जेल में कोई खुशी-खुशी जाना और रहना नहीं चाहता है, क्योंकि वह कोई पाँच सितारा होटल तो होती नहीं। इसलिए जेल के नाम से ही लोगों को घबराहट होने लगती है। अधिकतर लोगों की धारणा होती है कि जेल यानि कि यातनागृह। जबकि ऐसा होता नहीं है। पर जेलें कोई सुविधा घर भी नहीं होतीं, क्योंकि सभी जेलों में बंदी उसकी केपेसिटी से ज्यादा भरे होते हैं। इसलिए लोग भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वह कभी जेल का मुँह न दिखाए।
किन्तु, जिसने जन्म ही जेल में लिया हो, वह क्या करे? वैसे तो भगवान कृष्ण ने भी जेल में जन्म लिया था, किन्तु, वे तो छलिया थे। मामा कंस के चुंगल से बच कर दूध,मलाई, मक्खन, मिश्री खाने गोकुल पहुँच गए। पर और तो ऐसा नहीं कर सकते न। आप जिस घर में पैदा हुए हों, वहीं पलना-बढ़ना आपकी नियति होती है। वैसे तो हर माँ यशोदा ही होती है, जो यथासंभव अपने लाल को भरपूर लाड़-प्यार देती है। मेरे साथ भी वैसा ही कुछ था। पिताश्री जेलर थे, लिहाजा आवास भी जेल परिसर में ही था। जेल के नियमों के अनुसार जेल के हर कर्मचारी को उसी परिसर में रहना अनिवार्य होता है। ताकि, इमरजेन्सी में सब तत्काल इकट्ठे हो सकें। इसके लिए सभी कर्मचारियों को उनकी पात्रता अनुसार सरकारी आवास मिलते हैं।
जेल परिसर में पैदा होने का मतलब आप जेल में होते भी हैं और नहीं भी। पर मेरे साथ तो और ऊँची हो गई। वैसे तो जेल परिसर में रहने वाले कर्मचारियों के बच्चे भी अस्पताल में जन्म लेते हैं। किन्तु, मेरा जन्म तो घर में, मतलब जेल परिसर में ही हुआ। हुआ कुछ यूँ कि हमारे घर आने वाली एक नर्स ने माँ को समझाया कि डिलेवरी नार्मल होने वाली है। इसके लिए अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं, मैं इस काम के लिए घर पर ही आ जाऊँगी। हुआ भी कुछ ऐसा ही। वह जगह थी, यवतमाल जिले का जिला जेल, जो विदर्भ में आता है।
माँ बतलाती थी कि मैं शुरू से गोलू-गोलू था, इसलिए खिलाने वालों की कमी नहीं रहती थी। आसपास की सभी महिलाएँ लाड़-लड़ाने अपने-अपने घर ले जाती थीं। जो मेरी दो बड़ी बहनों को अच्छा नहीं लगता था क्योंकि इससे उन्हें खिलाने का मौका ही नहीं मिल पाता था। अभी यवतमाल की मौसी-मामियों की इच्छा भरी भी न थी कि पिताश्री का ट्राँसफर यवतमाल से अमरावती हो गया। पहले हर दो-तीन साल में प्रशासकीय अधिकारियों की बदली हो जाना, रूटीन बात समझी जाती थी। इसलिए अपना ट्रांसफर रुकवाने की कोई कोशिश भी नहीं करता था।
अमरावती जेल बड़ी थी पर माहौल वैसा ही था। फिर मुझे क्या करना था। खाने-पीने, खेलने-कूदने को और लाड़-प्यार मिले कि बहुत है। साल भर के बच्चे को और चाहिए भी क्या? यवतमाल हो या अमरावती, सब जगह एक सी ही थी। सब जगह मराठी बोलने का चलन था, इसलिए टूटी-फूटी कैसी भी हो, मराठी भाषा आने लगी।
पहले जेल परिसरों में अच्छी बात यह होती थी कि आसपास बड़े-बड़े खेल के मैदान और बगीचे होते थे। तब जमीन की कहीं कोई कमी नहीं होती थी। तबके जमाने में बिजली कहीं नहीं होती थी। रात में लालटेन और लेम्प ही रौशनी के साधन थे। पंखों के नाम पर हाथ से घुमाए जाने वाले पंखे होते थे। पानी के साधन कुएँ होते थे और घर में पानी भरने वाले बंदीगण। घर में कामकाज के लिए भी उनकी सेवाएँ ही ली जाती थीं। घरों की फर्श कच्ची होती थीं, इसलिए रोजाना लीपना-पोतना जरूरी हो जाया करता था।
स्कूल में भर्ती:
खेलते-कूदते धीरे-धीरे मैं चार साल का हो गया। चार साल का बच्चा केवल घर में मस्ती करता रहे, यह भी किसी को रास नहीं आता था। उन दिनों नर्सरी-केजी जैसी कोई सुविधा तो होती नहीं थी। इसलिए बड़े भाई और बहनों के साथ सरकारी स्कूल में भेजना शुरू कर दिया गया। छोटे बच्चों की स्कूल में भर्ती नहीं किया जाता था पर कच्ची पहली के नाम से पहली में बिठा लिया जाता था। सारे बच्चों के साथ गिनती और वर्णमाला रटते-रटते वह भी आ गई। पढ़ाई में होशियार देखकर अगले साल पक्की पहली में भर्ती कर लिया गया। मुझे इतने साल बाद आज भी याद है कि स्कूल टूटी-फूटी और बांस की टट्टियों वाली थी। यद्यपि, स्कूल हमारे घर से ज्यादा दूर नहीं थी शायद आधा-पौन किलोमीटर दूर रही होगी। पर मुझे तो बहुत दूर लगती थी। छोटे-छोटे कदमों से उतनी दूरी भी बहुत लगती थी। मराठी मीडियम से अभी पहली पास की ही थी कि पिताश्री का तबादला अमरावती से जबलपुर हो गया। यह ठेठ हिंदी-भाषी इलाका था। यहाँ कि जेल बहुत बड़ी थी। हर घर में बिजली भी थी जो हमने पहली बार देखी थी। घर की फर्श भी पक्की थी ।
हिंदी स्कूल में दर्जा घटाया:
अमरावती में मराठी माध्यम से पहली पास कर लेने के बाद भी यहाँ की स्कूल ने मुझे दूसरी में लेने से मना कर दिया। उनका कहना था कि मराठी में ये जाने क्या-क्या बोलता है। इसलिए इसे फिर पहली में भर्ती कर हिन्दी सिखानी पड़ेगी। मेरे हाथ में तो कुछ था भी नहीं, इसलिए फिर से पहली में भरती हो गए। यहाँँ माध्यम भले ही हिंदी था पर मुझे तो बालपन से मराठी बोलने की आदत थी। सो बात-बात पर मराठी शब्द निकल ही जाते थे। दूसरे बच्चे हंसते थे और गुरुजी लाल-पीले होते थे। खैर, हौले-हौले हिंदी भी समझ में आने लगी। उन दिनों महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश नए प्रदेश बने। पिताश्री ने नए मध्यप्रदेश में रहना पसंद किया,जिससे मराठी कहीं दूर छूटती चली गई और हम लोग हिंदी भाषी हो गए।
बिजलीघर:
जबलपुर के बारे में इतना और याद है कि स्कूल के पास ही बिजली घर था। वहाँ शहर भर की जरूरत के लायक बिजली बन जाती थी। बिजली बनाने के लिए वैगनों से कोयला आता था,जिसे ट्रालियों में भरकर मजदूर संकरी पटरियों पर ठेलकर बिजली कारखाने के अंदर ले जाते थे। जहाँ हमें अंदर जाने की इजाजत नहीं थी। रेल्वे स्टेशन भी पास ही था, जहाँ छुक-छुक गाड़ियाँ आया करती थीं। हम लोग अक्सर वहाँ घूमने चले जाया करते थे।
नए सिक्के:
उसी समय दशमलव प्रणाली लागू हुई थी और नए सिक्के जारी हुए थे। प्रदर्शन के लिए रखे गए इन सिक्कों को लोग बहुत उत्सुकता से देखते। बहुत जल्दी ऐसे सिक्के लोगों के जेबों में खनखनाने लगे। इनके साथ ही पुराने सिक्के (रुपया, आना, पैसे) भी चलन में थे।
रौशनी ही रौशनी:
दीपावली के अलावा पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को रौशनी भी खूब होती थी। आजादी नई-नई मिली थी इसलिए लोगों में उत्साह भी भरपूर था। पहली बार मैंने इतनी रौशनी देखी थी, जिसकी चर्चा हम लोग कई दिनों तक करते थे।
घर से भागने की सजा:
पिताश्री वैसे तो अधिकतर शांत रहते थे पर एक बार हमने न जाने ऐसी कौन सी शरारत कर दी कि पिताजी ने गुस्से में फरमान सुना दिया कि इन दोनों (मुझे और मेरे बड़े भैया)को घर में मत घुसने देना। शाम का खाना भी नहीं मिलेगा। ऐसा कह कर वे शाम की ड्यूटी पर चले गए। पहले तो हम यहाँ-वहाँ घूमते रहे। पर धीरे-धीरे ठँड़ बढ़ रही थी। हम दोनों बस हाफ स्वेटर पहने हुए थे। जब ज्यादा ठंड़ लगने लगी तो हम दोनों स्टेशन पर आ गए। वहाँ कुली और मजदूर आग ताप रहे थे, हम लोग भी वहीं बैठ गए। यहाँ घर में कोहराम मचा हुआ था। पिताश्री जब रात दस बजे ड्यूटी से आए तब माँ ने उन्हें खरी-खोटी सुनाना शुरू की। आपने दोनों बच्चों को भगा दिया। इतनी ठंड़ पड़ रही है। न जाने दोनों कहाँ चले गए। गर्म कपड़े भी नहीं पहने हुए हैं। भूखे अलग हैं। अब तो पिताश्री को भी घबराहट होने लगी। सचमुच में ये न जाने कहाँ चले गए। उन्होंने अपने मित्र ओर पड़ौसी हरिहर सिंह को उठाया और सारी बात बताई। मित्र भी पिताजी पर नाराज हुए फिर दोनों हमें ढूंढ़ने निकल पड़े। पहले तो उन्होंने उन ठिकानों को देखना शुरू किया जहाँ आग जल रही थी। लोगों से पूछताछ शुरू की, पर पता नहीं चल पा रहा था। फिर दूर उनको आग जलती दिखी। वहाँ वे गए तो हम लोग बैठे मिल गए। वे हम दोनों को घर लाए। खाना खिलाया। तब माँ-पिताजी की जान में जान आई।
इस बीच पिताश्री का ट्राँसफर होशंगाबाद हो गया और हम नई जगह चले आए। इसलिए आगे की कहानी होशंगाबाद से सुनिए।
