विविध

“फँसून गेलो रे मामा”

आपके आसपास कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं, जिनके याद आने पर आपके चेहरे पर मुस्कान तैर जाती है। हमारे देखने में भी कुछ समय पहले एक ऐसा ही प्रसंग आया था। किस्सा कुछ यूँ था कि पहले दिन मदुराई घूमने और मीनाक्षी मंदिर के दर्शन करने के बाद दूसरे दिन टूर एंड़़ ट्रेवल्स […]

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“कल्पना के घन बरसते”

अभी जब चारों ओर बादल (घन) बरस रहें हों, तब आप कहेंगे कि बरसते बादलों की कल्पना करने की अभी जरूरत ही क्या है। यह नजारा तो चारों ओर प्रत्यक्ष ही दिखाई दे रहा है। फिर भी आप कितनी भी कल्पना की कितनी ही उड़ान भर लें, आपको बारिश में गीत गीले होते नहीं दिखेंगे, […]

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कुछ बातें बुजुर्गों से

सबसे आदर्श स्थिति तो यह है कि परिवार में बेटे-बहू और बच्चों के साथ बड़े-बुजुर्ग भी रहें। जिनमें माँ-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी या और कोई भी हो सकते हैं। इससे नाती-पोतों को समुचित प्यार, देखभाल और सुरक्षा मिल जाती है। साथ ही बुजुर्गों की देखभाल भी हो जाती है। पहले ऐसे परिवार मिल जाना आम बात […]

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“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो”

“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो” अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘कामायिनी’ में ऐसा लिख कर हिंदी के महान छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद ने नारियों के प्रति सचमुच अपनी श्रद्धा व्यक्त की या नारियों को प्रेम,सौंदर्य,कोमलता और त्याग की प्रतिमूर्ति बताकर एक दायरे तक सीमित कर दिया और उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व को नकार दिया। समाज में समान महत्व […]

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क्या आदिवासी जातियाँ बाहर से आई थीं?

आमतौर पर हम सब ऐसा मानते हैं कि आदिवासी ही यहाँ के मूल निवासी हैं। आजकल आदिवासी खेती-बाड़ी से गुजारा करते हैं। घरों के छोटे-छोटे समूह बना रहते हैं। पशुओं का पालन करते हैंं। मिट्टी के बरतन वापरते हैं। पर अब शहरी समाज के सम्पर्क में आते रहने के कारण उनकी जीवनशैली, उनकी सोच और […]

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“सिद्ध पुरुष भैयाजी महाराज”

हर सिद्ध पुरुष बाहरी वेषभूषा, बोलचाल, तौर-तरीकों से कुछ अलग दिखे, यह जरूरी नहीं है। अपितु, जो सचमुच पहुँचे हुए पुरुष होते हैं उन्हें तो पहचानना ही मुश्किल होता है। वे चाहते भी नहीं है कि उनके पास भीड़ बढ़े और उनकी साधना में बाधा पैदा हो। किन्तु, आजकल हम जैसे बाबा देख रहे हैं […]

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गतिशील समाज- विकास का पैमाना

लगभग सौ-ढेड़ सौ साल पहले तक समाज में जिंदगी लगभग ठहरी हुई सी थी। यह ठहरना कई सौ साल का था । आप पूछेंगे कि क्या समय भी कभी ठहरता है ? यह सच है कि समय कभी किसी के लिए नहीं ठहरता । वह तो अपनी गति से गुजरता रहता है । पर यहाँ […]

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आत्मसाक्षात्कार: वास्तविकता या परिकल्पना

जानकार लोग बतलाते हैं कि यदि आत्मसाक्षात्कार करना हो, तो गहरे ध्यान में उतरना होगा। इतने गहरे कि जिसमें विचार खो जाएँ ,मन खो जाए । यहाँ तक कि दैहिक बोध भी खो जाए। किन्तु, क्या ऐसी अवस्था आ पाना मुमकिन है? विचार खोने का विचार भी आखिर एक विचार ही तो है। क्या यह […]

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सांस्कृतिक पहचान ढूँढ़ता मध्यप्रदेश

जब आप अपने ठिकाने से निकलकर मुम्बई जैसी मेट्रोपोलिटन सिटी में आते हैं, तब आपके सामने पहचान का संकट खड़ा हो जाता है। जैसे कोई लोकल आदमी आपसे पूछता है कि आप कहाँ से हैं और आप बतलाते हैं ‘मध्यप्रदेश’ से। तब वह सोच में पड़ जाता है कि मध्यप्रदेश यानि कौन सी जगह ? […]

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मन की मनमानी

‘कोई पास न रहने पर भी जन-मन मौन नहीं रहता,आप आपसे कहता है वह,आप आपकी है सुनता।’ कविवर मैथिलीशरण गुप्त के समय में होता होगा ऐसा,जब मन खुद ही कह-सुन लेता था। पर अब जमाना बदल गया है जी। अब ‘मन’ जब तक अपनी,मतलब ‘मन की बात’ सारी दुनिया को सुना न दे,उसे चैन नहीं […]

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एक घुमक्कड़ संत … ‘सद्गुरु नानकदेव’

“सद्गुरु जग मंह परगटिया मिटी धुंध जग चानन भया।” जगत में जब कोई सद्गुरु अवतार लेते हैं, तब उनके लोकोत्तर प्रभाव से इस संसार की असहिष्णुता, वैमनस्य, दुर्भाव, दुष्प्रवृतियाँ आदि दुर्गुणों की धुंध मिट जाती है और सहिष्णुता, सद्भाव, सद्वृति, बंधुत्व, प्रेम, करुणा आदि दिव्य गुणों का प्रकाश चारों ओर व्याप्त हो जाता है। सद्गुरु […]

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प्राचीन भारत में जुआ

भारत में जुआ खेलने का चलन प्राचीन काल से चला आ रहा है। हम सब जानते हैं कि महाभारत युद्ध की नींव कौरवों की सभा में युधिष्ठिर द्वारा खेले गए जुए से ही पड़ी थी। न वहाँ युधिष्ठिर जुआ खेलते न उस भीषण संहारक युद्ध,जिसे महाभारत कहा जाता है, की नौबत आती। इसी विषय पर […]

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(45 वर्ष पुरानी आप-बीती) … “रिसर्च स्कालर को भीलों ने लूटा” (एक शोध-यात्रा जो त्रासदी में बदल गई)

भानपुरा से लौटा था। हिंगलाजगढ़ जैसी कठिन और खतरनाक जगह,जहाँ जंगली जानवरों और लुटेरे कंजरों से कदम-कदम पर टकराने का डर था, सर्वे बिना बाधा के पूरा हुआ। बाद में यही बात सालती रही कि कोई सनसनीखेज और यादगार घटना नहीं घटी। शोध-कार्य की लगन और जोश ने बीजागढ़ जाने को प्रेरित किया। जो खरगोन […]

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दिनमान में पुरस्कार

एक समय में हिंदी जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादक रघुवीर सहाय हुआ करते थे। तब दिनमान ने एक नई ऊँचाई को छुआ था। इस पत्रिका को खरीदना और पढ़ना बुद्धिमान और सुरुचिपूर्ण पाठक होने की निशानी मानी जाती थी। पाठकों की सहभागिता बढ़ाने के लिए पत्रिका प्राय: नए प्रयोग किया करती थी। इसी […]

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