूर्णिमा को ख़त्म होती है।यह लीला इकतीस दिनों तक चलती है।
रामलीला के दौरान परम्परा को निभाने के लिए रोज़ाना ‘काशी नरेश’ भी हाथी पर सवार होकर आते हैं और उनके आने के बाद ही रामलीला शुरू होती है। एक हाथ में पीढ़ा और दूसरे में रामचरितमानस की किताब लेकर यहां हर साल हज़ारों लोग रामलीला देखने आते हैं। पीढ़ा बैठने के लिए तो रामचरितमानस, लीला के दौरान पढ़ते रहने के लिए लाई जाती है। एक तरफ लोग रामचरितमानस की चौपाइयां पढ़ते रहते हैं, दूसरी तरफ रामलीला संवाद के साथ आगे बढ़ती रहती है।
कृष्णपक्ष चतुर्थी को द्वितीय गणेश पूजन के साथ ही इसकी औपचारिक शुरूआत हो जाती है।रामलीला सकुशल पूर्ण होने के लिए हुए गणेश पूजन में पांचों पात्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुध्न और सीता की पूजा की जाती है। साथ ही रामायण की पोथी, हनुमान जी का मुखौटा, गणेश जी की मूर्ति का पूजन भी होता है।किन्तु,इस वर्ष कोरोना के संक्रमण की वजह से यह 233 साल पुरानी परम्परा टूट गई और इस बार रामलीला नहीं कराने का निर्णय लिया गया है।
