श्रीराम लंका से कब और कैसे लौटे थे,इस बारे में अलग-अलग कथाएँ हैं।वाल्मीकि रामायण की प्रचलित कथा के अनुसार राम विभीषण का आतिथ्य-सत्कार अस्वीकार कर उनसे अयोध्या की यात्रा का प्रबंध करने का अनुरोध करते हैं।विभीषण पुष्पक प्रस्तुत करता है।राम की अनुमति पाने पर सुग्रीव अपने वानरों और विभीषण अपने आमात्यों के साथ पुष्पक पर चढ़ते हैं।मार्ग में राम सीता को संबोधित करके लंका से अयोध्या तक की समस्त यात्रा का वर्णन करते हैं।भरद्वाज-आश्रम में पहुँचकर राम अयोध्या का समाचार प्राप्त कर लेते हैं और हनुमान को गुह और भरत के पास भेज देते हैं।हनुमान से राम के लंका विजय और वापसी की कथा सुन कर भरत अयोध्या सजाने का आदेश देते हैं।नगरवासी भरत के साथ नंदिग्राम में राम का स्वागत करते हैं।भरत राम को राज्य-भार सौंप देते हैं और राम का अभिषेक विधिवत सम्पन्न किया जाता है।
यह तो हुई एक जानी-पहचानी कथा,जिसका उल्लेख अन्य रामकथाओं में भी आता है।किन्तु,जैनी रामकथा पउमचरियं में कहानी कुछ और है।जिसके अनुसार राम और लक्ष्मण ने रावणवध के बाद लंका में प्रवेश कर वहाँ के राजमहल में छ: वर्ष बिताए थे।अन्त में नारद ने राम के पास आकर पुत्र-वियोग के कारण दुखी अपराजिता (कौशल्या)की दयनीय दशा का वर्णन किया,जिसके कारण राम लक्ष्मण ने अयोध्या यात्रा का निश्चय किया।जावा की रामकथा सेरीराम में भी राम बहुत समय तक लंका में निवास करते हैं,जहाँ संसार-भर के राजा राम को सम्मान देने आते हैं।भरत,शत्रुघ्न और राम की बहन किकेवी देवी भी लंका में राम से मिलने आते हैं जहाँ विभीषण के साथ किकेवीदेवी का विवाह सम्पन्न हो जाता है।बाद में महरीसी कली(महर्षि नारद) आकर सीता के जन्म का रहस्य प्रकट करते हैं और मन्दूदाकी(मंदोदरी) अपनी पुत्री सीता को पहचान लेती है।एक वर्ष तक रह कर राम अपने सभी भाईयों और विभीषण के साथ अयोध्या लौटते हैं।विभीषण अयोध्या से वापस आते समय एक रम्य पर्वत देखते हैं और राम के सामने आकर इसका गुणगान करते हैं।जिससे राम उस पर्वत पर दुर्यापुरी नामक नगर बसवा देते हैं और रावण के मंत्री को लंका में छोड़कर लंका के चुने हुए लोगों के साथ इस नई राजधानी को बसा लेते हैं।राम लक्ष्मण को युवराज,हनुमान को सेनापति और विभीषण को मंत्री नियुक्त कर और संसार भर से धन,कला और विज्ञान से सम्पन्न लोगों को बुलाकर न्यायपूर्वक राज्य करने लगते हैं।गुणभद्रकृत उत्तरपुराण के अनुसार राम की वापसी यात्रा दिग्विजय का रूप लेती है,जिससे वे चालीस वर्ष बाद अयोध्या पहुंच पाते हैं।
वाल्मीकि की आदि-रामायण में वापसी यात्रा के प्रसंग में पुष्पक का कोई उल्लेख नहीं था।लंका में राम ने विभीषण से अयोध्या के दुर्गम मार्गों का उल्लेख किया था–अयोध्या गच्छतो ह्येष पन्था परमदुर्गम:।लौटते में भरद्वाज आश्रम में भी राम ने मुनि से यह वरदान मांग लिया था कि अयोध्या के मार्ग में सभी वृक्ष अकाल में ही फलदार हों–अकाल फलिनो वृक्षा:।यदि वे पुष्पक में वायु मार्ग से जा रहे होते तो उन्हें स्थल-मार्ग में वृक्षों के फलदार होने की चिंता क्यों होती और वे मुनि से ऐसा वर क्यों मांगते।इसके अलावा हनुमान से समाचार प्राप्त करने के बाद जब अयोध्यावासी राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं,तब वानर सेना के गोमती नदी पार करने का और उनके द्वारा उडाई हुई घूल का उल्लेख किया गया है:
मन्ये वानरसेना सा नदीं तरति गोमतीम्।
रजोवर्ष समुद्भूतं पश्य सालवनं प्रति।।
इन उद्धरणों के आधार पर यह अनुमान किया जाता है कि आदि रामायण में राम, स्थल मार्ग से ही लंका से लौटे थे।महानाटक, रामकियेन, ब्रह्मचक्र, संथाली रामकथा आदि में भी राम और उनके साथी स्थल मार्ग से ही अयोध्या लौटते हैं।
