श्रीराम ने अपने वनवास के चौदह वर्ष का कितना समय कहाँ बिताया,इस बारे में अनेक मत हैं।किन्तु,इतना तय है कि उन्होंने अपने दस वर्ष दंडकारण्य के पंचाप्सर के समीप रहने वाले ऋषि-मुनियों के आश्रमों में बिता कर उन्हें राक्षसों के त्रास से मुक्ति दिलाई थी।
“रमताश्र्चानुकूल्येन ययु: संवत्सरा दश।
परिवृत्य च धर्मज्ञों राधव: सह सीतया।।
किंतु,पंचाप्सर से पंचवटी में आने के बाद उनका संकट भरा समय शुरू हो गया। शूर्पणखा का विरूपण और युद्ध के लिए आए चौदह हजार राक्षसों की सेना सहित खर,दूषण एवं त्रिशिर का वध तथा सीता-हरण जैसी घटना पंचवटी में ही घटीं।
सीता-हरण जैसी युगान्तकारी घटना कैसे घटी?इसका कोई एक उत्तर देना कठिन है।क्योंकि विभिन्न रामकथाएँ इसे अलग-अलग तरह से होना बताती हैं।फिर भी वाल्मीकि रामायण के विवरण को अधिक प्रामाणिक माना जा सकता है।
जिसके अनुसार–सीता आश्रम के दरवाजे पर राम की राह देखती हुई चिंतित बैठी हैं।सोच रही हैं कि बहुत समय बीत गया पर राम अभी तक लौटे नहीं।न जाने क्या हो गया।’वे अभी आता हूँ’ कह कर कंचन मृग के पीछे गए थे।किंतु,बाद में ‘हे सीते,हे लक्ष्मण’ का आर्तनाद सुनाई दिया।तब मैंने कटु वचन कह कर लक्ष्मण को भी उनकी रक्षा करने के लिए भेज दिया।अब मैं अकेली बैठी हूँ और दोनों का भी पता नहीं।वे ऐसे ही विचारों में खोई हुई थीं कि तभी रावण साधु का वेष धारण कर वहाँ आ धमका। उस समय वह स्वच्छ गेरुआँ रंग के कपड़े पहने हुए था,उसके सिर पर चोटी थी,सिर पर छत्र लगाए और पैरों में खडाउ पहने हुए था।उसके वाम कंधे पर त्रिदंड और हाथ में कमण्डलु था।वह सीता को चकित सा देखता हुआ खड़ा रह गया।सीता को विश्वास दिलाने के लिए वह वेदमंत्र पढ़ने लगा।बाद में वह सीता की प्रशंसा करने लगा।रावण बोला- हे रुप्य कांचन के समान वर्ण वाली; हे सुुंदर फूलों की माला से सुशोभित, कमलिनी; हे शुभानने; क्या तुम विष्णु की पत्नी भूदेवी हो,अथवा कीर्ती हो,या कमला हो,अथवा कोई अप्सरा हो,अथवा स्वतंत्र विहार करने वाली कामदेव की पत्नी रति तो नहीं हो।इसके बाद उसने सीता के सौंदर्य का नख से शिख तक वर्णन किया और बोला इस महीतल पर मैंने तुम्हारी जैसी सुंदर स्त्री कहीं पर नहीं देखी।तुम्हारे रूप के समान न तो कोई देवता की स्त्री है,न कोई गंधर्वी या यक्षिणी अथवा कोई किन्नरी ही है।
सन्यासी का रूप धारण किए रावण को देख और उसे महात्मा जान,जानकी ने उसकी उपेक्षा करना उचित न समझा और उसका ब्राह्मणों जैसा सत्कार किया।सीता ने पहले उसे बैठने के लिए आसन दिया,फिर पैर धोने के लिए जल दिया,फिर फल आदि भोज्य पदार्थ देते हुए कहा कि से सिद्ध किए हुए पदार्थ हैं,आप इन्हें शांति से ग्रहण कीजिए।
तब रावण ने सीता से पूछा-हे सुंदरी; तुम इस घनघोर वन में अकेली क्यों आई हो,यहाँ चारों ओर हिंसक पशु और निर्दयी राक्षस घूमते रहते हैं।यहाँ तुम्हारा रहना उचित नहीं है।तुम्हें तो सुंदर महल में रहना चाहिए,जहाँ सेवा के लिए अनेक दास-दासियाँ हों,सुस्वादु और रुचिकर भोज्य पदार्थ हों,मनोरंजन के साधन हों,नित नए वस्त्राभूषण हों।
तब सीता ने साधु को अपने कुल-गोत्र की जानकारी देना उचित समझते हुए कहा कि- हे महात्मन,मैं राजा जनक की पुत्री और परम प्रतापी राजा दशरथ की पुत्रवधु सीता हूँ।मेरे यशस्वी और अतुलित बलशाली पति श्रीराम और उनके अनुज लक्ष्मण भी साथ में हैं।अभी वे वन में मृगया के लिए गए हैं और शीघ्र आने वाले हैं।आगे बताया कि क्यों और किस प्रकार उन्हें चौदह वर्ष के लिए वन में आना पड़ा।आपने जिन भोगों की बात की,बारह वर्ष तक ऐसे सुर-दुर्लभ भोग मैं अपने पति के साथ अयोध्या में भोग चुकी हूँ और अपने मनोरथों को पूरी कर चुकी हूँ।(उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूनां निवेशने।भुंजानान्मानुषां भोगान्सर्वकाम समृद्धिनी।।)अब हे साधु पुरुष आप बताओ कि आप कौन हैं, इस वन में कहाँ से आए हैं।तब रावण अपना परिचय देते हुए बताता है कि वह परम् प्रतापी, त्रैलोक्यविजयी,अतुलित बलशाली रावण है।उसकी राजधानी लंका में है,जो अत्यंत दुर्गम है और जहाँ पहुँचना देवताओं के लिए भी संभव नहीं है।जो सब प्रकार से सुरक्षित और सभी प्रकार के ऐश्वर्य और भोगों से सम्पन्न है।मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे पति के रूप में स्वीकार करो और मेरे साथ वहाँ चलो।इस पर सीता उसे बहुत धिक्कारती है और कहती है- हे दुष्ट,थोड़ी देर ठहर जा।मेरे प्रतापी पति राम अब आते ही होंगे।इस पर रावण अपने असली रूप में आ जाता है और रोती-बिलखती सीता को जबरन उठा ले जाता है।
अन्य रामकथाओं सीता हरण की घटना के अन्य रूप हैं। जैसे-महानाटक में राम और लक्ष्मण स्वर्णमृग का शिकार करने साथ-साथ चले जाते हैं।उदात्तराघव में लक्ष्मण स्वर्ण मृग को मारने चले जाते हैं और रावण कुलपति का रूप धारण कर राम और सीता के पास पहुँचता है और राम की निंदा करता है कि उन्होंने तरुण लक्ष्मण को अकेले भेज दिया है।उसी समय एक छद्मवेषी राक्षस आकर समाचार देता है कि स्वर्णमृग राक्षस में बदल कर लक्ष्मण को ले जा रहा है।इस पर राम सीता को कुलपति(रावण)की रक्षा में छोड़कर लक्ष्मण की सहायता करने जाते हैं।
भासकृत प्रतिमानाटक में एक बिल्कुल नया कथानक पाया जाता है।दशरथ के वार्षिक श्राद्ध के एक दिन पहले राम और सीता सोच रहे थे कि श्राद्ध कैसे योग्य रीति से मनाया जाए।इस पर रावण परिव्राजक का रूप धर कर आता है और अपना परिचय देकर कई शास्त्रों का उल्लेख करता है, राम श्राद्ध के विषय में जिज्ञासा प्रकट करते हैं।तब रावण कहता है कि हिमालय में रहने वाले कांचनपार्श्व मृग से पितृ विशेषरूप से तृप्त हो जाते हैं।उसी समय मारीच वैसा ही मृग बना दिखाई देता है।लक्ष्मण उस समय आश्रम के कुलपति का स्वागत करने गए थे।इसलिए सीता को रावण के पास छोड़कर राम मृग के पीछे चले जाते हैं।तब रावण अपना रूप धारण कर सीता को लंका ले जाता है।
बाद की बहुत सी रचनाओं लक्ष्मण प्रस्थान करने से पहले सीता की रक्षा के लिए कुटी के चारों ओर धनुष से अभिमंत्रित रेखा खींचते हैं।बाद में छद्मवेषी रावण के अनुरोध पर सीता उसे भोजन देने के लिए हाथ आगे बढ़ाती है और रावण उनको खींच लेता है।धर्मखंड और तत्वसंग्रह रामायण में सीता अपने कुशलक्षेम के विषय में चिंतित है किन्तु रावण हस्तरेखा देखकर उत्तर देने की बात कहता है।तदनुसार सीता रेखा के बाहर आती है और रावण उनका अपहरण कर लेता है।
सीताहरण के समय वास्तव में कौन सी घटना घटी थी,इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।किन्तु,यह तो तय है कि रावण ने सीता जी का हरण किया था।कुछ रामकथाओं का कहना है कि इसके पीछे रावण की यह अभिलाषा थी कि विष्णु रूपी राम के हाथों उसकी मृत्यु हो,ताकि वह मुक्ति प्राप्त कर सके। विष्णु के हाथों मारे जाने की इच्छा से ही रावण सीता का अपहरण करता है।’अपहृता सीता तत्वो मरणकांक्षया।’ रावण कुम्भकर्ण संवाद के अन्तर्गत रावण कहता है कि मैं विष्णु के हाथों मरकर मोक्ष पाना चाहता हूँ–‘निहतो गन्तुमिच्छामि तद्विष्णो: परम पदम्।’ शिवपुराण के अनुसार रावण ने पाताल में विष्णु से प्रार्थना की थी कि आपके हाथ से मेरी मृत्यु हो–‘त्वद्धस्ताद् भगवन् मृत्युर्ममास्तु।’ रामचरित मानस में भी रावण खर-दूषण के वध की बात सुनकर मन ही मन विचार करता है कि वे भी मेरे जैसे ही बलवान थे।उन्हें भगवान के सिवाय और कौन मार सकता है।यदि ईश्वर ने अवतार लिया है तो मैं हठपूर्वक उनसे बैर करूँगा और उनके हाथों मारा जाकर इस भवसागर से तर जाऊँगा—
सुर रंजन भंजन महि भारा।
जो भगवंत लीन्ह अवतारा।।
तो मैं जाइ बैरु हठि करऊँ।
प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।

