कहते हैं तादाद कम होने से कुछ नहीं घटता,अगर आप में ज़ज्बा और हौसला है तो आप बहुत कुछ कर गुजर सकते हैं।यह बात पारसी समुदाय पर पूरी तरह लागू होती है।
पारसी समुदाय के लोग जिस भी क्षेत्र में उतरे,वहाँ अपनी मेहनत,प्रतिभा और योग्यता के बल पर अलग पहचान बनाई। चाहे वह क्षेत्र उद्योग का हो,चाहे खेल का,चाहे फिल्म का हो चाहे विज्ञान और रक्षा का, हर जगह इस समुदाय के लोगों ने अपना नाम रौशन किया।
इस समुदाय के चमकते सितारों में देश के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले फिरोज शाह मेहता,दादा भाई नौरोजी,भीकाजी कामा,उद्योग जगत के टाटा,गोदरेज, वाडिया,खेल जगत के फारूख इंजिनीयर, रूसी मोदी, विजय मर्चेंट फिल्मी दुनिया के सोहराब मोदी,बोमन ईरानी,अरूणा ईरानी, अर्देशिर ईरानी,जान इब्राहिम,मेहर जेसिया,पर्सिस खम्बाता,जुबीन मेहता,फारूख बलसारा,प्रसिद्ध ज्योतिषी बेजान दारूवाला,देश के शीर्ष वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा, रक्षा क्षेत्र में जनरल सैम मानेकशा, आदि सेठना,फली होमी मेजर आदि हैं।
पर अब पारसी समुदाय के सामने अस्तित्व के संकट खड़ा हो गया है।पूरी दुनिया में केवल सवा लाख पारसी हैं।जिनमें से लगभग सत्तर हजार भारत में हैं,उनमें से भी पचपन हजार तो अकेले मुंबई में हैं।इस समुदाय में हर साल करीब सौ-ढ़ेड़ सौ बच्चे पैदा हो रहे हैं,जबकि दुनिया से बिदा लेने वाले पारसियों की संख्या सालाना चार-पाँच सौ है। इस समुदाय के सामने अब ये समस्या मुंह बाए खड़ी है कि घटती जनसंख्या के साथ साथ अपने धर्म और संस्कृति को कैसे बचाया जाए। मुम्बई में पारसी समुदाय के लिए पारसीआना नाम की पत्रिका के संपादक जहांगीर पटेल कहते हैं, “जनसंख्या के लिहाज से आप ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। ये कम होते होते एक दिन गायब ही हो जाएगी।”
उनकी संख्या घटने की एक वजह यह है भी कि ये किसी भी दूसरे धर्म के लोगों को अपने धर्म में शामिल नहीं करते।इस समुदाय में जन्म लेने वाला ही पारसी हो सकता है।यहाँ तक कि अगर पारसी समाज की लड़की किसी दूसरे धर्म में शादी कर लें तो उसे धर्म में रखा जा सकता है, लेकिन उनके पति और बच्चों को धर्म में शामिल नहीं किया जाता। ठीक इसी तरह लड़कों के साथ भी होता है। लड़का किसी दूसरे समुदाय में शादी करता है तो उसे और उसके बच्चों को धर्म से जुड़ने की छूट है, लेकिन उनकी पत्नी को नहीं।पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी अपना दर्द बयां करते हुए बताया था कि पारसी मंदिर में उनके पति और बच्चों को तो प्रवेश की तो अनुमति है,पर उन्हें नहीं।
पारसी धर्म की नींव पैगंबर जरथुस्त्र ने एक ईश्वरवाद का संदेश देते हुए डाली थी। प्राचीन फारस (आज का ईरान) जब पूर्वी यूरोप से मध्य एशिया तक फैला एक विशाल साम्राज्य था.जरथुस्त्र व उनके अनुयायियों के बारे में विस्तृत इतिहास ज्ञात नहीं है। इसका कारण यह है कि पहले सिकंदर की फौजों ने तथा बाद में अरब आक्रमणकारियों ने प्राचीन फारस का लगभग सारा धार्मिक एवं सांस्कृतिक साहित्य नष्ट कर डाला था। जैसा अधिकांश आक्रमणकारी करते आये हैं।आज हम इस इतिहास के बारे में जो कुछ भी जानते हैं, वह ईरान के पहाड़ों में उत्कीर्ण शिला लेखों तथा वाचिक परंपरा की बदौलत है।
करीब तेरह-चौदह सौ साल पहले जरथुस्त्र के अनुयायी ईरान से नावों में हजारों मील का सफर करके भारत के पश्चिमी किनारे पर उतरे। उनके आने की वजह यह थी कि अरबों ने वहां हमला कर उनपर इस्लाम आरोपित करना चाहा था। जिन लोगों ने अपना मजहब छोड़ना कबूल नहीं किया, वे ईरान छोड़कर भारत चले आए।यहाँ उनको संजान नाम के एक छोटे से गांव में पनाह मिली। संजान भारत के पश्चिमी किनारे पर मुंबई से करीब सौ मील की दूरी पर है। संजान के राजा जादव राणा ने इन्हें शरण दी। वे ईरान के पार्स इलाके से निकलकर आए थे, इसलिए यहां आने पर पारसी कहलाए।कहा जाता है इनको भारत आने पर जब राजा ने स्वागत में पीने के लिए दूध दिया था,उन्होंने उसमे चीनी मिलकर वापस कर दिया था।मतलब यह की हमें अवसर प्रदान कीजिये हम आपके समाज और संस्कृति में दूध में चीनी कर मिल जायेंगे और उसे मीठा कर देंगे।
भारत के सबसे छोटे समुदाय पारसी ने कभी खुद को अल्पसंख्यक नहीं महसूस किया। इसी मानसिकता ने उन्हें दूसरों के लिए रोल मॉडल के रूप में उभरने का मौका दिया।
पारसी विपरीत हालात में ईरान से भारत आए। उन्होंने अपनी संस्कृति संरक्षित रखी है। चाहे उद्योग हो, सेना हो, कानूनी पेशा हो, वास्तुकला हो या सिविल सेवाएं हो, हर जगह शीर्ष पर पहुंचने की क्षमता दिखाई है।
समाज के लोगों को एक सूत्र में पिरोए रखने के लिए कभी गलत राह नहीं पकड़ी। आज भी पारसी समाज बंधु अपने धर्म के प्रति पूर्ण आस्था रखते हैं। नववर्ष और अन्य पर्वों के अवसर पर लोग पारसी धर्मस्थलों में आकर पूजन करते हैं।
पारसी लोगों के अनुसार प्रौफेट जरस्थ्रु का जन्म दिवस 24 अगस्त को मनाया जाता है। नववर्ष पर खास कार्यक्रम नहीं हो पाते इस वजह से 24 अगस्त को पूजन और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता हैं। यह दिन भी उनके पर्वों में सबसे खास होता है। उनके नाम के कारण ही उन्हें जरस्थ्रुत्री कहा जाता है।
पारसियों के लिए यह दिन सबसे बड़ा होता है। इस अवसर पर समाज के सभी लोग पारसी धर्मस्थल में इकट्ठा होकर पूजन करते हैं। समाज में वैसे तो कई खास मौके होते हैं, जब सब आपस में मिलकर पूजन करने के साथ खुशियां भी बांटते हैं, लेकिन मुख्यतः तीन मौके साल में सबसे खास हैं। एक खौरदाद साल, प्रौफेट जरस्थ्रु का जन्मदिवस और तीसरा 31 मार्च। ईराक से कुछ सालों पहले आए अनुयायी 31 मार्च को भी नववर्ष मनाते हैं।
नववर्ष पारसी समुदाय में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। धर्म में इसे खौरदाद साल के नाम से जाना जाता है। पारसियों में एक वर्ष 360 दिन का और शेष पांच दिन गाथा के लिए होते हैं। गाथा यानी अपने पूर्वजों को याद करने का दिन। साल खत्म होने के ठीक पांच दिन पहले से इसे मनाया जाता है।
इन दिनों में समाज का हर व्यक्ति अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पूजन करता है। इसका भी एक खास तरीका है। रात साढ़े तीन बजे से खास पूजा-अर्चना होती है। धर्म के लोग चांदी या स्टील के पात्र में फूल रखकर अपने पूर्वजों को याद करते हैं।
पारसी समाज में अग्नि का भी विशेष महत्व है और इसकी खास पूजा भी की जाती है। नागपुर, मुंबई, दिल्ली और गुजरात के कई शहरों में आज भी कई सालों से अखण्ड अग्नि की ज्योति प्रज्लवित है और इसे बनाए रखने के लिए भी एक विशेष कमरा होता है, जिसमें पूर्व और पश्चिम दिशा में खिड़की, दक्षिण में दीवार होती है।
जरथुस्त्र संप्रदाय के लोग एक ईश्वर को मानते हैं जो ‘आहुरा माज्दा’ कहलाते हैं। ये लोग प्राचीन पैगंबर जरथुस्त्र की शिक्षाओं को मानते हैं। पारसी लोग आग को ईश्वर की शुद्धता का प्रतीक मानते हैं और इसीलिए आग की पूजा करते हैं। वे ईरान, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बहुत से देशों में फैले हुए हैं।कई लोग भ्रमवश इन्हें मुस्लिम मानते हैं,जबकि ऐसा है नहीं,पारसी उनसे अलग हैं।
