7.5 सीता जी का त्याग

7.5 सीता जी का त्याग

अनेक पौराणिक नायिकाओं का जीवन बहुत कष्ट में बीता।जैसे-दमयंती,सावित्री, अहल्या,सीता आदि।निष्कलंक और निष्पाप सीता जी ने तो कभी सोचा भी नहीं था कि एक बार अग्नि में प्रवेश करने की भीषण परीक्षा से गुजर जाने और अग्निदेव एवं अन्य देवताओं के द्वारा प्रत्यक्ष आकर उनकी पवित्रता का साक्ष्य देने के बाद भी अयोध्या की प्रजा उन्हें दोषी समझेगी और उनके चरित्र पर लांछन लगाएगी।सीता जी के लिए महान शोक और कष्ट की बात तो यह भी थी उनके आराध्य,उनके प्राणप्रिय पति और उनके सर्वस्व ने लोकनिंदा से बचने के लिए सदा के लिए उनका सहसा त्याग कर दिया।लक्ष्मण ने उन्हें गंगा पार पहुँचा कर श्रीराम द्वारा उन्हें त्याग कर दिए जाने का निर्णय सुनाया,तब वे हतप्रभ रह गईं।दो घड़ी तक उन्हें होश ही नहीं आया।उनके नेत्रों से आँसुओं की अजस्त्र धार बहती रही।फिर होश में आने पर जनक किशोरी ने दीनवाणी में कहा–हे लक्ष्मण! निश्चय ही विधाता ने मेरे शरीर को दु:ख भोगने के लिए ही रचा है।इसलिए आज सारे दु:ख मूर्तिमान होकर मेरे सामने खड़े हैं।

“मामिकेयं तनुर्नूनं सृष्टा दु:खाय लक्ष्मण।

धात्रा यस्यास्तथा मेअ्द्य दु:ख मूर्ति: प्रद्दश्यते।।”

नहीं मालूम,पूर्वजन्म में मैंने क्या पाप किया था अथवा किसी स्त्री का उसके पति से वियोग करवाया था,जिसके कारण मेरे शुद्ध चरित्रा और पतिव्रता होने पर भी मेरे पति ने मेरा त्याग किया।

सीता-त्याग की यह करुण कथा वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में है।हालांकि इस कांड को विशेषज्ञ बाद में जोड़ा हुआ मानते हैं।इसमें ‘लोकोपवाद’ को विशेषकारण माना गया है।कथा के अनुसार गर्भवती सीता किसी दिन राम के सामने तपोवन देखने की इच्छा प्रकट करती हैं।उनको अगले दिन भेज देने की प्रतिज्ञा करके राम अपने मित्रों के साथ बैठकर परिहास की कहानियाँ सुनते हैं—कथा बहुविधा: परिहाससमन्विता:। संयोगवश राम ‘भद्र’ से पूछ बैठते हैं कि उनके,सीता और भरत के बारे में लोग क्या कहते हैं।तब भद्र(जिसे अन्य रामकथाओं में अन्य नाम भी दिया गया है) सीता के कारण हो रहे लोकोपवाद और जनता पर पड़ने वाले कुप्रभाव का उल्लेख करता है।लोग कहते हैं- ‘हमको भी अपनी स्त्रियों का ऐसा आचरण सहना होगा’:

‘अस्माकमपि दारेषु सहनीयं भविष्यति।

यथा हे कुरुते राजा प्रजास्तमनुवर्तते।।’

यह सुनकर राम लक्ष्मण को बुलाते हैं और सीता को गंगा के उस पार छोड़ देने का आदेश देते हैं।तपोवन दिखलाने के बहाने लक्ष्मण सीता को रथ पर ले जाते हैं और वाल्मीकि आश्रम के समीप छोड़ देते हैं।इससे मिलती-जुलती कथा उत्तररामचरित,कुन्दमाला,दशावतार चरित,अध्यात्म रामायण,आनंद रामायण आदि में भी आती है।

जैनी रामकथा विमलसूरिकृत पउमचरियं,रविषेण के पद्मचरित,हेमचंद्र कृत योगशास्त्र में सीतात्याग की कथा का भिन्न रूप है।

एक बहुत जानी-पहचानी कथा धोबी वृतान्त की है।जिसमें एक धोबी बिना उसकी अनुमति के बाहर रात बिताने वाली अपनी पत्नी को घर से बाहर निकालते हुए कहता है कि मैं राम नहीं हूँ,जिन्होंने रावण के यहाँ रही हुई अपनी पत्नी को वापस ग्रहण कर लिया।इस कथा के अनुसार ‘एक दिन अपने नगर में गुप्तवेष में घूमते हुए राजा ने देखा कि एक पुरुष अपनी स्त्री को हाथ पकड़ कर घर से निकाल रहा है और यह दोष दे रहा है कि तू दूसरे के घर गई थी।इस पर स्त्री कहती है–राम ने सीता को राक्षस के घर पर रहने के बाद भी नहीं छोड़ा; यह मेरा पति राम से बढ़कर है,क्योंकि यह मुझे बंधुगृह जाने पर ही अपने घर से निकाल रहा है।यह सुनकर राम को बहुत दु:ख हुआ और उन्होंने लोकोपवाद के भय से गर्भवती सीता को वन में छोड़ दिया।’ बाद में जिस पुरुष ने अपनी पत्नी को घर से निकाला था,उसे धोबी मान लिया गया। यह कथा गुणाढ्य कृत वृहत्कथा और सोमदेवकृत कथासरित्सागर में प्रकारांतर से दी गई है।बाद में यह कथा प्रचलित हो गई और कई रामकथाओं में इसने स्थान पा लिया।

एक अन्य कथा सीता द्वारा ‘रावण के चित्र’ के निर्माण से संबंधित है,जिसके कारण संदेहवश राम ने सीता का त्याग किया था।इनका उल्लेख जैन रामकथाओं में हुआ है।इसके अनुसार सखियों ने सीता जी से आग्रह किया कि रावण कैसा दीखता था,वे उसका चित्र बनाकर बताएँ।तब सीता कहती हैं कि मैंने उसके पैरों के अलावा कुछ देखा ही नहीं था।फिर भी वह उनके अनुरोध पर रावण के पैरों का चित्र बना देती हैं।सीता से जलन रखने वाली कोई सखि उसके आधार पर रावण का पूरा चित्र बना देती है,जो राम देख लेते हैं।कृत्तिवास रामायण के अनुसार सखियों की जिज्ञासा पर सीता जी ने फर्श पर रावण का चित्र बना दिया था और थककर उसी चित्र के पास सो गई थीं।राम के आने पर सहेलियाँ वहाँ से चली गईं और राम ने सीता को चित्र के पास सोता हुआ देख लिया, जिससे उनके मन में संदेह पैदा हो गया, जो सीतात्याग का कारण बना।सेरीराम के अनुसार कीकवी देवी भरत शत्रुघ्न की सहोदरी है।सीता ने किसी दिन कीकवी देवी के अनुरोध को मानकर एक पंखे पर रावण का चित्र बना दिया।बाद में कीकवी देवी ने सोती हुई सीता की छाती पर रख दिया और यह आरोप लगाया कि सोने के पूर्व उन्होंने चित्र का चुम्बन भी लिया था।राम ने कीकवी देवी पर विश्वास कर सीता को अपने घर से निकाल दिया और सीता परिचरों के साथ महीरसी कली के यहाँ चली गई।रवाना होने के पहले सीता ने परमात्मा से प्रार्थना की मेरे सतीत्व के प्रमाण स्वरूप कीकवी देवी गूंगी बन जाए और सभी पक्षी मौन रहें।परमात्मा ने उनकी प्रार्थना सुन ली जिससे कीकवी देवी बारह वर्ष तक गूंगी ही बनी रही।

इनके अलावा भी सीता-त्याग के कई परोक्ष कारणों का उल्लेख विभिन्न ग्रंथों में मिलता है।जैसे भृगु ऋषि द्वारा विष्णु को शाप,तारा द्वारा राम को दिया गया शाप,आदि।सीता त्याग के बाद लक्ष्मण को धैर्य बंधाते हुए सुमंत्र दुर्वासा और दशरथ के संवाद के बारे में बताते हैं।दुर्वासा ने दशरथ से कहा था कि विष्णु ने भृगु पत्नी की हत्या की थी जिससे भृगु ने विष्णु को शाप दिया था कि तुम्हें भी मनुष्य बनकर पत्नी वियोग का दुख भोगना पड़ेगा।

“तस्मात्वं मानुषे लोके जनिष्यसि जनार्दन।

तत्र पत्नी वियोगं त्वं प्राप्स्यसे बहु वार्षिकम्।।”

वालि वध के बाद तारा ने भी राम से कहा था कि मेरे शाप के कारण तुम्हे सीता की संगति कम समय तक प्राप्त हो सकेगी।

तत्वसंग्रह रामायण में सीतात्याग के कारण के विषय में वाल्मीकि को दिए गए वरदान की कथा आती है।वाल्मीकि किसी समय क्षीरसागर के तट पर तपस्या करने गए थे।क्षीरसागर की लहरों के कारण वाल्मीकि जी को कष्ट हुआ।उन्होंने कहा –लक्ष्मी का जन्मदाता होने के कारण क्षीरसागर अभिमानी है।मैं भी तपस्या कर लक्ष्मी के पिता बनने का वरदान प्राप्त करूँगा।तब वाल्मीकि गंगा के किनारे तपस्या करने लगे।लक्ष्मी प्रकट हुईं और वाल्मीकि का निवेदन सुनकर उन्होंने कहा कि त्रेतायुग में विष्णु दशरथ के यहाँ जन्म लेंगे;उस समय मैं पृथ्वी से प्रकट होकर जनक की पुत्री बन जाऊँगी।अन्त में लोकोपवाद से लाभ उठाकर मैं पुत्री की तरह तुम्हारे आश्रम में शरण लेने आऊँगी।

बहुत से राम-कथाकारों का ऐसा भी मानना है कि ‘सीता-त्याग’ जैसी घटना कभी घटित ही नहीं हुई।वाल्मीकिकृत आदि-रामायण में रामकथा राम के राज्याभिषेक और उनके सुखद राज्य के संक्षिप्त वर्णन के साथ समाप्त होती है और इसमें सीतात्याग का उल्लेख नहीं था।महाभारत के रामोपाख्यान में भी सीतात्याग का कोई वर्णन नहीं है।प्राचीन पुराणों में जहाँ राम कथा मिलती है,सीतात्याग का कहीं कोई हवाला नहीं है।इनमें हरिवंश पुराण,वायुपुराण और नृसिंहपुराण शामिल हैं।

बौद्ध ‘अनामक जातक’ में भी सीतात्याग का वर्णन नहीं किया गया है।गुणभद्रकृत उत्तरपुराण में लंका से अयोध्या लौटने के बाद सीता के आठ पुत्र उत्पन्न होते हैं और इसमें सीतात्याग का जिक्र नहीं मिलता।

रामचरित मानस में वाल्मीकिकृत आदिरामायण का अनुसरण किया गया और उसमें सीतात्याग जैसी किसी घटना का उल्लेख नहीं है।वैसे भी महाकवि तुलसीदास जब माता सीता के बारे में भावविभोर होकर लिखते हैं:

‘जनकसुता जगजननी जानकी।

अतिसय प्रिय करुना निधान की।।

तब वे श्रीराम की अतिशय प्रिय,प्राणवल्लभा माता सीता के त्याग के बारे में सोच भी कैसे सकते थे।

यह तो निश्चित तौर पर कोई भी नहीं बता सकता है कि सीता जी के त्याग की कोई घटना कभी हुई भी थी या नहीं।किन्तु,उसकी आड में महिलाओं को प्रताड़ित करने का सिलसिला आज तक भी जारी है।

No photo description available.
Back To Top