आज का दिन उस राष्ट्रनायिका को स्मरण करने का है,जिन्होंने अपनी स्वतंत्रता और अस्मिता की रक्षा के लिए युद्ध के मैदान में लड़ते-लड़ते अपने प्राणों की आहुति दे दी थी,पर प्रबल शत्रु के सामने भी अपने हथियार नहीं डाले। जिनके शौर्य,साहस और पराक्रम को देखकर शत्रु सेना के होश उड़ गए थे।उन्हें तो कल्पना ही नहीं थी कि कोई महिला, सैनिक वेशभूषा मेें उन पर रणचंड़ी बन कर टूट पड़ेगी और जिसके सामने उन्हें अपनी जान के लाले पड़ जाएँगे।ये सब पढ़ कर आपको याद आ रही होगी,झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की,जो निश्चित ही इसी कोटि की वीरांगना थीं।पर आज हम याद कर रहे हैं रानी दुर्गावती की,जिन्होंने दो-दो बार विशाल मुगल सेना का सामना किया।वो सेना जिसे देखकर बड़े-बड़े राजपूत राजाओं के दिल काँप जाते थे और वे शरणागत हो जाते थे।पर रानी दुर्गावती अलग मिट्टी की बनी हुई थीं।झुकना और गुलामी उन्हें मंजूर नहीं थी।इसलिए दूसरी बार मुग़ल सेना के आक्रमण के दौरान आसन्न पराजय को देखते हुए युद्ध के मैदान में उन्होंने आत्मोत्सर्ग को उचित समझा।भारत की इन्हीं वीरांगना का आज दिन जन्मदिन है।
रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर,1524 को दुर्गाष्टमी के दिन महोबा में हुआ था।इसीलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया।रानी दुर्गावती सुन्दर, सुशील, विनम्र, योग्य एवं साहसी थी।रानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। दुर्गावती को बचपन से ही भला,तीर, तलवार,बर्छी, कटार के साथ युद्धाभ्यास करना और हाथी घोड़े की सवारी करना पसंद था। वह अक्सर अपने पिता के साथ शेरों के शिकार के लिए जंगल जाती रहती थी।इसलिए ऐसे ही साहसिक कारनामों में उनकी बहुत रूचि थी।नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुन्दरता के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी।जब वे विवाह लायक हुईं तब उनके पिता उनका विवाह किसी राजपूत राजकुमार से करना चाहते थे। पर दुर्गावती ने गौंड राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से विवाह करने को उत्सुक थीं,क्योंकि उसने उनके वीरता की कई कहानियाँ सुन रखी थी।दलपतशाह भी दुर्गावती से विवाह के इच्छुक थे।उन्होंने एक पत्र राजा कीर्तिसिंह को भेजा,जिसमें उन्होंने दुर्गावती के साथ विवाह की उत्सुकता जताई।जाति अलग होने के कारण कीर्तिसिंह ने दलपतशाह के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। पर उन्होंने एक शर्त रखी कि दलपत शाह यदि उन्हें युद्ध में हरा देंगे तो वे दुर्गावती का विवाह उनके साथ कर देंगे।वे सोच रहे थे कि उनकी इतनी बड़ी सेना को देखकर दलपत शाह हमला करने की हिम्मत नहीं कर पाएँगे और विवाह की नौबत ही नहीं आएगी।पर दलपतशाह ने कालिंजर पर चढ़ाई कर दी और अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए कीर्तिसिंह को हरा दिया।शर्त के मुताबिक राजा कीर्तिसिंह ने दुर्गावती का विवाह दलपत शाह के साथ करना पड़ा और दुर्गावती कालिंजर से विदा होकर “रानी दुर्गावती” बन गढ़मंड़ला आ गईं।
दुर्भाग्यवश विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया। उस समय दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय बालक वीरनारायण था।इसलिए रानी ने उसे गद्दी पर बिठा उसकी संरक्षिका के रूप में स्वयं ही गढ़मंडला का शासन संभाल लिया।वे सदैव प्रजा के दुःख – सुख का ध्यान रखती थी। चतुर और बुद्धिमान मंत्री आधार सिंह की सलाह और सहायता से रानी दुर्गावती ने अपने राज्य की सीमा बढ़ा ली। राज्य के साथ–साथ उसने सुसज्जित स्थायी सेना भी बनाई और अपनी वीरता, उदारता, चतुराई से राजनैतिक एकता स्थापित की। गोंडवाना राज्य शक्तिशाली और संपन्न राज्यों में गिना जाने लगा। इससे दुर्गावती की ख्याति फ़ैल गई।अबुल फज़ल आईना-ए-अकबरी में लिखता है कि रानी दुर्गावती के राज्य में इतनी सम्पन्नता थी कि लोग स्वर्णमुद्राओं और हाथी से कर चुकाते थे।रानी ने पंद्रह वर्ष तक शासन किया।
उन्होंने अनेक मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल,अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया।जो आज भी जबलपुर की शान है।
रानी दुर्गावती के इस सुखी और सम्पन्न राज्य पर मालवा के मुसलमान शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया, पर हर बार वह पराजित हुआ।जंग में जीत से रानी की वीरता का डंका चौतरफा बजने लगा।
रानी दुर्गावती की योग्यता एवं वीरता की प्रशंसा अकबर ने सुनी।वह गोंडवाना को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था। उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधारसिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा। रानी ने यह मांग ठुकरा दी। इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ़ ख़ाँ के नेतृत्व में गोंडवाना पर हमला करने भेजा,उसके निर्देश थे कि रानी दुर्गावती को जीवित पकड़ ही आगरा लाया जाए।आसफ़ खाँ को यह काम बहुत आसान लग रहा था। उसे नहीं मालूम था कि उसका सामना किस सिंहनी से होने जा रहा है।उसने रानी के पास समर्पण करने और आगरा चलने का प्रस्ताव भेजा,जिसे दुर्गावती ने तुरंत ठुकरा दिया।वजीर आधार सिंह ने बताया कि उनकी सेना के मुकाबले मुगल सेना बहुत बड़ी है।पर रानी ने मुकाबला करने की ठानी।उनका कहना था समर्पण करने से बेहतर मर जाना है।घनघोर युद्ध हुआ।इस बार आसफ़ ख़ाँ पराजित हुआ और लज्जित होकर आगरा पहुँच गया। पर दो साल बाद उसने दोगुनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास ‘नरई नाले’ के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया। इस युद्ध में 3,000 मुग़ल सैनिक मारे गये लेकिन रानी की भी अपार क्षति हुई थी। अगले दिन 24 जून,1564 को मुग़ल सेना ने फिर हमला बोला। आज रानी का पक्ष दुर्बल था, अतः रानी ने अपने पुत्र नारायण को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। तभी एक तीर उनकी भुजा में लगा, रानी ने उसे निकाल फेंका। दूसरे तीर ने उनकी आंख को बेध दिया, रानी ने इसे भी निकाला पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया। रानी ने अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे,पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ।अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं।इस प्रकार वीरांगना रानी दुर्गावती ने युद्ध में अपने साहस और बहादुरी के साथ अपने दुश्मनों का सामना करते हुए अपने प्राणों का त्याग कर दिया।
जबलपुर के जिस स्थान पर ये ऐतिहासिक युद्ध हुआ था उसका नाम बरेला है। वही रानी दुर्गावती की समाधि बनी हुई है। गोंड जनजाति के लोग जाकर श्रद्धासुमन अर्पित करते है।
फिल्मी दुनिया ने रानी लक्ष्मीबाई पर तो कई फिल्में बनाई है,पर आश्चर्य है कि रानी दुर्गावती के शौर्यपूर्ण व्यक्तित्व पर उनकी नजर नहीं पड़ी।जबकि रानी दुर्गावती के जीवन पर फिल्म बनाने की असीम संभावनाएँ हैं।संभवत: पहले एक टेली फिल्म बनी थी,पर कोई कथा फिल्म बनने की जानकारी नहीं है।यदि फिल्म/सीरियल बनाया जाए तो इस वीरांगना की कहानी घर-घर पहुंचेगी।
