गुरू वशिष्ठ बहुत दिनों से चिंतित थे,क्योंकि वे जानते थे कि राम की शिक्षा अभी कुछ अधूरी है।राम यद्यपि कुशाग्र बुद्धि थे और उन्होंने उनके गुरूकुल में रहकर वेद-वेदांत सहित समस्त शास्त्रों की शिक्षा बहुत कम समय में प्राप्त कर ली थी।अस्त्र-शस्त्रों के संचालन में भी वे निपुण थे।तथापि दिव्यास्त्रों की शिक्षा उन्हें अभी तक […]
2.2 “क्या माता कौशल्या के संताप का कारण कैकेयी थी”
युग चाहे कोई भी रहा हो, हर युग में पति की दूसरी पत्नी अर्थात् सौत पहली पत्नी के लिए सदैव दु:खदायी रही है । क्योंकि उसे सौत से सतत् चुनौति मिलती रही है। भले ही प्रत्यक्ष दिखाई न देता हो, पर उनके बीच अधिकारों और वर्चस्व को लेकर प्राय: शीतयुद्ध चलता रहता है। यदि सौतने […]
2.3 कहाँ से आई ‘राम और केवट’ की कथा”
रामचरित मानस में एक छोटा सा किन्तु,रोचक और भक्तिभाव से ओत-प्रोत प्रसंग आता है। वह है राम और केवट के संवाद का। राम,लक्ष्मण और सीता के साथ गंगा जी के पार जाने के लिए नदी के किनारे खड़े हुए हैं। वे केवट से अनुरोध करते हैं कि भाई उस पार उतारने के लिए अपनी नाव […]
2.4 जाबालि-राम संवाद: जब अधर्म ने चाहा धर्म को समझाना
चित्रकूट में जब गुरु वसिष्ठ सहित भरत,शत्रुध्न और माताएँ भी श्रीराम को अयोध्या वापस चलने के लिए मनाने और राम को चौदह वर्ष वन में बिताने के संकल्प से डिगाने में असफल रहे तब लोकायत दर्शन के आचार्य जाबालि सामने आए। लोकायत दर्शन एक भौतिकवादी विचारधारा है जिसके अनुसार इन्द्रियों से अनुभव किए जाने वाले […]
2.5 चित्रकूट से क्यों गए वनवासी राम.
‘चित्रकूट के घाट पे भई संतन की भीर’ भीड़ चाहे संतों की हो या भक्तों की, प्राय: समस्या पैदा करती है। श्रीराम को राज्यभार सम्भाने हेतु मनाने के लिए भरत जी के साथ आई अयोध्या-वासियों की भीड़ के कारण ही उन्हें उस रमणीक चित्रकूट को छोड़कर दक्षिण के सघन वनों में जाना पड़ा था।यह वह […]
2.6 राम ने कहाँ बिताए वनवास के 14 वर्ष
श्रीराम ने इस धरा-धाम पर कितना समय बिताया था,यह तो पक्के तौर पर कोई नहीं बता सकता।क्योंकि इस बारे में कई मत हैं।किसी का मानना है कि उन्होंने सौ वर्ष बिताए थे तो किसी का दस हजार वर्ष।पर यह सब मानते हैं कि उन्हें वन में चौदह वर्ष बिताना पड़ा था।वास्तव में राम का वनगमन […]
2.7 कैसे हुई सीताहरण की घटना
श्रीराम ने अपने वनवास के चौदह वर्ष का कितना समय कहाँ बिताया,इस बारे में अनेक मत हैं।किन्तु,इतना तय है कि उन्होंने अपने दस वर्ष दंडकारण्य के पंचाप्सर के समीप रहने वाले ऋषि-मुनियों के आश्रमों में बिता कर उन्हें राक्षसों के त्रास से मुक्ति दिलाई थी। “रमताश्र्चानुकूल्येन ययु: संवत्सरा दश। परिवृत्य च धर्मज्ञों राधव: सह सीतया।। […]
