श्रीराम भले ही स्वयं ब्रह्म थे, सर्वज्ञ थे, फिर भी मानव रूप धारण करने पर उन्हें भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरू के गृह जाना पड़ा था। अल्पकाल में ही सम्पूर्ण विद्या प्राप्त करने के उपरान्त भी गुरू वशिष्ठ बहुत दिनों से चिंतित थे,क्योंकि वे जानते थे कि राम की शिक्षा अभी कुछ अधूरी […]
1.10 राम प्रकट हुए थे या उन्होंने जन्म लिया था.
महर्षि वाल्मीकि यदि रामजन्म के प्रसंग को लिखते,तो वे राम के अयोनिज जन्म लेने, अर्थात् उन्हें सहसा शिशु के रूप में प्रकट होना बताते, अथवा सामान्य शिशुओं जैसे अपनी माता के उदर से जन्म लेने की बात लिखते। किन्तु, यह जिज्ञासा काल्पनिक ही है। क्योंकि, महर्षि बालकांड और उत्तरकांड स्वयं लिखा ही नहीं था। उन्होंने […]
1.11 मिलती-जुलती है राम और कृष्ण की बाललीला.
‘भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी’ हर रामनवमीं पर हम रामचरित मानस की इस स्तुति को पूरी श्रद्धा और भक्ति-भाव के साथ गाते हैं।जिसमें शिशु राम अपनी माता कौशल्या को अपने चतुर्भुज विष्णु रूप का दर्शन देते हैं। किन्तु, बहुत कम लोगों को यह ज्ञात होगा कि अध्यात्म रामायण वह प्राचीनतम रचना है जिसमें पहले-पहल […]
1.12 अहिल्या उद्धार (अहिल्या के उद्धारक राम)
अनुपम सौंदर्य की प्रतिमा, जिसे ब्रह्माजी ने स्वयं अपने हाथों से गढ़ा हो,वह भी ऐसे-वैसे तरीके से नहीं,अपितु उसे सर्वांग सुंदर बनाने के लिए पहले एक हजार स्त्रियों की रचना की, जिनमें से उन्होंने उनकी सारी विशेषताएँ लेकर फिर उसका निर्माण किया।ऐसी नारी को तो सर्वथा निर्दोष और लावण्यमयी होना ही था।ब्रह्मपुराण के अनुसार ब्रह्मा […]
1.13 एक पत्नीव्रतधारी राम
समाज की सबसे छोटी इकाई, परिवार का निर्माण,पालन और उत्थान की आधारशिला ‘एक पत्नीव्रत’ के पालन पर ही टिकी हुई है।यही आदर्श स्थिति है।प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज इस आदर्श पर चलता रहा है।किन्तु,तब बहुविवाह निषिद्ध भी नहीं था और राजन्यवर्ग में बहुविवाह सामान्य बात समझी जाती थी।क्योंकि, युद्ध-संधियों, समझौतों के कारण बहुविवाह तब अक्सर […]
1.14 राम रमापति कर धनु लेहू
राम-कथा प्रेमियों को वह प्रसंग याद होगा,जब भगवान विष्णु के दो अवतार आमने-सामने आ गए थे।एक थे विष्णु के अंशावतार भृगुपुत्र परशुराम और दूसरे उनके पूर्णावतार कौशल्यानंदन राम।ये प्रसंग था सीता-स्वयंर का,जब श्रीराम ने शिव-धनुष भंग कर दिया था।तब मुनि वेषधारी परशुराम सहसा उस रंगशाला में आ जाते हैं और अपने गुरु भगवान शिव के […]
1.15 शिव-धनुष- जिस पर टिका था सीता जी का भाग्य
सीता जी का विवाह, वस्तुत: कोई स्वयंवर नहीं था। अपितु वह राजा जनक के उस प्रण के अधीन था,जिसमें उन्होंने तय किया था कि जो कोई भी शिव-धनुष को तोड़ सकेगा, उसी को सीता पत्नीस्वरूप दे दी जाएगी। न जाने उन्होंने ऐसा प्रण किसके आश्वासन पर ले लिया था, जबकि उस समय समस्त देवताओं सहित […]
1.16 जब देवताओं ने पहुंचाई राम-विवाह में बाधा
रामकथा के अनेक रूप हैं,एक रूप इस प्रकार भी है।कृतिवास रामायण की कथा के अनुसार राम और सीता के विवाह का जो मुहूर्त वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप, मार्कण्डेय और नारद द्वारा आपसी परामर्श कर तय किया था, यदि उस शुभ मुहूर्त में वह सम्पन्न हो जाता तो उनका पूरा वैवाहिक जीवन निर्विघ्न चलता रहता। किन्तु, […]
1.17 तपस्वी,मनस्वी,यशस्वी,थे ऋषि…..!
रावण की त्रैलोक्य विजय -22 @ आर्य और अनार्य, मात्र “दो “शब्द नहीं। दो संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले उत्कृष्ट और निकृष्ट विचार हैं। मन और मष्तिस्क से पवित्र, उत्कृष्ट पक्ष प्रकृति,मनुष्य और जीवन मात्र से प्रेम करता था।और निकृष्ट पक्ष पशुओं को तो छोडिंये ,मनुष्यों तक को मार कर, भूनकर और रांधकर भक्षण कर […]
