Author: विजय बुधोलिया

बाल कांड बालक राम

1.15 शिव-धनुष- जिस पर टिका था सीता जी का भाग्य

सीता जी का विवाह, वस्तुत: कोई स्वयंवर नहीं था। अपितु वह राजा जनक के उस प्रण के अधीन था,जिसमें उन्होंने तय किया था कि जो कोई भी शिव-धनुष को तोड़ सकेगा, उसी को सीता पत्नीस्वरूप दे दी जाएगी। न जाने उन्होंने ऐसा प्रण किसके आश्वासन पर ले लिया था, जबकि उस समय समस्त देवताओं सहित […]

बाल कांड बालक राम

1.16 जब देवताओं ने पहुंचाई राम-विवाह में बाधा

रामकथा के अनेक रूप हैं,एक रूप इस प्रकार भी है।कृतिवास रामायण की कथा के अनुसार राम और सीता के विवाह का जो मुहूर्त वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, मार्कण्डेय और नारद द्वारा आपसी परामर्श कर तय किया था, यदि उस शुभ मुहूर्त में वह सम्पन्न हो जाता तो उनका पूरा वैवाहिक जीवन निर्विघ्न चलता रहता। किन्तु, […]

बाल कांड बालक राम

1.17 तपस्वी,मनस्वी,यशस्वी,थे ऋषि…..!

रावण की त्रैलोक्य विजय -22 @ आर्य और अनार्य, मात्र “दो “शब्द नहीं। दो संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले उत्कृष्ट और निकृष्ट विचार हैं। मन और मष्तिस्क से पवित्र, उत्कृष्ट पक्ष प्रकृति,मनुष्य और जीवन मात्र से प्रेम करता था।और निकृष्ट पक्ष पशुओं को तो छोडिंये ,मनुष्यों तक को मार कर, भूनकर और रांधकर भक्षण कर […]

अयोध्या कांड

2.1 श्रवण कुमार की कहानी सदा से आदर्श मानी गई

गुरू वशिष्ठ बहुत दिनों से चिंतित थे,क्योंकि वे जानते थे कि राम की शिक्षा अभी कुछ अधूरी है।राम यद्यपि कुशाग्र बुद्धि थे और उन्होंने उनके गुरूकुल में रहकर वेद-वेदांत सहित समस्त शास्त्रों की शिक्षा बहुत कम समय में प्राप्त कर ली थी।अस्त्र-शस्त्रों के संचालन में भी वे निपुण थे।तथापि दिव्यास्त्रों की शिक्षा उन्हें अभी तक […]

अयोध्या कांड

2.2 “क्या माता कौशल्या के संताप का कारण कैकेयी थी”

युग चाहे कोई भी रहा हो, हर युग में पति की दूसरी पत्नी अर्थात् सौत पहली पत्नी के लिए सदैव दु:खदायी रही है । क्योंकि उसे सौत से सतत् चुनौति मिलती रही है। भले ही प्रत्यक्ष दिखाई न देता हो, पर उनके बीच अधिकारों और वर्चस्व को लेकर प्राय: शीतयुद्ध चलता रहता है। यदि सौतने […]

अयोध्या कांड

2.3 कहाँ से आई ‘राम और केवट’ की कथा”

रामचरित मानस में एक छोटा सा किन्तु,रोचक और भक्तिभाव से ओत-प्रोत प्रसंग आता है। वह है राम और केवट के संवाद का। राम,लक्ष्मण और सीता के साथ गंगा जी के पार जाने के लिए नदी के किनारे खड़े हुए हैं। वे केवट से अनुरोध करते हैं कि भाई उस पार उतारने के लिए अपनी नाव […]

अयोध्या कांड

2.4 जाबालि-राम संवाद: जब अधर्म ने चाहा धर्म को समझाना

चित्रकूट में जब गुरु वसिष्ठ सहित भरत,शत्रुध्न और माताएँ भी श्रीराम को अयोध्या वापस चलने के लिए मनाने और राम को चौदह वर्ष वन में बिताने के संकल्प से डिगाने में असफल रहे तब लोकायत दर्शन के आचार्य जाबालि सामने आए। लोकायत दर्शन एक भौतिकवादी विचारधारा है जिसके अनुसार इन्द्रियों से अनुभव किए जाने वाले […]

अयोध्या कांड

2.5 चित्रकूट से क्यों गए वनवासी राम.

‘चित्रकूट के घाट पे भई संतन की भीर’ भीड़ चाहे संतों की हो या भक्तों की, प्राय: समस्या पैदा करती है। श्रीराम को राज्यभार सम्भाने हेतु मनाने के लिए भरत जी के साथ आई अयोध्या-वासियों की भीड़ के कारण ही उन्हें उस रमणीक चित्रकूट को छोड़कर दक्षिण के सघन वनों में जाना पड़ा था।यह वह […]

अयोध्या कांड

2.6 राम ने कहाँ बिताए वनवास के 14 वर्ष

श्रीराम ने इस धरा-धाम पर कितना समय बिताया था,यह तो पक्के तौर पर कोई नहीं बता सकता।क्योंकि इस बारे में कई मत हैं।किसी का मानना है कि उन्होंने सौ वर्ष बिताए थे तो किसी का दस हजार वर्ष।पर यह सब मानते हैं कि उन्हें वन में चौदह वर्ष बिताना पड़ा था।वास्तव में राम का वनगमन […]

अयोध्या कांड

2.7 कैसे हुई सीताहरण की घटना

श्रीराम ने अपने वनवास के चौदह वर्ष का कितना समय कहाँ बिताया,इस बारे में अनेक मत हैं।किन्तु,इतना तय है कि उन्होंने अपने दस वर्ष दंडकारण्य के पंचाप्सर के समीप रहने वाले ऋषि-मुनियों के आश्रमों में बिता कर उन्हें राक्षसों के त्रास से मुक्ति दिलाई थी। “रमताश्र्चानुकूल्येन ययु: संवत्सरा दश। परिवृत्य च धर्मज्ञों राधव: सह सीतया।। […]

अरण्य कांड

3.1 “पक्षिराज जटायु ने रावण का मुकाबला क्यों किया”

सीता-हरण के बाद श्रीराम के हित में पहली बार अगर किसी प्राणी ने रावण से टक्कर ली थी तो वह था जटायु।पर प्रश्न यह है कि उसने महाबली रावण से मुकाबला क्यों किया?उसका रावण से तो कोई बैर था नहीं?माना कि रावण सीता जी का हरण के ले जा रहा था।किन्तु, उससे जटायु को क्या […]

अरण्य कांड

3.2 मुसीबत कभी अकेले नहीं आती

कहावत है कि मुसीबत कभी अकेले नहीं आती,जब भी आती है,अपने संगी-साथियों के साथ आती है।पर जो कोई इनका सामना धीरज और साहस से करता है तो उसे इनमें से ही उसे आगे का रास्ता मिल जाता है।श्रीराम के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा था।सीता हरण और जटायु के मरण के बाद वन […]

अरण्य कांड

3.3 “जब पक्षियों ने तक उड़ाया श्रीराम का उपहास”

सीता जी के अपहरण के बाद राम विरह वेदना से व्याकुल हो जाते हैं। उन्हें नहीं मालूम होता है कि सीता को कौन और कहाँ ले गया है। वे व्याकुलता में वृक्षों,लताओं, पक्षियों,पशुओं से जानकी के बारे में पूछते फिरते हैं कि वे कहाँ हैं अथवा उन्हें कौन और कहाँ ले गया है। उनकी इस […]

अरण्य कांड

3.4 “श्रीराम से पिंड स्वीकार क्यों नहीं किया दशरथ जी ने”

श्राद्धकर्म के लिए गया का बहुत महत्व माना जाता है। ऐसी धारणा है कि गया में पिंडदान करने से पितर तृप्त हो जाते हैं । इसलिए इन दिनों देश के कोने-कोने से लोग श्राद्ध करने के लिए गया पहुँचते हैं। हमारी श्रद्धा भले ही गया तीर्थ में हो, पर तुलसीदास जी के मन में गया […]

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