पुराणों में शायद ही कोई ऐसी कथा होगी,जिसमें नारद जी का उल्लेख न हो।ब्रह्माजी के मानस पुत्र देवर्षि नारद अद्भुत व्यक्ति थे।वे त्रिकालदर्शी, वेदों के ज्ञाता,समस्त शास्त्रों के मर्मज्ञ, परम तेजस्वी और सभी विद्याओं में निपुण थे।देव-दानव सभी उनका सम्मान करते थे और सभी लोकों में उनकी गति थी।रामकथा के संदर्भ में तो ऐसा लगता है,जैसे वे इसके सूत्रधार रहे हों।वाल्मीकि रामायण के बालकांड के अनुसार नारद ने ही आदिकवि वाल्मीकी को रामकथा का सार सुनाया।बाद में ब्रह्मा जी के आदेश पर इस रामकथा को श्लोकबद्ध कर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की।
कुछ रामकथाओं में रामजन्म के जो दो-तीन कारण मिलते हैं,उनमें एक नारद द्वारा विष्णु को शाप देना भी शामिल है।महाभागवत पुराण संभवत:वह प्राचीनतम रचना है,जिसमें नारद का शाप सूर्यवंश में विष्णु के जन्म और सीता-हरण का कारण माना गया है।शिवमहापुराण और रामचरित मानस की कथा मिलती-जुलती है।अम्बरीश की पुत्री श्रीमती को प्राप्त करने के लिए नारद ने विष्णु के पास जाकर हरिरूप मांगा।विष्णु नेे उन्हें हरि अर्थात् वानर का मुख देकर स्वयं श्रीमती के स्वयंवर में जाकर उसे प्राप्त किया।उस स्वयंवर में दो शिवगणों ने नारद का उपहास किया और नारद के शाप के कारण वे रावण और कुंभकर्ण बन गए।नारद ने विष्णु को भी यह शाप दिया कि तुम मनुष्य बनकर वानरों के साथ पत्नी विरह का दुख भोगो।रामचरित मानस में अम्बरीष की पुत्री श्रीमती के स्थान पर सीलनिधि की पुत्री विश्वमोहिनी का उल्लेख किया गया है।
अन्य रामकथाओं में नारद के हस्तक्षेप का बार-बार उल्लेख मिलता है।बाल रामायण के अनुसार नारद राम और रावण के बीच संघर्ष उत्पन्न करने के उद्देश्य से पृथ्वी पर उतरते हैं।अयोध्या में पहुंचकर राम को अवतार के उद्देश्य का स्मरण दिलाकर उनसे अनुरोध करते हैं कि वह राज्याभिषेक अस्वीकार करें।अध्यात्म रामायण में भी नारद राम से ऐसा ही अनुरोध करते हैं,ताकि राम के अवतार लेने के उद्देश्य की पूर्ति हो सके।वाल्मीकि रामायण में इन्द्रपुत्र जयंत को भी नारद प्राण रक्षा के लिए राम के शरण में जाने का सुझाव तब देते हैं जब उसने काकरूप में मांस के लोभ में माता सीता के स्तनों पर आधात किया।राम ने यह देखकर ब्रह्मास्त्र पर दर्भ रखकर उसे काक पर चलाया।कहीं भी शरण न पाकर नारद के सुझाव से काक राम के पास लौटा और एक आँख ब्रह्मास्त्र को देकर बच गया।आध्यात्म रामायण में काक ने सीता के पैर के अँगूठे को फाड़ डाला था (मत्पादांगुष्ठमारक्तं विददारामिषाशया)।आनंद रामायण,रामगीतगोविंद और रामचरित मानस में भी ऐसा ही वर्णन है।
बलरामदास रामायण के अनुसार नारद ने ही सीता को मायारूप छोड़कर अग्नि में प्रवेश करने की शिक्षा दी थी,जिसके कारण सीताहरण के पूर्व लक्ष्मण जी के चले जाने के बाद सीता ने वैसा ही किया।अग्निपरीक्षा के समय वास्तविक सीता फिर प्रकट हुईं।रामचरित मानस के अनुसार नारद पंपा सरोवर के तट पर विरही राम से भेंट करने जाते हैं। देवीभागवत के अनुसार नारद ने बालिवध के बाद राम के पास आकर कहा कि रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए नवरात्रोपवास करना चाहिए।राम के इस उपवास के अंत में सिंहासनरूढ़ा देवी भगवती राम को दर्शन देकर रावण पर विजय का आश्वासन देती हैं।काश्मीरी रामायण में उल्लेखित है कि लंका में रावण की खोज करते हुए हनुमान नारद से मिलते हैं और नारद हनुमान को लंका की सृष्टि और रावणवंश की कथा सुनाते हैं।अध्यात्म रामायण के अनुसार नारद कुंभकर्ण वध के बाद राम की प्रशंसा करते हैं और रावण वध के बाद उसका जीव ज्योति के रूप में राम के शरीर में प्रवेश करता है; देवताओं के आश्चर्य करने पर नारद उन्हें समझाते हैं कि रावण ने द्वेषभाव से ही सही,निरंतर राम का स्मरण किया था,इस कारण उसने मुक्ति प्राप्त की।
तुलसीदास ने नारद को आदर्श रामभक्त के रूप में चित्रित किया है।रामचरित मानस के उत्तरकांड में लिखा है कि नारद अयोध्या आया करते थे और वहाँ नए-नए चरित्र देखकर ब्रह्मलोक में उनका गुणगान करते थे:
बारबार नारद मुनि आवहिं।
चरित पुनीत राम के गावंहि।।
नित नव चरित देखि मुनि जाहीं।
ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं।।
तुलसी ने एक अन्य स्थल पर नारद की राम-स्तुति उद्धृत की है।राम के नागपाश में बंधने पर नारद ने ही गरुड़ को लंका भेजा था और बाद में मोहग्रस्त गरुड़ को ब्रह्मा के पास जाने का आदेश दिया था।
इस तरह नारद जी रामकथाओं में पग-पग पर उपस्थित हैं।क्या आज भी जगत में नारदजी का फेरा होता रहता है?औरों का तो पता नहीं,किन्तु, हमारी माताजी को तो इसका पक्का भरोसा था।वे हम लोगों से हमेशा कहतीं सबका भला चाहो।क्या पता कब नारदजी का फेरा हो जाए और वे तुम्हारी मन की बात जानकर ‘तथास्तु’ बोल दें और सबका भला होने लगे।यह भी हो सकता है, हम बच्चों के मन में अच्छे संस्कार डालने का उनका यह अपना तरीका रहा हो।

