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विजय बुधोलिया.
आयु- 75 वर्ष.
शिक्षा- (1) एम.ए.(प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व.)
(2) पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिग्री।
अनुभव- म.प्र. शासन से प्रथम श्रेणी अधिकारी के पद से सेवानिवृत।
रुचि- साहित्य एवं संस्कृति का अध्ययन. रामायण,पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन। वाल्मीकि रामायण एवं अन्य रामायणों के आधार पर रामकथा के अनजाने प्रसंगों पर लेखन।
अन्य सामयिक व विविध विषयों पर लेखन।

सम्पर्क – फोन 7389951404
ई मेल.. vijaybudholia@gmail.com


राम-प्रवाह.

सरिता हो या कथा, उनमें ‘प्रवाह’ होना अत्यावश्यक है, तभी वह उपयोगी और प्रभावशाली बनी रह सकती है। कोई भी सरिता तभी तक शुद्ध, पवित्र और जनोपयोगी होती है जब तक वह निरंतर गतिमान रहती है। इसी से सरिता हर कठिनाईयों के पार करती हुई लगातार प्राणियों को तृप्त करती और सूखी जमीन को हरा-भरा करती हुई चलती है। यही स्थिति कथा की है, उनमें भी सरलता, तरलता, रोचकता और प्रेरणा देने जैसे गुण होना चाहिए।

हम सौभाग्यशाली हैं कि रामकथा रूपी सरिता भारतीय जन-मानस में सदियों से निरंतर प्रवाहित हो रही है। इसीलिए यह जीवंत और प्राणवान है। यही वह कथा है जो जनजीवन को जीवन जीने का सही रास्ता बताती रही है और समाज में शाँति, सुव्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है।

राम-कथा हमारे जनसामान्य में ऐसी रची-बसी है कि वह हमारे जीवन का अँग बन गई है। हर कठिन परिस्थितियों में रामकथा हौसला देती है और उस परिस्थिति से बाहर आने का मार्ग सुझाती है। क्योंकि, श्रीराम ने स्वयं ने बिना विचलित हुए अपने जीवन में हर तरह की कठिनाइयों का सामना किया था। फिर भी वे सदा सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलते रहे।

यूँ तो रामकथा वर्षों से लोकप्रिय हैै, तथापि महात्मा तुलसीदास जी द्वारा लोकभाषा में ‘रामचरितमानस’ की रचना करने के बाद यह जन-जन में व्याप्त हो गई। आज रामकथा का अर्थ मानस में दी गई रामकथा से ही लिया जाता है। तथापि तुलसीदास जी से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व आदिकवि महर्षि वाल्मिकी ने “वाल्मीकि रामायण” रचना की थी और इसे समाज का अंग बना दिया था। बाद में संस्कृत के महाकवि कालिदास (रघुवंशम्) और अन्य पुराणकारों ने रामकथा का तन्मयता से गायन किया। रामकथा विदेशों में भी पहुँची और उसने एक अलग रूप ले लिया। क्षेत्रीय भाषाओं में भी अनेक रामायण रची गईं। जहाँँ वे लोगों को उनकी भाषा में रामकथा जानने का आधार बनी।

प्रस्तुत लेख माला के लेखन में मुख्यत: वाल्मीकि रामायण का ही सहारा लिया गया है। फिर जगह-जगह अन्य रामकथाओं का उल्लेख भी आया है। इस आलेख माला का उद्देश्य सम्पूर्ण रामकथा का वाचन नहीं रहा है। इसमें मात्र कुछ ऐसे प्रसंगों को उजागर करना है, जो पाठकों को सामान्यत: अनजाने या कम जाने-पहचाने से लग सकते हैं।

इस लेखमाला के बारे में मेरा ऐसा कोई दावा नहीं है कि यह समग्र और त्रुटिहीन है। इसमें कई स्थानों पर तथ्यों में विसंगतियाँ और व्याकरण संबंधी त्रुटियाँ हो सकती हैं, इस हेतु सुधि पाठकों से क्षमा-याचना है। उनसे यह निवेदन भी है कि ऐसी कोई त्रुटि मिलने पर वे अवगत अवश्य कराएँ।


विजय बुधोलिया.
7389951404.

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