Category: राम अवतार के पूर्व की कथाएँ

बाल कांड राम अवतार के पूर्व की कथाएँ

1.1 रामायण की रचना कैसे और कब हुई.

यह तो हम सभी मानते हैं कि रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी।किन्तु,रचना कब और कैसे हुई थी,इसके बारे में कोई निश्चित मत नहीं है।रामायण की रचना कैसे हुई,इसका एक उत्तर तो रामायण स्वयं देती है।कथा के अनुसार एक बार महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में देवर्षि नारद पधारे।तब महर्षि ने उनसे पूछा कि […]

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1.2 यह भी जानना ज़रूरी कि “रामायण के रचनाकार वाल्मीकि कौन थे”

महाकाव्य रामायण के रचयिता आदिकवि वाल्मीकि कौन थे?रामकथा साहित्य के मर्मज्ञ इस प्रश्न का उत्तर एक अर्से से खोज रहे हैं,किन्तु किसी निश्चित समाधान तक वे नहीं पहुँच सके हैं।क्योंकि इस महान कवि के जीवनवृत के संबंध में प्रामाणिक सामग्री का नितान्त अभाव है।युद्धकांड की फलश्रुति को छोड़कर प्रमाणिक वाल्मीकिकृत रामायण में वाल्मीकि की ओर […]

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1.3 राम जन्म: कथा एक रंग अनेक

महर्षि वाल्मीकि यदि रामजन्म के प्रसंग को लिखते,तो वे राम के अयोनिज जन्म लेने अर्थात् उन्हें सहसा शिशु के रूप में प्रकट होना बताते अथवा सामान्य शिशुओं जैसे अपनी माता के उदर से जन्म लेने की बात लिखते। किन्तु, यह जिज्ञासा अधूरी ही रह जाती है, जब हमें पता चलता है कि महर्षि ने बालकांड […]

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1.5 रामकथा में वरदान और शाप की भूमिका

हमारी धार्मिक कथाओं में ‘वरदान’ या ‘शाप’ महति भूमिका निभाते नजर आते हैं।इसके जरिए यह भी पता लगता रहा है कि जो कुछ भी हुआ है, वह क्यों हुआ।हमारे दोनों महान ग्रंथों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में ऐसी तमाम कथाएँ भरी पड़ी हैं,जिसकी खास वजह वरदान या शाप देना ही रहा है।ऐसा माना जा सकता है […]

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1.7 कैसे शुरू हुई रामभक्ति की पावन धारा.

श्रीराम को श्रीहरि के अवतार होने संबंधी मान्यता यद्यपि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में तब मिल चुकी थी,जब भागवत धर्म फलने-फूलने लगा था।फिर भी राम-भक्ति का वातावरण बनने में लगभग एक हजार वर्ष लग गए।यह रसमय वातावरण आठवीं-नौवीं शताब्दी से बनना शुरु हुआ जोकि,सोलहवीं शती में आकर अपने उच्चतम शिखर पर पहुँच गया।रामानुज सम्प्रदाय के […]

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1.8 सदा से नहीं था राम-भक्ति का ऐसा वातावरण

आज हम श्रीराम को ब्रह्म का पूर्णावतार ही मानते हैं।क्योंकि तुलसीदास ने रामचरित मानस के माध्यम से इसी भावना को जन-जन में रोपित किया है।मानस में उन्होंने अथ से इति तक श्रीराम का चित्रण परब्रह्म के रूप में ही किया है।मानस में वे कभी भी और कहीं भी इससे इतर सोचने का अवकाश नहीं देते।यदि […]

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