Category: विविध

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‘आज मधु वातास डोले’

गूगल से ‘स्त्री’ नाम से बनी फिल्मों के बारे में पूछो तो वह अभी कुछ दिनों पहले बनी हारर फिल्म स्त्री-एक और स्त्री-दो की जानकारी देने लगता है। वह यह भूल जाता है कि वर्ष 1961 में भी स्त्री नाम की एक फिल्म स्त्री बन चुकी है, जो मेलोड़ी से भरपूर थी। जी हाँ, आज […]

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मामला दर्दे दिल का नहीं दिमाग का

निश्चित तौर पर आपने एक अटपटा सा नाम नहीं सुना होगा। ट्रायजेमिनल न्यूरोल्जिया। यह किसी युनिवर्सिटी की डिग्री का नाम नहीं, बल्कि एक बीमारी का नाम है। इसका नाम भला सुनेंगे भी कैसे? यह सर्दी-जुकाम जैसी कामन बीमारी तो है नहीं। यह तो हजारों में किसी एक को होने वाली बीमारी है। भगवान बचाए आपकौ […]

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प्रेम की गहनता को व्यक्त करता हुआ एक गीत “आज मुझे कुछ कहना है।”

(वास्तव में फिल्मों और गीत-संगीत पर लिख पाना मेरे बस की बात नहीं है। इस क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं, माननीय शशांक दुबे साहब। फिर भी कोई-कोई गीत आपको लिखने के लिए बाध्य कर ही देता है। उसी का परिणाम नीचे लिखा यह आलेख है।) कभी-कभी कोई गीत, अपने मधुर संगीत, गायक कलाकार की भाव-भीनी आवाज […]

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चुनाव भले आदमी का

अभी-अभी बिहार में चुनाव हुए हैं जिनके नतीजे भी आ गए हैं। पर कोई भरोसे के साथ नहीं कह सकता कि उसने जिसे चुना है वह सबसे अच्छा और भला इंसान है। क्योंकि चुनाव में जाति, पैसे, पार्टी, मसल-पावर जैसे कई फेक्टर काम करते हैं। इसीलिए किसी योग्य और भले व्यक्ति को चुनना आज भी […]

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जेलों का कष्टमय जीवन

अभिनेता और नेताओं की बात अलग है, जिनका जेल से छूटने पर भव्य स्वागत होता है,भारी भीड़ उन्हें लेने पहुँच जाती है, केमरे चमकने लगते हैं, ढ़ोल-नगाड़े बजने लगते हैं, जयकार के नारे लगने लगते हैं, चेनल वाले बाईट लेने के लिए आगे-पीछे ड़ोलने लगते हैं, विजयी जुलूस निकलता है और फूल बरसने लगते हैं। […]

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“फँसून गेलो रे मामा”

आपके आसपास कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं, जिनके याद आने पर आपके चेहरे पर मुस्कान तैर जाती है। हमारे देखने में भी कुछ समय पहले एक ऐसा ही प्रसंग आया था। किस्सा कुछ यूँ था कि पहले दिन मदुराई घूमने और मीनाक्षी मंदिर के दर्शन करने के बाद दूसरे दिन टूर एंड़़ ट्रेवल्स […]

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“कल्पना के घन बरसते”

अभी जब चारों ओर बादल (घन) बरस रहें हों, तब आप कहेंगे कि बरसते बादलों की कल्पना करने की अभी जरूरत ही क्या है। यह नजारा तो चारों ओर प्रत्यक्ष ही दिखाई दे रहा है। फिर भी आप कितनी भी कल्पना की कितनी ही उड़ान भर लें, आपको बारिश में गीत गीले होते नहीं दिखेंगे, […]

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कुछ बातें बुजुर्गों से

सबसे आदर्श स्थिति तो यह है कि परिवार में बेटे-बहू और बच्चों के साथ बड़े-बुजुर्ग भी रहें। जिनमें माँ-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी या और कोई भी हो सकते हैं। इससे नाती-पोतों को समुचित प्यार, देखभाल और सुरक्षा मिल जाती है। साथ ही बुजुर्गों की देखभाल भी हो जाती है। पहले ऐसे परिवार मिल जाना आम बात […]

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“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो”

“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो” अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘कामायिनी’ में ऐसा लिख कर हिंदी के महान छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद ने नारियों के प्रति सचमुच अपनी श्रद्धा व्यक्त की या नारियों को प्रेम,सौंदर्य,कोमलता और त्याग की प्रतिमूर्ति बताकर एक दायरे तक सीमित कर दिया और उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व को नकार दिया। समाज में समान महत्व […]

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क्या आदिवासी जातियाँ बाहर से आई थीं?

आमतौर पर हम सब ऐसा मानते हैं कि आदिवासी ही यहाँ के मूल निवासी हैं। आजकल आदिवासी खेती-बाड़ी से गुजारा करते हैं। घरों के छोटे-छोटे समूह बना रहते हैं। पशुओं का पालन करते हैंं। मिट्टी के बरतन वापरते हैं। पर अब शहरी समाज के सम्पर्क में आते रहने के कारण उनकी जीवनशैली, उनकी सोच और […]

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“सिद्ध पुरुष भैयाजी महाराज”

हर सिद्ध पुरुष बाहरी वेषभूषा, बोलचाल, तौर-तरीकों से कुछ अलग दिखे, यह जरूरी नहीं है। अपितु, जो सचमुच पहुँचे हुए पुरुष होते हैं उन्हें तो पहचानना ही मुश्किल होता है। वे चाहते भी नहीं है कि उनके पास भीड़ बढ़े और उनकी साधना में बाधा पैदा हो। किन्तु, आजकल हम जैसे बाबा देख रहे हैं […]

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गतिशील समाज- विकास का पैमाना

लगभग सौ-ढेड़ सौ साल पहले तक समाज में जिंदगी लगभग ठहरी हुई सी थी। यह ठहरना कई सौ साल का था । आप पूछेंगे कि क्या समय भी कभी ठहरता है ? यह सच है कि समय कभी किसी के लिए नहीं ठहरता । वह तो अपनी गति से गुजरता रहता है । पर यहाँ […]

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आत्मसाक्षात्कार: वास्तविकता या परिकल्पना

जानकार लोग बतलाते हैं कि यदि आत्मसाक्षात्कार करना हो, तो गहरे ध्यान में उतरना होगा। इतने गहरे कि जिसमें विचार खो जाएँ ,मन खो जाए । यहाँ तक कि दैहिक बोध भी खो जाए। किन्तु, क्या ऐसी अवस्था आ पाना मुमकिन है? विचार खोने का विचार भी आखिर एक विचार ही तो है। क्या यह […]

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सांस्कृतिक पहचान ढूँढ़ता मध्यप्रदेश

जब आप अपने ठिकाने से निकलकर मुम्बई जैसी मेट्रोपोलिटन सिटी में आते हैं, तब आपके सामने पहचान का संकट खड़ा हो जाता है। जैसे कोई लोकल आदमी आपसे पूछता है कि आप कहाँ से हैं और आप बतलाते हैं ‘मध्यप्रदेश’ से। तब वह सोच में पड़ जाता है कि मध्यप्रदेश यानि कौन सी जगह ? […]

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