चुनाव भले आदमी का

चुनाव भले आदमी का

अभी-अभी बिहार में चुनाव हुए हैं जिनके नतीजे भी आ गए हैं। पर कोई भरोसे के साथ नहीं कह सकता कि उसने जिसे चुना है वह सबसे अच्छा और भला इंसान है। क्योंकि चुनाव में जाति, पैसे, पार्टी, मसल-पावर जैसे कई फेक्टर काम करते हैं। इसीलिए किसी योग्य और भले व्यक्ति को चुनना आज भी बहुत उलझन भरा काम है।यूँ तो देखने में सभी अच्छे लगते हैं और सबके अपने-अपने दावे भी होते हैं,पर उनमें से सचमुच में सबसे अच्छा कौन है, इसे समझ पाना बहुत कठिन है। तो आईए,इस संबंध में एक किस्सा सुनते हैं, जो मुझे हर चुनाव के समय याद आ जाता है। ये किस्सा आज से सत्तर साल पहले के ‘राधापुर’ नाम के एक गांव का है। गांव में एक स्कूल है,एक पोस्ट आफिस है,एक तालाब है,एक मंदिर भी। साथ ही है एक जमींदार,जो किसानों से लगान वसूलने में कोई कोताही नहीं वापरता। एक ड़ाक्टर है, जो बिना पैसे लिए दवा की एक गोली भी नहीं देता,भले ही मरीज की जान चली जाए। एक पुजारी,जो अछूतों से दस हाथ दूर से बात करता है और जिसके रहते कोई दलित मंदिर की सीढ़ी नहीं चढ़ सकता। एक ठेकेदार,जो गांव के विकास के लिए आए पैसे को जेब में रखने में यकीन रखता है। एक शिक्षक,जो बच्चों की तकदीर संवारने की कोशिश में जुटा हुआ है। एक नेक,सज्जन और ईमानदार पोस्टमास्टर,जो ठेकेदार का कर्ज नहीं चुका पा रहा है और बीमार पत्नी,जवान बेटी और बेटे के साथ गरीबी में गुजारा कर रहा है और हाँ एक डाकिया,जिसकी नजर सारे गांव पर है।

तो आगे किस्सा ये है कि एक दिन अचानक पोस्टमास्टर के नाम से किसी जे.सी.राय का एक खत आता है,जिसके साथ पाँच लाख का एक चेक है। पत्र में पोस्टमास्टर से यह अनुरोध किया गया है कि वो गांव में जिसे सबसे भला आदमी समझते हों,उसे ये रकम दे दें,ताकि वह गांव के विकास पर इसे लगा सके। पोस्टमास्टर गांव के चार-पांच बड़े लोगों को एक जगह बुला कर चिट्ठी और चेक के बारे में बताता है। सबसे पहले जमींदार साहब रकम पर अपना हक जताते हैं,पर और लोग इसका विरोध करते हैं। तब यह तय होता है कि यह गांव वालों पर छोड़ दिया जाए कि वे हम में से जिसे सबसे भला समझते हों, चुन लें और इसके लिए एक महीने बाद चुनाव करा लिया जाए।

यहाँ से गांव के माहौल में नया ट्विस्ट आता है। जो डाक्टर बिना पैसे लिए किसी को दवा नहीं देता था, वह घर-घर जाकर फ्री में इलाज करने लगता है। अपने दवाखाने पर खैराती दवाखाने का बोर्ड लगवा देता है। ये खबर जमींदार साहब को लगती है तो वे सबका लगान माफ करने का एलान करवा देते हैं। चारपाई पर पसरे रहने वाले जमींदार साहब गांव का मुआयना करने निकलते हैं। जिन किसानों के पास बोने के लिए बीज नहीं होते हैं,उन्हें मुफ्त में बीज उपलब्ध करवाते हैं। इधर ठेकेदार साहब जब जमींदार की लोकप्रियता बढ़ती देखते हैं,तो गांव में हेंडपम्प लगवाना और सड़क बनवाना शुरू कर देते हैं। ये देख पंड़ित जी अपनी चालें चलने लगते हैं। अचानक से उनके मन में अछूतों के लिए प्रेम उमड़ आता है। अब अछूतों के भगवान के दर्शन पर उन्हें कोई एतराज नहीं होता। स्कूल के मास्टर अपने काम और स्वभाव की वजह से लोगों में वैसे ही लोकप्रिय हैं।

जैसे-जैसे चुनाव का समय नज़दीक आता है,हर उम्मीदवार अपने-अपने हथकंडे आजमाने लगता है। गांव के मेले में जमींदार साहब लोगों को मुफ्त भोजन और नाच देखने की सुविधा उपलब्ध कराते हैं।पंड़ित जी धर्म को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की जुगत भिड़ाते हैं। वे धोषित कर देते हैं कि रात को सपने में देवी माँ ने उन्हें बताया कि एक खास जगह पर वे जमीन से प्रकट होंगी,जहाँ उनके लिए भव्य मंदिर बनाया जाए। ऐसा चमत्कार देखने के लिए गांव वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है। पंड़ित जी की पूजा-पाठ और मंत्र-जाप के बीच देवी जी की प्रतिमा सही में धीरे धीरे जमीन से बाहर आ जाती है और पंड़ित जी झाँकी जम जाती है। उन्हें सिद्ध पुरूष के तौर पर स्वीकार कर लिया जाता है।

इधर ठेकेदार को कुछ शंका होती है। उसे इशारा मिलता है कि जहाँ सेे प्रतिमा निकली है,उसके दो-चार हाथ नीचे मूर्ति के प्रकट होने का रहस्य छुपा हुआ है। वह एकांत में जा कर खुदाई करवाता है तो उस जगह बहुत से फूले हुए चने मिलते हैैं। उन्हें वह लेकर पंड़ित जी के घर जाता है और पोल खोल देने का ड़र दिखाता है। यह देख कर पंड़ित जी हथियार ड़ाल देते हैं और पाँच लाख को आधा-आधा बांट लेने का भरोसा दिलाते हैं।

अब डाक्टर को कुछ और नहीं सूझता,तब वह गांव के तालाब में कोई ऐसी चीज़ मिलवा देता है,जिससे उसका पानी पीकर लोगों को पेट में मरोड़ होने लगे और वे अपना इलाज करवाने उसके पास आने लगे। ऐसा होता भी है। वह पीड़ितों से इलाज के बदले वोट देने का वचन लेता है।

जल्दी ही चुनाव का दिन नजदीक आता है।गांव में जुलूस निकलने लगते हैं। चुनाव के दिन बूथ लूटने की योजना बन जाती है।बाहर से लठैत बुला लिए जाते हैं,जो वोट देने आए गांव वालों को मारपीट कर भगा देते हैं। गांव वाले भी किसी की शह पाकर उनका मुकाबला करने लगते हैं।

आखिर में वह आदमी प्रकट होता है,जो पांच लाख देने वाला है। लोग हैरान रह जाते हैं जब उन्हें पता लगता है कि वो जे.सी.राय और कोई नहीं,उनका डाकिया है। जे.सी राय अपनी माँ के साथ यह घोषणा करते हैं कि इस गांव के सबसे भले इंसान ये चुनाव लड़ने वाले नहीं,बल्कि पोस्टमास्टर हैं। ये पाँच लाख रूपए उन्हीं को देना सही होगा। राय गांव वालों को बतलाते हैं कि ये चेक पोस्टमास्टर के नाम से ही आया था,यदि वे चाहते तो खुद ही रख लेते और किसी को पता भी नहीं चलता। तब सारे गांव वाले भले आदमी के रूप में पोस्टमास्टर का चुनाव कर लेते हैं।सारे लोग पोस्टमास्टर के घर जाते हैं और उन्हें उनका फैसला बता कर पाँच लाख(तबके पाँच लाख संभवत: आज के पचास करोड़ के बराबर हों)ले लेने का आग्रह करते हैं। तब बहुत मुश्किल से पोस्ट मास्टर इसके लिए राजी होते हैं।

हमारे बहुत सारे मित्र अब तक समझ गए होंगे कि ये कहानी कहाँ से ली गई है।जी हाँ,आप सही हैं। ये कहानी है वर्ष 1960 की फिल्म ‘परख’ की। इस कहानी को लिखा था सलिल चौधरी ने और इसमें संगीत भी उन्हीं का था। इसके चुटीले संवाद लिखे थे कवि और गीतकार शैलेन्द्र ने। इस फिल्म के सारे गीत भी उन्हीं के थे।प्रसिद्ध निर्देशक बिमल राय के निर्देशन में ये फिल्म बनी थी। इस फिल्म के जरिए जिस सियासी माहौल दिखाया गया था, साठ-सत्तर साल बाद भी आज का वातावरण उससे कुछ अलग नहीं है।

इस फिल्म का लता जी का गाया एक गीत आज भी बहुत चाव से सुना जाता है,जिसके माधुर्य का कोई सानी नहीं है और यह उनके श्रेष्ठ गीतों में से एक है। यह गीत है ‘ओ सजना बरखा बहार आई’। एक और गीत है जिसे भी बहुत पसंद किया जाता रहा है,जो है ‘मिला है किसी का झुमका’।

इस फिल्म के कलाकार थेे मोतीलाल (डाकिया हराधन उर्फ जे.सी.राय), नसीर हुसैन (पोस्टमास्टर), कन्हैयालाल (पंड़ित तर्कालंकार), फिल्मी जगत की नवोदित अभिनेत्री साधना, दुर्गाखोटे,बसंत चौधरी(प्रोफेसर रजत),लीला चिटनिस, जयंत(जमींदार), राशिद खान(डाक्टर), केस्टो मुखर्जी आदि।

वर्ष 1961 में इस फिल्म के निर्देशन हेतु सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्म फेयर अवार्ड विमल राय को मिला था जबकि फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार के लिए मोतीलाल को चुना गया था।

यदि आज तक भी आपने विमल राय की इस अनुपम कृति को नहीं देखा है,तो अब अवश्य देखिए।

Back To Top