राक्षसराज रावण आज कई दिनों के बाद अपने राज-सभा में आकर बैठे हैं।यह एक विशाल सभा-गृह है,जिसके निर्माण में स्वर्ण और मणि-माणिक्य का प्रचुरता से उपयोग किया गया है।इसके दीवालों और स्तंभों पर आकर्षक चित्रांकन किया गया है।राक्षसराज आज किसी गंभीर विषय पर नगर-वासियों से विमर्ष करना चाहते हैं।इसलिए सारे नगर में राजसभा में पहुँचने की मुनादी करवा दी गई है।लोग रथों,अश्वों,हाथियों पर बैठ कर या पैदल ही चले आ रहे हैं।राजसभा में आकर लोग रावण के चरणों में शीश नवाकर अपने-अपने स्थानों पर शाँति से बैठ रहे हैं।राक्षसराज के चारों ओर उनके अँग-रक्षक विविध आयुधों के साथ सन्नध हैं।इतनी भीड़ होने के उपरांत भी पूरी तरह से शाँति है।कोई आपस में बात नहीं कर रहा है।सबके मन में यह जानने की उत्सुकता है कि महाराज आज न जाने क्या कहने वाले हैं।इन्द्रजित,विभीषण, कुम्भकर्ण जैसे महारथी भी अपने-अपने स्थानों पर आकर बैठ गए हैं।राक्षसराज मणि-माणिक्य से शोभित एक ऊँचे सिंहासन पर विराजमान हैं,जिसकी शोभा अद्वितीय है।
अपनी राजसभा को भरी हुई देखकर राक्षसेश्वर ने कहना शुरू किया–भाईयों,विपत्ति में, प्रिय-अप्रिय में, सुख-दु:ख, हानि-लाभ,हित-अहित और धर्मार्थ सभी बातों में आज तक आप लोगों ने मेरा साथ दिया है।आप आपस में परामर्ष कर और एकमत होकर जो काम करते हो,वह कभी निष्फल नहीं होता।क्योंकि मैं भी कई काम आप लोगों की सम्मति से पूरा कर चुका हूँ।मैं सब प्रकार के कामों को आप लोगों को सूचित कर देना चाहता था।परन्तु,अपने भाई कुम्भकर्ण की निद्रा के कारण मैं आप के सामने प्रकट करने का अवसर न पा सका।यह महाबली छ: माह बाद आज सोकर जागा है।वह बात जो मैं आप लोगों के सामने प्रकट करना चाहता था,वह यह है कि मैं जनक की प्यारी पुत्री और राम की भार्या सीता को मैं जनस्थान से ले लाया हूँ।अपने पति राम की प्रतीक्षा करने के लिए उसने एक वर्ष का समय मांगा है। मुझे यह बात समझ नहीं आती है कि वे सब वानर और दोनों राजपुत्र इस जलजीवों से परिपूर्ण दुस्तर सागर को किस तरह से पार करेेंगे।साथ ही यह विचार उत्पन्न होता है कि जब एक ही वानर ने मेरा इतना बड़ा अपमान और मेरी सेना का इतना नाश कर दिया।तब वे आगे क्या करेंगे,यह समझ पाना मुश्किल है।
यद्यपि,हम लोगों को मनुष्य से डर नहीं है,तथापि विचार करना उचित है।मैंने पहले भी देवासुर संग्राम में आप लोगों की सहायता से ही विजय पाई थी।इसलिए उपस्थित कार्य में आप लोग मेरी सहायता करें।यह समाचार भी मिला है कि सुग्रीव आदि वानर और वे दोनों राजकुमार समुद्र के उस पार आ पहुँचे हैं।वे सीता के यहाँ होने का समाचार पाकर ही यहाँ आए हैं।हमें कोई ऐसा उपाय सोचना है ताकि सीता न देना पड़े और वे दोनों राजकुमार भी मारे जाएँ। इस बारे में आप लोग विचार कर लें और भली प्रकार से तय कर मुझे बतलाएँ।मैं आप लोगों का मत जानना चाहता हूँ।
कामासक्त रावण की बात सुन कर कुम्भकर्ण को बड़ा क्रोध आया।वह बोला–हे राजन,जब आप राम-लक्ष्मण के पास से सीता को बरजोरी हर लाए थे,क्या तब आपने विचार किया था कि इसका परिणाम क्या होगा?क्या तब आपने हम लोगों की राय ली थी?यदि नहीं तो अब हम लोगों की सम्मति का अर्थ ही क्या है,जब कर्म-विपाक का समय आ गया है।हे महाराज, आपने ये सब काम अनुचित किए हैं।करने के पूर्व हम लोगों से सलाह लेना थी।हे दशानन,जो राजा विचारपूर्वक काम करता है,उसे पीछे संताप नहीं होता है।जो बुद्धि से मोहित राजा पहले करने वाले काम को बाद में और बाद में करने योग्य काम को पहले करता है,वह नीति-अनीति कुछ नहीं जानता।तुमने बिना विचारे यह बड़ा काम छेड़ दिया है।बहुत सौभाग्य की बात है कि राम ने अभी तक तुम्हें मार नहीं डाला।हे रावण,अब जब आपने इस अनुचित काम को करके राम से शत्रुता कर ही ली है,तब मैं तुम्हारे शत्रुओं को मार कर,इसे ठीक करूँगा।
कुम्भकर्ण की बातों को सुनकर रावण को बड़ा क्रोध आया।पर वह शांत रह गया।तब महापार्श्व बोला-हे महाबली,आप स्वयं सबके नियंता हो,आपका नियंता कौन हो सकता है।आप तो अपने शत्रुओं के सिर पर पैर रखकर वैदेही के संग विहार करो।तब रावण बोला- मैं ऐसा कर तो सकता था,किन्तु ब्रह्माजी ने मुझे शाप दिया था कि यदि मैंने किसी अनइच्छुक स्त्री के साथ जबरदस्ती की तो मेरे सिर के सौ टुकड़े हो जाएँगे।इस शाप के भय से मैं सीता को बरजोरी अपनी उत्तम सेज पर चढ़ाने का प्रयत्न नहीं करता।
राक्षराज की डींगें और कुम्भकर्ण की निरर्थक बातें सुनकर, विभीषण से नहीं रहा गया और वह रावण से बोधयुक्त वचन बोला–हे रावण,इस कुल के विनाश का कारण सीता को आप यहाँ क्यों ले आए।अभी समय है,अभी भी आप सीता को राम को सौंप कर इस कुल को विनाश से बचा सकते हैं।हे राजन, कुम्भकर्ण, इन्द्रजित, महापार्श्व, महोदर, कुम्भ,निकुंभ,अौर अतिकाय में से कोई भी राम के सामने नहीं खड़ा रह सकता।आप चाहो कि हम जीतेजी राम से बच जाएँ,यह नहीं होने का।आप को सूर्य और देवता भी बचाना चाहें तो भी आप नहीं बच सकते।इसलिए इस लंकापुरी के,राक्षसों के,आप के और हितैषियों के हित में मैं भली-भाँति विचार कर यह सम्मति देता हूँ कि राक्षसराज,श्रीराम को सीता को दे डालें।
बुद्धिमान और विवेकवान विभीषण की बातें सुनकर मेघनाथ भड़क गया और बोला–हे काका,तुम भीरु जनों जैसी अनर्थ करने वाली बातें क्या कर रहे हो और सभा को संबोधित करते हुए बोला–देखो महानुभावों,मेरे पिता के छोटे भाई यह अकेले विभीषण इस वंश में ऐसे उपजे हैं,जो बल,पराक्रम,शौर्य,धैर्य और तेज से हीन हैं।अरे डरपोक विभीषण,उन दो राजपुत्रों की मजाल ही क्या है।उन दोनों को तो हमारे यहाँ का एक मामूली राक्षस ही मार सकता है।तुम इतना क्यों डरा रहे हो।अरे,जो तीनों लोकों का नाथ इन्द्र है,उसे तो मैं पकड़कर यहाँ ले आया था।क्या तुम्हें याद नहीं कि सारे देवता मेरे डर के मारे यहाँ-वहाँ भाग रहे थे।
इन्द्रजित के ऐसे गर्व भरे और अपमानित करने वाले वचन सुनकर विभीषण को भी क्रोध हो आया।फिर भी उन्होंने महाअर्थ युक्त ये वचन कहे–हे बेटा,तुम करने-अकरने योग्य कामों का विचार करने में अत्यंत अयोग्य हो।क्योंकि तुम्हारी अभी बालक जैसी बुद्धि है।इसी से तुम अपना सत्यानाश करने वाली बातें कर रहे हो।तुम रावण के पुत्र अवश्य हो,पर तुम राक्षसराज के मित्ररूपी शत्रु हो।क्योंकि, राक्षसराज को घोर विपत्ति में फंसा हुआ देखकर तुम रोकते नहीं।तुम बड़े कुबुद्धि,अविवेकी, ढ़ीट,क्रूर हो और बालकों जैसी बातें करते हो।जिसे सभा से तुरंत उठा देना चाहिए।फिर रावण की ओर उन्मुख होकर बोले-हे राजन,धन,रत्न,बढ़िया वस्त्र,आभूषण और रंग-बिरंगी मणियों सहित सीता राम को दे डालो,जिससे हम लोग इस पुरी में आनंद सहित रह सकें।
विभीषण के विवेक और नीतियुक्त वचन सुनकर रावण क्रोध में बोला–भले ही कोई शत्रु के साथ अथवा जहरीले सांप के साथ रह ले,किन्तु,शत्रु के पक्षपाती मित्ररूपी शत्रु के साथ कदापि न रहे।जाति वाले बड़े निर्दयी होते हैं।क्योंकि नित्य भले ही हर्षित होकर रहें।पर विपत्ति पड़ने पर वो आततायी हो जाते हैं।मैंने शत्रुओं को पराजित कर अतुलित यश प्राप्त किया है,सो मैं जान गया कि मेरा यह सौभाग्य तुझे अच्छा नहीं लगता।हे विभीषण, तू मेरा भाई है,इसलिए मैं तुझे छोड़ रहा हूँ।यदि कोई और होता तो मैं उसका वध यहीं करवा देता।
विभीषण समझ गया कि अब उसका यहाँ बना रहना सुरक्षित नहीं है,इसलिए वह अपने चार साथियों के साथ आकाश में चला गया और वहाँ से बोला हे भाई,मैंनें तो सारी बातें आपके हित की ही कहीं है।किंतु,लगता है आप सबके सिर पर काल नाच रहा है,इसलिए आप लोगों को मेरी बातें अच्छी नहीं लगी।फिर मैं आप को पिता तुल्य मानता हूँ और प्रणाम करके राम के शरण में जाता हूँ,ताकि लंका कम से कम सम्पूर्ण विनाश से तो बच ही जाए।
